गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

परिवर्तन से परे

PM CARES: सब कुछ ठीक है क्या? 
- अंकित झा 


प्रक्रिया परिणाम से अधिक आवश्यक होती हैं। परिणाम कितना भी न्यायोचित हो परंतु यदि उसकी प्रक्रिया पर प्रश्न उठ जाएँ तो निश्चित ही परिणाम पूर्ण रूप से न्यायोचित नहीं है। प्रधान मंत्री राहत कोष बनाम PM CARES का मामला वही है। अरबों रूपये के दान के साथ इस समय यह ट्रस्ट सबसे अधिक फ़ंडिंग वाले ट्रस्टों में से एक है।
- प्रश्न यह है कि इस पर प्रश्न करना कितना उचित या अनुचित है।
पहली बात तो ये कि देश में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष तथा राष्ट्रीय संचित निधि के होते हुए यह नया ट्रस्ट के गठन की क्या आवश्यकता थी?
सरकार की ओर से इसका एक उत्तर यह है कि राष्ट्रीय राहत कोष प्राकृतिक आपदा के लिए होता है जो कि कोविड-19 नहीं है और संचित निधि के उपयोग हेतु संसद की सहमति लगती है। जो कि इस समय पर नहीं मिल सकती थी। पी एम cares का अधिकारिक स्टेट्मेंट 28 मार्च को आया जबकि जब देश कोविड-19 के चपेट में काफ़ी हद तक था तब संसद का सत्र चल रहा था। अंतिम सत्र 23 मार्च को हुआ जिसमें बिना किसी चर्चा के दो बिल पास हुए और दो बिल सदन में बिना किसी पूर्व सूचना के पेश भी कर दिए गये। क्या इस समय संचित निधि उपयोग करने के लिए प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता था? यदि हाँ, तो क्यों नहीं लाया गया? और राष्ट्रीय राहत कोष में ही एक बदलाव क्यों नहीं लाया गया जिसमें राष्ट्रीय आपदा के अतिरिक्त दुर्घटना व दंगा पीड़ितों को भी राहत दी जाती है? यदि इसके साथ मुख्य स्वास्थ्य आपदा क्यों शामिल नहीं किया गया?
ऐसे कई क्यों हैं जो इससे जुड़ा हुआ है।
- दूसरी बात ये है कि पी एम CARES एक पब्लिक चेरिटबल ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत बताई जा रही है। यदि यह एक चेरिटबल ट्रस्ट है तो निश्चित ही यह "इंडीयन ट्रस्ट ऐक्ट, 1882" के अंतर्गत पंजीकृत होगी। 'चैरिटी' संविधान के 'समवर्ती सूची" का एक विषय है अतः इसको लेकर केंद्रीय व राज्य क़ानून लागू होते हैं। परंतु प्रश्न यह है कि "ITA 1882" के हिसाब से इस फ़ंड का ढाँचा थोड़ा अलग है। ढाँचा के साथ साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह "सूचना का अधिकार" के अंतर्गत आता है? मेरे हिसाब से नहीं। शायद थोड़ा और छानबीन कर के और बेहतर उत्तर खोज पाऊँ लेकिन अभी के हिसाब से तो नहीं। क्यों? क्योंकि ये ट्रस्ट संसद द्वारा पास नहीं किया गया, इसमें सरकारी पैसे नहीं लग रहे, इसमें सरकारी की भागेदारी सिर्फ़ इतनी है कि इसके अध्यक्ष प्रदान मंत्री हैं और सदस्य कुछ अन्य मंत्री। जब सरकारी पैसा शामिल नहीं है मतलब सरकारी जवाबदेही कम होती है।
- तीसरा यह कि माइक्रो फ़ंडिंग के लिए किया गया है। इस तर्क से सहमत है लेकिन बात वही कि राष्ट्रीय राहत कोष की सीमा भी तो कम की जा सकती थी। शायद इसलिए ना किया हो क्योंकि उसकी स्थापना नेहरु ने की थी। इसके साथ एक यह भी तर्क है कि लोग राष्ट्रीय राहत कोष में ज़्यादा दान नहीं देते क्योंकि प्राकृतिक आपदा देश के एक हिस्से में आती है और उससे दूसरे हिस्से के लोगों को ज़्यादा असर नहीं पड़ता फिर बिहार, केरल, महाराष्ट्र के बाढ़ के समय जगह दान लेने वाले paytm और अन्य इकाइयों को कैसे अनुमति दे दी गयी थी। लोगों ने ख़ूब दान किया था। 2019 तक इस कोष में क़रीब 3800 करोड़ उपाए थे जो 2014-15 में क़रीब 1500 करोड़ था। PM CARES जितनी पब्लिसिटी अगर इसे मिलती तो इसे भी ख़ूब दान मिलता।
और तर्क नहीं, हाँ एक आय कर छूट वाला भी तर्क है। लेकिन थोड़ा ज़्यादा हो जाएगा। वो छोड़ देते हैं।
जहाँ तक बात है प्रक्रिया की तो ये भी इतिहास में याद रखा जाएगा कि वैश्विक महामारी के समय प्रधानमंत्री ने तीन सम्बोधन किए एक मन की बात की और उसमें क्रमशः "जनता कर्फ़्यू", "धन्यवाद देने के लिए ताली", "21 दिन का लॉकडाउन", और "9 बजे का दीप प्रज्ज्वलन कार्यक्रम" की घोषणा कर के निकल लिए। स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई टिप्पणी नहीं, हाल ही में हुए G-20 बैठक में लिए फ़ैसलों पर कोई बात नहीं, मज़दूरों को हुई असुविधा व उनके जीविका व जीवन के ख़तरे पर कोई बात नहीं, और यहाँ तक कि आगे के क़दम पर कोई बात नहीं। बस बोल के निकल जाना और उनके पीछे छूटे भूसे पर सब डंडे पीटते रहें। कमज़ोर व्यक्ति प्रश्नों से डरता है, उससे भी कमज़ोर प्रश्न के नाम से और सबसे कमज़ोर अपने पसंद के प्रश्न ही पूछवाना चाहता है। जो भी श्रेणी हो 56 इंच छाती वाले को वहाँ डालें। जनता कर्फ़्यू, ताली थाली, दीप प्रज्ज्वलन, लॉकडाउन सिर्फ़ इन्होंने ही नहीं करवाए, सभी देशों ने करवाए हैं लेकिन उसके साथ साथ जिस तरह की अन्य सुविधाएँ और कार्यक्रम चलाए गये हैं वो भी देखे जाएँ। जिस rतह की फूर्ति, समर्पण और तत्परता मुख्यमंत्रियो ने दिखायी है उसके दसवाँ हिस्सा भी अगर ये दिखाएँ तो लोगों में विश्वास बने। लेकिन नहीं परिणाम प्रक्रियाओं को छिपा लेगा। इस बार मुझे नहीं लगता क्योंकि इस बार का परिणाम पूरी तरह प्रक्रिया पर निर्भर है।

रविवार, 29 मार्च 2020

चलते-चलते

जहाँ कोई वापसी नहीं

- अंकित झा 

आनंद विहार और कौशाम्बी के बीच जो भीड़ थी, वो भीड़ बरसों से है, बस कल वो भीड़ एकत्रित हुई थी, वापस जाने को। वापस जाने को उन शहरों से जहाँ उनसे लिए तो ख़ूब गया पर बदले में आश्रय, भोजन, सुरक्षा और स्वास्थ की गैरंटी तक नहीं दे पाएँ।
आज जो सब मज़दूर के मुद्दों पर विशेषज्ञ बन रहे हैं उन सब को जानना चाहिए कि वर्षों से मज़दूरों के आय सुरक्षा व सामाजिक सुरक्षा को लेकर लोग संघर्षरत हैं, उनमें से ये माँगे ज़रूरी रही हैं कि उनके आय की सुरक्षा हो किसी भी हाल में। आपदा, विपदा व विषाणु संक्रमण किसी भी समय आ सकते हैं। चलिए इस बार ये इतना दिख गया कि सब हरकत में आ गये वरना बाढ़ में, भूकम्प में, अभी हुए दंगों में, और हाँ आतंकवाद-कालेधन पे हुए वार ने भी मज़दूरों को इतना ही डराया था परंतु एक सुकून था कि काम तो चल रहे हैं कुछ नहीं होगा आज नहीं तो कल काम मिलेगा ही, पैसा आएगा ही। लेकिन जब 21 दिनों का पूर्णबंद हो, उस पर से अलग अलग अफ़वाहों द्वारा 3 महीने के बंद की बात की जा रही हो तो मज़दूर डरे नहीं तो क्या करे? कौन खिलाएगा? कितने दिन? किस तरह? वादों और वादों को निभाना और वादों को सही तरह से न्यायोचित ढंग से निभाने में बहुत अंतर है। हम ताली पीट सकते हैं कि दिल्ली सरकार ने प्रबंध किए हैं लेकिन ये प्रबंध सिर्फ़ आपदा प्रबंधन है मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा नहीं। जिन मज़दूरों का वोट पाकर वो सत्ता में आए उन मज़दूरों के लिए आवश्यक क़ानूनों को पालन तक नहीं करवा पाए अभी तक। अगर पथ विक्रेताओं का सर्वे हो गया होता तो उनके योजना अनुसार उनके आय की सुरक्षा हो जाती, अगर असंगठित मज़दूरों का 2008 क़ानून के हिसाब से पंजीकरण हो जाता तो आज उनके सामाजिक सुरक्षा जैसे स्वास्थ्य, व भोजन की व्यवस्था हो जाती और घरेलू कामगार, निर्माण कार्य मज़दूर, व अन्य डिहादी मज़दूरों की तो बात छोड़ ही दीजिए।
हमारे सामने जो हो रहा है वो सिर्फ़ इस सरकार की असफलता नहीं है, हमारे देश के सभी सरकारों की है। श्रम क़ानून, स्वास्थ्य सुविधाएँ, और सूचना प्रबंधन। ये तीनों इस तरह से लाचार हो गयी कि सामने कुछ दिख ही नहीं रहा। अंदर बंद रह के एक वर्ग को बचाया जा सकता है लेकिन इतने बड़े वर्ग को क्या बोला जाए? मज़दूर भी वो, मजबूर भी वो और दोषी भी वो ही?
जब बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग मोबाइल पे अफ़वाहों को सच मान के बैठ जाते हैं तो उनसे क्या उम्मीद करें जिनके लिए "फ़ैक्ट-चेक" जैसा कॉन्सेप्ट उतना प्रबल नहीं है? उनके डर के ऊपर ये अफ़वाह के मसाले को पसरने से कौन रोक पाएगा? सरकार? जिसे इस समय भी शब्दों से खेलने में मज़ा आ रहा है। या फिर मीडिया जो अंताक्षरी खेल रहा है? कोई नहीं। हम भी नहीं। ग़रीब इस देश में ऐसे ही परेशान रहे हैं। रहेंगे। कुछ दिनों में मीडिया की कहानी बदल जाएगी, और भक्तों के नैरटिव भी जो आज ये कह रहे हैं कि दिल्ली में सारे परदेसी लोग निकल गये हैं बस रोहिंग्या और बांग्लादेशी बचे हुए हैं और दिल्ली सरकार उन्हें ही खिला रही है बस। आप इन अफ़वाहों के दलदल में जीते रहिए, हम अपने कमरों में जीते हैं, ये ग़रीब भी एक दिन पहुँच ही जाएँगे या तो अपने गाँव, जेल या फिर वहाँ जहाँ से कोई वापसी नहीं।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

परिवर्तन से परे

लॉकडाउन से पहले कुछ आवश्यक प्रश्न 

- अंकित झा 

लॉक डाउन शुरू होने के तीन दिन के अंदर स्थिति साफ हो गयी कि ये सब कैसे चलना है। बात साफ है कि हम लोग कभी ऐसी महामारी से जूझने के लिये तैयार ही नहीं थे। क्या ये तैयारी होती है? विषाणु (वायरस) पर्यावास का हिस्सा हैं, कई बार उन्हें वाहक मिलता है और फैलना शुरू कर देते हैं। क्या इतनी सी पांचवी क्लास का विज्ञान हमारे सरकारों ने नहीं पढ़ा? तो विषाणु के प्रकोप व संक्रमण के समय क्या करना चाहिए, कैसे सुरक्षित रहा जाए, इलाज कैसे हो और समाज के सबसे वंचित समूह के लिये क्या व्यवस्था की जाए, ये सब कौन और कब तय किया जाना चाहिए था। क्या लगातार बढ़ते संक्रमण के आंकड़े, सडकों चलते मज़दूर, रैन बसेरों में खाने के लिए लम्बी कतार, दुकानों में भारी भीड़, नेताओं बेतुके बयान, लोगो का बाहर निकलना, पुलिस की लाठी आपको प्रश्न करने पर विवश नहीं करती?
इस समय हमारे सामने दस मुख्य प्रश्न खड़े हैं:
1. सबसे बड़ा प्रश्न, क्या इतने वर्षों के स्वायत्त स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद हम केंद्र और राज्य स्तर पर विषाणु संक्रमण से निपटने, उसके विस्तार को रोकने, उसके इलाज के किये इकाई बनाने में असमर्थ हैं? सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे देश में जांच की साधन ही नहीं है। साधन नहीं हैं इसलिए नतीजे नहीं आ रहे हैं। हम अभी भी मलेरिया, डेंगू और बुखार से मरने वाले देश हैं वहाँ विषाणु संक्रमण अवश्य ही एक बड़ा खतरा है। फिर स्वास्थ्य बजट में हर साल मामूली बढ़त इसमें सहायता तो नहीं करती।
2. हमारी चिकित्सा अनुसंधान इतनी कमजोर क्यों है? एक वैश्विक महामारी के इतने करीब होने के बावजूद पिछले तीन महीनों से पर्याप्त तैयारी नहीं की गई, ना लोगों के जागरूकता पर, स्वास्थकर्मियों के प्रशिक्षण पर और सबसे जरूरी रोकथाम व इलाज के लिए वैक्सीन पर?
3. क्या हमारे स्वास्थ्य कर्मी, पराचिकित्साकर्मी, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस और नागरिक सेवा अधिकारी ऐसे संक्रमण, महामारी व रोगों से बचाव के उपायों को लेकर पूर्णतया प्रशिक्षित हैं? क्या इनके पास इससे निपटने के किये आवश्यक वस्तुओं की मौजूदगी है? उसे इस्तेमाल करना आता है? क्या ये समाज में उचित जागरूकता फैला सकते हैं? क्या ये न्यायोचित व बिना भेदभाव के इस पर कार्य कर सकते हैं? क्या इनकी सामाजिक ट्रेनिंग की गई है? क्या इनकी संवेदनशीलता पर कोई प्रशिक्षण लिया गया है? ज्ञान, समझ, संसाधन, जागरूकता व संवेदनशीलता सबसे आवश्यक हैं। क्या इस पर इतने वर्षों में कार्य किया गया है?
4. प्रशासनिक व सरकारी निर्णयों के अपने प्रभाव व दुष्प्रभाव होते हैं। अतः प्रधानमंत्री के निर्णय के भी हैं। प्रभावों की प्रतीक्षा रहेगी लेकिन दुष्प्रभाव सामने हैं, और ये ऐसे दुष्प्रभाव हैं जिस पर कार्य किया जाना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ। ऐसा क्यों है कि प्रधानमंत्री को अपने हर देश के नाम संदेश के बाद सैकड़ों ट्वीट, आदेश और आग्रह करना पड़ता है? क्या हमारा प्रधानमंत्री कार्यालय इतनी खराब तैयारी करता है? क्या यह सोंच पाना इतना मुश्किल कार्य था कि लॉकडाउन के कारण मज़दूरों के आय के साधन रुक जाएंगे, उनका आवास छीन लिया जाएगा, उनपर संक्रमण के समय जांच के पैसे कहां से आएंगे? उनके पास साबुन व पानी कैसे पहुंचाया जाएगा? और कितने ही प्रश्न। हमारे वर्षो पुराने भेदभावपूर्ण मानसिकता के उजागर होने का ये चरम है, जब स्वास्थ्यकर्मी व हवाई सेवा से जुड़े लोगों को शोषित किया जा रहा है। अभी तक सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा व सामने खड़े आर्थिक नाकाबंदी से उपजे संकटों के लिए कुछ भी तय नहीं किया गया है।
5. करीब 5 वर्ष पहले शुरू हुए श्रमेव जयते कार्यक्रम के अंतर्गत मज़दूरों और खासकर दिहाड़ी व अन्य असंगठित मज़दूरों की आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए थे। मज़दूरों की क्षमता विकास जरूरी कदम था लेकिन उनके स्वास्थ्य बीमा, कार्य सुरक्षा, आर्थिक स्वायत्तता, और आवासीय सुरक्षा के लिए क्या किया गया था? ऐसा क्यों है कि महीने भर की आर्थिक बंदी की वजह से मज़दूरों को अपनी शारीरिक सुरक्षा की परवाह किये बिना ट्रेन में ठुस के या पैदल ही अपने राज्य वापस जाना पड़ रहा है जहां न कार्य की गारंटी है ना स्वास्थ्य की?
6. आवश्यक्ता से अधिक संग्रहण व बचत भारतीय मध्यम वर्ग व उच्च वर्ग की पहचान है। लेकिन यह संग्रहण जब पैनिक संग्रहण का रूप लेती है तो उनके लिए ही काल बनती है। ये डर क्या है? इस डर के ऊपर इतने वर्षों में कार्य क्यों नहीं किया गया? अभी खराब समय नहीं आया है, क्या इससे भी खराब समय जे लिए हमारा समाज तैयार है? क्या संसाधनों के उचित व न्यायोचित बंटवारे के लिए हमारा समाज तैयार है?
7. जिस समय चीन, दक्षिण कोरिया, व इटली जैसे देश कोविड-19 से निपटने के लिए कार्यरत थे और भारत में कई लोग लगातार इसपर कार्य करने की सलाह दे रहे थे उस समय हमारे देश के सरकार के लोग अपनी बेहूदगी, बीमारी के प्रति अपनी असंवेदनशीलता और अज्ञानता को नए आयाम दे रहे थे। कहीं कोई धूप में बैठने को बोल रहा था, तो कोई गौमूत्र पार्टी कर रहे थे, कोई गो कोरोना का पाठ कर रहे थे तो कोई हवन और नमस्ते का महत्व समझा रहे थे। ये असंजीदगी आज हम सब पे भारी पड़ रही है। क्या उन नेताओं को सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगनी चाहिए? और इस सब की पराकाष्ठा 22 मार्च को सामने आई। शाम 5 बजे जो हमारे बेहूदगी और विषाणु के प्रति हमारी सामूहिक अज्ञानता का जो हमने परिचय दिया वो ऐतिहासिक है। ऐसी अज्ञानता पहले आडंबरों और अफवाहों में दिखती थी बस, उसे एक देश की सामूहिक मूर्खता का नाम उस दिन दिया।
8. इस समय सबसे आवश्यक है हमारे प्रशासन का रवैया। हम इस बात पर सहमत व असहमत हो सकते हैं कि पुलिस व प्रशासन को किस तरह इसे संचालित करना है। लेकिन जिस तरह के वीडियो सामने आ रहे हैं हम पूर्णतः असमंजस में हैं कि कौन सही, कौन गलत। लोग जो बाहर निकल रहे हैं या पुलिस जो बर्बरता से लाठी भांज रही है। लोगों के अपने कारण हैं, सही भी और गलत भी। पुलिस के भी। लेकिन पुलिस को ये फ्री हैंड किसने दिया लाठी भांजने का? फिर कोई राज्य सरकार कैसे कह रही है कि हमें दिखते ही गोली मारने का आदेश देने पर विवश ना करे। विषाणु के संक्रमण को रोकने के किये शूट एट साइट का आदेश? ये किस देश में हो रहा है? प्रशासन की प्रशंसा भी होनी चाहिए कि जिस निस्वार्थ भाव से वो लगे हुए हैं वो अद्वितीय है लेकिन स्वरूपों के मध्य छिपे रूपों को नकारना नहीं चाहिए।
9. कुछ राज्य सरकारों ने इस महामारी से निपटने में जो पहल की है वो बेहतरीन है। केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली, तेलंगाना और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जिस तरह कार्यरत हैं वो प्रशंसनीय है। लेकिन प्रश्न यही खड़ा होता है कि आगे क्या? कैसे? कब तक? न्याय वो है जो वंचितों व पीड़ितों के प्रति संवेदनशील हो। कांधे पर बच्चे व सर पर बोझा लिए पैदल चल रहे मज़दूर हमारे देश में गरीबों के प्रति सरकारी निराशा की प्रतीक है, उस पर से फैल रहे अफवाह-आडम्बर, धार्मिक नफरत और कुछ नेताओं की बेवकूफ़ी हमारा भविष्य करेंगे।
10. कोरोना विषाणु ने दुनिया को आईना दिखाया कि तमाम विकास के दावे, और परिवर्तन की डींगो के मध्य हमारी लचर स्वास्थ्य सुविधा, ऐसी महामारी से निपटने के लिए उचित तैयारी और संक्रमण को रोकने के लिए हमारी ततपरता कितने पीछे है। हो सकता है इसके बाद आर्थिक मामलों में स्वास्थ्य की दखल बढ़ाई जाए, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पर काम हो सबसे अधिक जरूरी है हमारी स्कूल शिक्षा में ऐसे समयों के सभी तरह के आयामों पर जागरूकता के लिए भी कार्य किया जाएगा, और सबसे जरूरी है कि समाज में वैज्ञानिक सोंच को बढ़ावा दिया जाएगा। दुर्गा सप्तशती और हवन से विषाणु व रोगों का अंत नहीं होता, वो हमें सांत्वना व संयम दे सकते हैं स्वस्थ नहीं कर सकते। इससे भी जरूरी है देश के असंगठित मज़दूर व अन्य गरीबो की आर्थिक सुरक्षा व सामाजिक सुरक्षा पर कार्य करना। देखते हैं, इन दस में से कितने प्रश्नों पर हम स्वयं से उत्तर की अपेक्षा कर सकते हैं।
ख़ैर, ये वो सत्य है जिसकी खोज हमें अगले 20 दिन घर पर रहते हुए भी करनी है। सुरक्षित रहें व सतर्क रहें।
निर्भय भव। ज़िंदाबाद।

गुरुवार, 5 मार्च 2020

Statement

Date: 05-03-2020
JOINT STATEMENT
Condemning the Hate Speech by Alumnus, Kapil Mishra (batch 2004-06) and demanding immediate restitution of victims of Delhi Violence
We, more than 100 undersigned alumni from different batches of the Department of Social Work (Delhi School of Social Work-DSSW), University of Delhi, hereby come together to unequivocally condemn the hate speeches made by one of our alumnus, Kapil Mishra (2004-06) which incited the communal violence in several places of Delhi on 24th February 2020. Mishra who had served as a Member of Legislative Assembly from Karawal Nagar constituency in 2015 and was defeated in the recent assembly elections from Model Town in Delhi. He has been in the news over the last week (Video from Jafrabad on 23rd February 2020, one of many news sources: https://www.youtube.com/watch?v=bS4JxOAbQUE, Aaj Tak 26th Feb 13.10 Min, https://www.youtube.com/watch?v=4KkYGueY2no, NDTV India 23rd Feb 2020) for delivering hate speech and warning bearing communal colour. He has been accused by several groups of inciting communal tensions through his speeches, and issuing warnings to a group of protestors who were sitting on agitation against Citizenship Amendment Act 2019, and forthcoming National Population Register (NPR) and National Register of Citizens (NRC) which together can make many citizens of India illegal persons in their own country of birth and ancestry.
In the video Mishra is seen issuing warning to the anti- CAA protestors of dire consequences, that has been making rounds on social media widely. This is not the first time that he has been at the epicentre of communal hate mongering, rather been engaged with it on several accounts.
Mishra remarked during election campaign that there will be an India-Pakistan contest on the roads on 8th February (Voting day for Delhi Elections 2020) or him leading a group of people sloganeering “Desh Ke Gaddaron ko, Goli Maaro Saalon Ko” (quoted as stated by Mishra on 21st December, https://www.youtube.com/watch?v=sqTpSLnP1FI) .
Delhi Election Commission on 23rd January 2020 took cognizance of these statements by condemning them and subsequently banning him from campaigning. Even now he continues with his jingoist propaganda through his protest at Jantar Mantar with placards displaying ‘Delhi Against Jehadi Violence’ besides raising slogans “shoot the traitors”!
We the undersigned alumni are in abject dismay at how an ex-student of the Department is capable of such irresponsibility. Both his act and speech stands in direct contradiction to not only of values and ethics of social works but also basic humanitarian principles. It is both shocking and disheartening to see him at the centre of communal bigotry followed by violence with the justification of clearing roads. Dissent is at the heart of democracy, as Mishra will be rightly aware and protest a fundamental right therefore any attempt to sanitize a public place of CAA protest is violation of Right to Life under Article 21 under the Constitution of India.
His incitation led to the worst form of humanitarian tragedy in decades, as rioting mobs burnt down homes, businesses, schools besides desecrating places of religious worship. It has left hundreds homeless, many more wounded and approximately 46 dead thereby making it a crisis. This tragedy has affected young, old and women to a great magnitude. Today, the victims continue to pay the price of a communally charged hate speech with their lives and livelihoods. The plight of those grievously injured and languishing in temporary relief camps bears testimony of such incitation.
Every riot puts families and communities in pain, anguish, poverty and destitution. As social workers, we are fully aware that for the development of the country we need conflict mitigation, peace building and social harmony. Riots and clashes hamper the social order, economy and polity and due course of law thereby pushing us behind by several decades. Leaders, public individuals and media figures must therefore be responsible and refrain from any divisive politics based on communal, racial, linguistic lines or any other identity markers. We demand appropriate legal action to be taken against Kapil Mishra and others for the hate speeches which instigated violence from 24th February 2020. In this light we also demand for a free and fair probe by an independent enquiry commission.
We demand Bhartiya Janta Party (BJP) leadership to take action against Kapil Mishra and other party workers accused of hate speeches, as the party continues to enjoy majority confidence since 2014. We strongly believe that the leadership will address this issue without loss of time.
We demand the Delhi and Central Government to declare the Delhi Violence an emergency and respond immediately by making available relief & shelter to all in form of food, clothes, shelter and medical aid besides other basic provisions. We demand the affected children, adolescents, elderly and women to be provided trauma care and psychosocial care in partnership with NGOs.
We demand the Central Government to come out with guidelines for leaders and lay down punitive measures against jingoism of any form.
We demand immediate identification rioters besides setting up a fast track court for justice delivery.
Horrifying images of young boys engaging in rioting have surfaced. We appeal for therapy and counseling of adults and juveniles who seem to have undergone communal indoctrination thereby engaging in looting and violent acts.
We the undersigned alumni of DSSW thereby unequivocally condemn the speech and act of Kapil Mishra and the violence that follow besides demanding restitutive measures for the victims of violence. We also stand in solidarity with the current president of DSSW Students’ Union who took a strong stand against the culture of hate.
NOTE: This joint statement is on behalf of the undersigned alumni of DSSW and does not represent the whole alumni group of DSSW or the official platform of the Department. It has been written and endorsed by a group which is pained by violence. We hereby reaffirm our faith in the Constitution of India, which gives us freedom with responsibilities and the principles of social work which urges us to be empathetic and uphold human rights and justice at all times.
In Solidarity

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

इतिहास के सौतेले दरिंदे: दंगे। 

- अंकित झा 

1... 3... 9... 13.. 18...
एक एक कर जो अब बढ़ रही हैं वो न्यूज़ में दिखने वाली संख्या मात्र हैं। मनुष्य की मृत्यु का दुर्घटना होना बहुत पुरानी बात हो चुकी है अब। इतने लोग मारे गए हैं। किसने मारा? क्यों मारा? एक कानून के विरोध में? शायद नहीं। कानून का विरोध तो तब ही कुचल दिया गया था जब विरोध में बैठे लोगों को आतंकवादी, देशद्रोही, बिके हुए उपद्रवी कह दिया गया था। तमाम विरोध के बाद भी एक कानून आता है। लोग विरोध जाती रखते हैं, विरोध में छात्र भी भाग लेते हैं, सरकारी पदों से इस्तीफा दिया जाता है, धरनों में शांति की अपील होती है, एक दंगा होता है, पुलिसिया कार्रवाई होती है, लोग मारे जाते है।
क्या कुछ याद नहीं आया? मुझे तो हूबहू याद आया। फरवरी 1919। एक कमिटी बनी। रौलेट कमिटी। एक कानून का प्रस्ताव। अनार्कीकल एंड रेवोल्यूशनरी क्राइम्स एक्ट। तमाम विरोध के बाद भी उसका पास होना। विरोधों का जारी रहना। गाँधी का उदय। फिर पंजाब में खूंखार दंगे। और फिर जलियांवाला बाग़। मृत्यु। मृत शरीरों का ढ़ेर। बस अंतर ये है कि उस दौर में क्रूर ब्रिटिश हम पर राज कर रहे थे, और अब देश के लोगो द्वारा चुनी गई सरकार। गोलियां चलाने वाले उस दौर में भी सरकारी गुंडे थे और इस दौर में भी निस्संदेह वही। कुछ वर्दी में कुछ बिना वर्दी के। राज्य में हिंसा पर अगर सरकार का नियंत्रण नहीं तो फिर वो सरकारी हिंसा है। ऐसी कोई हिंसा नहीं जिसे सरकार रोक ना सके, अगर नहीं रुक रहा है तो दो राय नहीं कि सरकार चाहती है कि हिंसा हो। दिल्ली के मामले में ये दोनों सरकारे हैं। आश्चर्य ये है कि अभी भी दोषी तय किये जा रहे हैं, दोष नहीं।
दंगे के बड़े दुष्प्रभाव होते हैं, सबसे बड़ा तो ये कि छीने जा चुके हक़ को लूटने वाले बहुत होते हैं, हक़ बाँटने वाले बहुत कम। समस्या बाँटने वाले बहुत होते हैं,परन्तु सुलझाने वाला कोई नहीं। कोई भी सांप्रदायिक तनाव नया इतिहास लिखती है, इस इतिहास के पन्ने या तो सुर्ख होते हैं या फिर काले। इस दंगे के भी यही कुछ परिणाम होंगे यह तय है। इस दंगे की इतिहास में दो सबसे बड़े गुनाहगार होंगे: दिल्ली पुलिस और देश की मेन स्ट्रीम मीडिया। इन दोनों ने दंगे उकसाये या भड़काए नहीं है बल्कि इस बार दंगों में बराबर के हिस्सेदार हैं। बीते कई सालों से मीडिया के न्यूज़रूम और स्टूडियो में हर रोज़ के बार दंगे हुए हैं। खुलेआम वो बातें कहीं गयी जो पहले अकेले में भी बोली नहीं जाती थी। एक एक करके हिंसा व नफरत की पराकाष्ठा के नींव डाले गए ताकि एक दिन ये किया जा सके। मेरा यक़ीन मानिए ये उनकी पराकाष्ठा नहीं है। ये पराकाष्ठा से पहले वाला पायदान है। उनकी पराकाष्ठा कितनी खतरनाक होगी इसकी कल्पना ही हमें हिला देनी चाहिए। आप सबको, हम सबको हिंसा के लिए इतना उत्सुक कर दिया गया कि कई लोग हिंसा में असहाय हैं तो बड़ा तबका हिंसा से खुश।
ये खुशी हमारी सामूहिक हार है।
PS: हाँ, भीषण विद्रोह-हिंसा के तीन साल बाद 1922 में रौलेट कानून को निरस्त कर वापस ले लिए गया था। वो अंग्रेज़ थे। अपने वालों से क्या उम्मीद रखें? देखते हैं इन्हें कानून प्यारा है या नागरिक।

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

मूवी रिव्यू

शिकारा: नफ़रत, संघर्ष और प्रेमपत्र ।

- अंकित झा 
फ़िल्म शिकारा एक सफल फ़िल्म होती यदि उसे एक विशुद्ध फ़िल्म के रूप में बनाई जाती तो। किसी भी प्रेम कहानी के लिए आवश्यक है दो प्रेमी (फिर वो किसी भी रूप में हों) और उनकी परीक्षा के लिए खड़े किए गए हालात। फिल्मों में कभी वो आर्थिक असमानता होती है, कभी कोई तीसरा व्यक्ति जो दोनों में से किसी को प्रेम करता हो या फिर कोई सामाजिक या राजनीतिक कलह। इस फ़िल्म में दो प्रेमी हैं; शिव और शान्ति, शिव और कश्मीर, शांति और शिकारा (जो शिव और शांति का घर है), पण्डित व मुस्लिम, और साथ साथ बहने वाले मित्र, रिश्तेदार और तरक्कियां। पहली प्रेम कहानी मार्मिक है। काफी इत्तेफ़ाक़ से शिव और शांति मिलते हैं, फिर एक दूसरे के हो जाते हैं। कोई दिक्कत नहीं। हाँ इस बीच एक भयावह राजनैतिक और सामाजिक कलह इन दोनों की व्यक्तिगत रूप से खूब परीक्षा लेती है। और शांति को किये गए वादे के अनुसार शिव उसे हनीमून पर अंततः ताज महल ले जाता है। ये हुई इनकी प्रेम कहानी।
लेकिन मुझे पसंद आयी फ़िल्म की दूसरी प्रेम कहानियां। शिव और कश्मीर की प्रेम कहानी। शांति और शिकारा की प्रेम। पण्डित व मुस्लिम की प्रेम कहानी।
"एक दिन तुमसे मिलने वापस आउंगा
क्या है दिल में सब कुछ तुम्हे बताऊंगा
कुछ बरसो से टूट गया हूँ
खंडित हूँ
वादी तेरा बेटा हूँ
मैं पण्डित हूँ।
ऐ वादी शहजादी बोलो कैसी हो।"

ये बोल हैं शिव के जब वो 18 साल बाद जम्मू के अपने कैम्प से कश्मीर वापस आता है। कोई अपने आँसू कब नहीं रोक सकता? सम्भवतः जब वो अपने सबसे प्रिय से वर्षों के विरह के बाद मिले। वादियों से गुजरते समय शिव के मन में घूम रहे बोल और आंखों से अविरल बहते आँसू। ये है प्रेम। प्रेम अपनी ज़मीन से। जहँ पैदा हुए, जहाँ पढ़ाई की, जहां दोस्तों संग वो बड़ा हुआ, जहां उसे उसकी शांति मिली, जहाँ उसने कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया और वो मिट्टी उसे जहां का हो के रह जाना था। लेकिन। ये लेकिन इस प्रेम कहानी का वो प्रश्न है जो हमें इतिहास से पूछना है, जो हमें वर्तमान में पूछते रहना है, जो हमें हमेशा अपने समाज से पूछते रहना होगा। क्यों किसी समाज को उसकी पहचान के आधार पर अपनी पहचान गंवानी पड़ती है? इतिहास ऐसे किस्सों से भरा पड़ा है। कश्मीरी पंडितों का उनकी जमीन से विस्थापन इसी इतिहास की कड़ी है। वो समय कितना भयानक रहा होगा इसकी कल्पना करना भी असंभव है हम लोगों के लिए। हम बार बार ऐसे दौरों से गुजरे हैं और बार बार हम सब सभ्यता के स्तर पर एक कदम पीछे खिसके हैं। लेकिन कमी यह रह गयी कि शिव और कश्मीर की प्रेम कहानी के मध्य उपजे विस्थापन जैसे कनफ्लिक्ट को बहुत सतही रूप से दिखाया गया है फ़िल्म में। राजनैतिक कलह से जन्मे सामाजिक उहापोह को काफी ऊपर ऊपर से दिखा के बहुत कुछ लाइन्स के बीच सोंचने के लिए छोड़ दिया गया है। इसीलिए शिव और कश्मीर अमर प्रेमी नहीं बन पाते। उनकी प्रेम कहानी में संवाद है, भावनाएं हैं लेकिन गहराई नहीं है।
कैसा होता है अपनी प्रेमिका पर आग की लपट देखना? एक एक कर उसके करीब आती कुछ आहटें?किसी बाहरी ताक़त के कारण आपका अपने प्रेम से बरसों के लिए बिछड़ जाना, कुछ सालों की जुदाई में उसपर कब्ज़ा जमाये कोई पहचानवाला? कैसा होता है? वही हुआ शांति और शिकारा के बीच। उस शिकारा में जिसकी नींव में उसके पति के मुस्लिम दोस्त के घर के पत्थर हों, जिसके घर में उसके पति की पूरी कमाई लग गयी हो, उसे अपने घर से सजाया हो। इस फ़िल्म की सबसे अच्छी प्रेम कहानी है शांति और शिकारा की। हमारी रूह कांप जाती है जब शिकारा के छत पर आग गिरती है और उसे शांति देखती है, 18 साल बाद किताबों की जगह दूध के कनिस्तर देख के हमें भी अफसोस होता है, और ऐसे कई मौके हैं। इनके बीच की कलह सबसे अधिक समझने योग्य है। शिकारा और मुट्ठी कैम्प के तम्बू के बीच का फर्क ही विस्थापन है, सम्बन्ध विच्छेद है, विरह है। उससे दर्दनाक और कुछ नहीं।
और फिर आती है वो प्रेम कहानी जो अब नफरत में बदल चुकी है। पंडित और मुस्लिम की। कश्मीरी आगे जोड़ा जाना चाहिए। मुझे वर्तमान का पता नहीं लेकिन इतिहास की कलह ऐतिहासिक कलह बनी है। लेकिन शिकायत ये रही कि ये प्रेम कहानी कैसे खराब होती चली गयी। एक धरना। एक मृत्यु। उसके बाद पाकिस्तान के पीएम का भाषण और एक के बाद एक घटते चले गए इवेंट। काफी डराता है लेकिन वो क्या कारण थे कि हालात इतने बिगड़ गए? हमें पता है लेकिन फ़िल्म देखने वाले उन लोगों का क्या जो सिर्फ ये देखने गए थे कि कश्मीर के पत्थरबाज़ों ने कैसे कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाया? भारतीय सरकार से मोह भंग, नाराज़गी के क्या कारण थे? राज्यपाल जगमोहन, मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी का अपहरण, जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का बढ़ना और ना जाने कितनी बातें। वो भी सामने आनी चाहिए थी।
एक बात जो और सामने आनी चाहिए थी वो ये कि दो बार रोगनजोश पकने के बाद भी शिव और शान्ति उसका स्वाद क्यों नहीं ले पाते? पता चलना चाहिए।
हाँ मुख्य कलाकार आदिल और सादिया का अभिनय जबरदस्त से भी ऊपर है। दोनों अपने चरित्र में इतने सहज हैं कि लगता है न जाने कितने पुराने और परिपक्व कलाकार हैं वो। विधु विनोद चोपड़ा से इससे बेहतर कहानी लिखी जा सकती थी लेकिन जिस संवेदनशीलता और समझदारी से उन्होंने ये फ़िल्म बनाई है वो सराहनीय है। उन्होंने बताया कि कैसे बिना एक गोली चलाने वाले को दिखाए हिंसा दिखाया जाए कैसे आतंक को दर्शाया जाए। फ़िल्म का फर्स्ट हाफ बेहतरीन है और दूसरा हाफ थोड़ा कमजोर। लेकिन फ़िल्म देखी जानी चाहिए। रोगनजोश जरूर खाइएगा फ़िल्म देखने के बाद।

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

संक्षिप्त मूवी रिव्यू

"छपाक", भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है। यह सिनेमा जगत में हुई एक ऐसी सुखद घटना है जिसके समक्ष पुरुषवादी विचारों से भरे इस समाज को नतमस्तक होना चाहिए।
मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहा कि यौन शोषण व यौन हिंसा जैसे जघन्य अपराध को भारतीय फिल्मों में बदला लेने व कहानी को एक नया मोड़ देने के लिए किया जाता रहा। जिससे इस अपराध की संवेदनशीलता समाप्त होती गयी, और यह स्थापित कर दिया गया कि स्त्री पर यौन हिंसा के बाद एक पुरुष आएगा जो अपराधी से बदला लेगा। यहीं सिनेमा कहीं स्त्री को हार चुका था। लेकिन छपाक वो फ़िल्म नहीं है। यहां स्त्री पर फेंके गए तेज़ाब के बाद पुरुष दूसरे पुरुष के ऊपर तेज़ाब फेंककर या उसका गला काटकर खत्म नहीं करता। यहां स्त्री है जो कहना जानती है, फैसले लेना जानती है, आवाज़ को रखना जानती है।
यह फ़िल्म दीपिका पादुकोण, विक्रांत मेसी या मेघना गुलज़ार नहीं है। यह फ़िल्म एक संघर्ष की तरह है। दिल को झकझोरने वाला, आंखों को भींगो देने वाला, सांस को रोक देने वाला।
धन्यवाद मेघना यह फ़िल्म देने के लिए।
(कुछ अखंड इसके टैक्स फ्री होने का मज़ाक बनाएंगे, विरोध करेंगे। यह उनकी कुंसित मानसिकता दिखायेगी। ये वही लोग हैं जो तेलांगना में एनकाउंटर में मारे गए रेप के आरोपियों की मौत पर जश्न मना रहे थे। वो आज एसिड अटैक जैसे मुद्दे और एसिड सर्वाइवर पर बनी फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उसमें धर्म खोज रहे हैं। ख़ैर, ये अपनी तरह के खत्म ही चुके लोग हैं। धिक्कार है। )
PS: फ़िल्म देखते समय आलोक दीक्षित जो लक्ष्मी के साथी हैं वो पीछे ही बैठे थे।
PSS: फ़िल्म में देशभक्त शिरोमणि अंजना ओम कश्यप भी एक भूमिका निभा रही हैं। भक्तों ज़रा इनका भी बॉयकॉट करना।
फ़िल्म से जुड़े सभी लोगों को क्रांतिकारी ज़िन्दाबाद।
मर्दानगी के सबसे घिनौने अतिवाद से जन्म लेने वाले अपराध से गुजरी सभी साथियों को बहुत सम्मान, हौसला और ज़िन्दाबाद।।

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

चलते चलते

पाकिस्तान के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख्तर के दानिश कनेरिया के साथ किये जाने वाले भेदभाव की बात भारत में मोदी मीडिया ज़ी न्यूज़, टीवी 9 भारतवर्ष आदि के लिए संजीवनी बन के आया है। पाकिस्तान को बुरा कहने के इस सुनहरे अवसर को ये चैनल ऐसे भुना रहे हैं जैसे कुछ नया हो रहा हो और वो साबित करने में जुट गए हैं कि उनके पिता श्री मोदी ने और सौतेले पिता अमित शाह ने कितना आवश्यक काम किया है भारत के नागरिकता कानून में संशोधन ला कर।
मुझे यह अचरज में नहीं डालता क्योंकि 2005 के आस पास जब पाकिस्तान के बेहतरीन बल्लेबाज यूसुफ योहाना ने जब धर्मांतरण कर अपना नाम मोहम्मद यूसुफ किया था तब भी धर्म के नाम और किये जाने वाले भेदभाव व शोषण का मुद्दा खूब उठा था। यह सब पाकिस्तान में होना आम नहीं है परंतु इतना अचंभित करने वाला भी नहीं है। इसीलिए वो पाकिस्तान है, एक हताश देश जो अपनी नींव में उलझा हुआ है। लेकिन इससे भारत अपनी पीठ क्यों थपथपा रहा है? अगर शोएब अख्तर का खुलासा इतना आवश्यक है तो क्या मुम्बई रणजी खिलाड़ी अभिषेक नायर का खुलासा भूल गए जिसमें वो अजीत अगरकर, अमोल मजूमदार जैसे खिलाड़ियों पर उनपर जातिगत टिप्पणी व उनके साथ किये गए भेदभाव की बात करते हैं? नहीं भूलना चाहिए। शोषण समाज मे निहित है। जाति, धर्म, वर्ग, रंग, नस्ल और ना जाने कितने ही रूप में। भारत कतई पाकिस्तान नहीं है। भारत वो है जो पाकिस्तान नहीं है। और भारत को पाकिस्तान जैसा बनना भी नहीं चाहिए।
ख़ैर, दानिश कनेरिया ने सफाई दिया कि वो पाकिस्तानी हिन्दू होने में गर्व करते हैं और तमाम भेदभाव के बावजूद उस देश ने उसे प्यार दिया है।
PS: और जो देश में आज संघर्ष जारी है, इसी भेदभाव को खत्म करने की है। ताकि हमारे वर्ल्ड कप के हीरो जो देश मे अल्पसंख्यक धर्म से हैं फिर वो ज़हीर खान हों, मुनाफ पटेल, हरभजन सिंह या वर्ल्ड कप के महानायक युवराज सिंह, इन सब पर भविष्य में भारतीय नागरिक होने का सबूत देने की आवश्यकता ना पड़े।
जय हिंद। ज़िन्दाबाद।

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

चलते चलते

फ़ीस सिर्फ़ एक बहाना है
- अंकित झा 
इस समाज में किसी लड़की पर सबसे बड़ा लांछन किस बात का लग सकता है? यही ना कि उसका आचरण ठीक नहीं है। कपड़े छोटे पहनती है, सिगरेट शराब पीती है, लड़कों के साथ घूमती है और शायद शादी से पहले शारीरिक संबंध बना चुकी है। यही न? और लड़कों के लिए?
* इस पोस्ट को आप कहीं जेंडर एंगल से ना देख लें।
पहले पढ़िए।
हाँ, और लड़कों को? यही कि इतना बड़ा हो गया कमाता नहीं है, नशा करता है, बड़ा बेटा है और फिर भी खाली बाप से पैसे मंगवाता रहता है। लेकिन दोनों के ऊपर संयुक्त रूप से यदि एक कुपढ़ समाज में लांछन लगेगा तो यह लगेगा कि ये लोग पढ़ाई लिखाई के नाम पे खाली गन्द मचा रहा है। ज्यादा लिबरल हो गए हैं। यही सब न?
हम सब ने इतने वर्षों से मिलकर एक कुपढ़ समाज बनाया है। वो समाज जिसके पढ़ने का भी कोई अर्थ निकला नहीं। यही स्थिति तो है वर्ना अपने हॉस्टल में बढ़े फीस के विरुद्ध आवाज उठा रहे छात्र-छात्राओं के विरुद्ध ही कोई क्यों बोलेगा?
इसलिए कि वो लोग देशद्रोही हैं?
उस संस्थान में पढ़ने वाले कितने छात्र-छात्रा बैंक से लोन लेकर विदेश भाग गए हैं?
कितने छात्र-छात्राओं ने झुंड बनाकर किसी एक व्यक्ति को जान से मार दिया है?
कितने छात्र-छात्राओं ने एक दुर्घटना में मृत व्यक्तियों की चिता की झांकी बनाकर शहर भर में घुमाया है?
कितने छात्र-छात्राओं ने 50 दिन में बदलाव ना हो तो चौराहे पर लटका देना बोलकर सैकड़ों की जान ली हो सिर्फ अपने हिस्से का पैसा निकालने में?
कितने छात्र छात्राओं ने 1 के बदले 10 मारने की खुली चुनौती दी है?
कितने छात्र छात्राओं ने 15 मिनट के लिए पुलिस हटाने की धमकी दी है?
कितने छात्र छात्राओं पर शारीरिक शोषण, यौन शोषण, हत्या, दंगे के आरोप हैं?
कितने? कोई संख्या है?
क्या आपको पता है बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हॉस्टल का फीस कितना है? 3000 रुपये सालाना। मतलब? 250 रु महीने। क्या बोलेंगे पंडे एक बारे चंदन लगाने का ले लेते हैं। और हाँ नार्थ ईस्ट हिल विश्वविद्यालय का? 1800 रु सालाना। मतलब? 150 रु महीने। बोलेंगे इससे ज्यादा तो गुवाहाटी से शिलांग आने में लग जाते हैं। लगभग सभी केंद्रीय विश्वविद्यालय में फीस ऐसी ही होती है। क्या यह भी बताने की आवश्यकता है कि शिक्षा किसी भी सरकार का एक मुख्य कर्तव्य है। ये मोदु बाबू कुछ खास नहीं है जिनपर दवाब पड़ रहा हो।
फीस और देशद्रोह जैसे मुद्दों की आर में अपनी वैचारिक मतभेद का रोटी सेंकना बन्द करें। ये देश संघ का नहीं है। संघ से पहले भी देश था, संघ के बाद भी देश रहेगा और संघ के दौरान भी देश है। ये देश संघ को चुनौती वाला देश है। वैचारिक मतभेद का सम्मान करना सीखिए, वैचारिक मतभेद पर घुसपैठ करना इस देश में परंपरा रही है। वो परंपरा आपको मुबारक। इस देश में अपने विचार की रक्षा के लिए वर्षों बलिदान भी दिया गया है, अपनी स्वायत्ता की रक्षा के लिए देश वर्षों लड़ा है। आगे भी लड़ेगा। आज जे एन यू। कल कोई और। फिर कोई और। यूँ ही चलता रहेगा।
लेकिन आज तो जे एन यू जीतेगा। ये तय है।
ज़िन्दाबाद।।

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

परिवर्तन से परे

'संघ'र्ष का दौर है, संघर्ष तो करना पड़ेगा।।

- अंकित झा 

वर्ष 2015, तारीख़ 19 मई। जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में एम ए प्रवेश के लिए ‘समाज शास्त्र’ की प्रवेश परीक्षा देने जा रहा था। पिछले तीन वर्षों में दिल्ली में रहते हुए जो सपने देखे थे वो सब आज काग़ज़ पर लिखने का समय था। टाटा इन्स्टिटूट में जाना चाहता था पर फ़ीस ज़्यादा थी, अब एम ए के लिए इतना ख़र्च करने का मन नहीं था और इसीलिए जामिया के कन्वर्जेंट जर्नलिज़म और मास कम्यूनिकेशन में भी अप्लाई नहीं किया था। ऐसा नहीं था कि अगर पापा को कहता तो वो पैसों की व्यवस्था नहीं कर पाते लेकिन तीन बच्चों को पढ़ा चुके पिता पर और दवाब डालने का मेरा मन नहीं किया। फिर जे एन यू का ही सहारा था। लेकिन जब प्रश्न पत्र आया तो सारे सपने चकनाचूर होते दिखे। इतना पढ़ने और समझने के बाद भी शब्दों और विचारों का अभाव लगने लगा और नतीजा यह रहा कि परीक्षा में असफल रहे। ऐसा लगा अब शायद पत्रकारिता में नौकरी ही लेनी पड़ेगी और जे एन यू का वो हसीन सपना अगले साल फिर से देखा जाएगा। हालाँकि दिल्ली विश्वविद्यालय में दाख़िला हो गया और फिर जे एन यू का सपना 2 साल के लिए टाल दिया। जे एन यू का सपना सिर्फ़ एक सपना नहीं था, वो उस जगह जाने का, वहाँ पढ़ने का, वहाँ की दीवारों से मित्रता करने का, वहाँ के पुस्तकालय में किताबों की गंध लेने का, वहाँ के हॉस्टल में अपनी दीवारों को सजाने का और सबसे आवश्यक विचारों के महसागर में गोते लगाने का सपना था।
फिर उस सपने के 1 वर्ष के अंदर ही जे एन यू पूरी तरह राष्ट्रीय न्यूज़ बन चुका था। सामाजिक-राजनैतिक व राष्ट्रीय चेतना के लिए जाना जाने वाला संस्थान आज देश द्रोही बन चुका था। उस संस्थान पर आरोप लगे कि वहाँ पर ख़तरनाक नारे लगे, देश विरोधी टाइप के। ख़ैर, ये वो दौर था जब एक वर्ष के अंदर एक तरफ़ गोविंद पनसारे और एम एम कलबुर्गी को मारा जा चुका था, एफ टी आइ आइ में छात्र-छात्राएँ एक निहायत ही अयोग्य निदेशक के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे, यू जी सी द्वारा नॉन नेट वज़ीफ़ा ख़त्म करने के विरुद्ध अलग अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले ‘ऑक्युपाई यू जी सी' का संघर्ष कर रहे थे, और संस्थानात्मक चक्की में पिस कर रोहित वेमुला ने अपना जीवन समाप्त किया था। 20 फ़रवरी 2015 को कॉमरेड पनसारे की हत्या से शुरू हुए कोलाहल ने एक वर्ष के अंदर ही छात्र संघर्ष का नया इतिहास लिख दिया था। कश्मीर-पंजाब से लेकर तमिलनाडु के छात्र संघर्ष कर रहे थे। इसी बीच वो हुआ जो छात्र संघर्ष इतिहास में पहले नहीं हुआ था। प्रदर्शन तो बहुत हुए थे परंतु 1 फ़रवरी को छात्र-छात्राओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया जिसमें पुलिस बर्बरता में कई विद्यार्थी बुरी तरह घायल हो गए। यहाँ से शुरू हुआ एक संस्थान बनाम संघ का संघर्ष। वर्षों से आ रहा वैचारिक मतभेद अब वैचारिक कलह बन गया। क्योंकि सत्ता थी संघ के पास तो सिद्धि भी उसे ही मिलनी थी।
देश में प्रगतिशील छात्र-छात्रा आंदोलन अब अपने सबसे मुश्किल दौर में आने वाला था। अब प्रश्न करने वाले सिर्फ़ क़ानून को ही नहीं आम जैन को नापसंद होने लगे। पहले कहा जाता था “पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब” उससे आगे बढ़कर अब उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों को “करदाताओं के पैसे पर ऐश करने वाले” क़रार दे दिए गये। ये विचार में आग लगाने वाला दौर आ गया। छात्र-छात्रा एक समृद्ध समाज की नींव हैं लेकिन यहाँ पर उन्हें दूसरों के पैसों पर पालने वाले नकारा वर्ग घोषित कर दिया गया, प्रश्न करने की समझ को सरकारविरोधी और चर्चाओं को देशद्रोह के लिए किया जाने वाला षड्यंत्र घोषित कर दिया गया। ये आश्चर्य और अचरज का ही दौर है। यहाँ 26 वर्ष की उम्र में नौकरी करने वाला युवा 28 वर्ष में शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र पर एहसान करने की मुद्रा से बात करने लगा ऐसे जैसे उसकी शिक्षा का ख़र्च वो वहन कर रहा हो। कहने लगे यदि माँ-बाप के पास पढ़ाने को पैसा नहीं तो बेहतर है नौकरी करो और इस क़ाबिल बनो कि माँ-बाप का ख़र्च उठा सको। हम सबको इस ‘श्रवण कुमार सिंड्रोम’ से बाहर आना होगा। माँ-बाप हमें पालते हैं, व्यापार के लिए निवेश नहीं करते, वो उम्मीद करते हैं परंतु कॉंट्रैक्ट साइन नहीं करते। उनकी भी इच्छा हो सकती है एक शिक्षित पुत्री-पुत्र के माँ बाप कहलवाने का। और ऐसा सबको होना चाहिए। सभी अलग हैं और सबकी अपनी प्राथमिकता। शिक्षा ग्रहण करने की कोई उम्र नहीं और ना ही उसके लिए ख़र्च वहन करने की विवशता। शिक्षा राष्ट्र के प्रति की गयी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। कोई इस 26 वर्षीय ज़िम्मेदार करदाता को बताए कि इस देश में “प्रौढ़ शिक्षा, जीवनपर्यंत शिक्षा जैसे कोर्स भी हैं और उन्हें पढ़ने वाले विद्यार्थी भी। वही प्राथमिकताएँ।
अब आते हैं फ़ीस पर। क्या जब आप छोटे थे तो महीने के वो दिन याद हैं जब आपके माता-पिता को आपके स्कूल के दरमाहे के लिए व्यवस्था करना पड़ा हो? अगर याद है तो मुझे विश्वास है हॉस्टल की बढ़ी फ़ीस पर आप भी क्रोधित हुए होंगे। और अगर नहीं भी याद तो एक बार उस स्थिति को सोंच कर ही देखिए। मुझे याद है। घर में सबसे महँगी शिक्षा मेरी रही है। और मेरे स्कूल में बढ़ते बढ़ते लगभग सभी भाई-बहन कॉलेज पहुँच चुके थे। फिर भी महीने में वो एक दिन तो आता ही है जब चिंता करनी ही पड़ती है। पिता आपको एहसास नहीं करवाते लेकिन उन्होंने चिंता की होती है। आप उस चिंता को उस उम्र में नहीं समझ सकते। लेकिन इस उम्र में तो समझ सकते हैं। अगर समझ पाते तो विश्वविद्यालय को धर्मशाला कहकर प्राइम टाइम में ख़बर नहीं दिखाते। ये वो पत्रकार हैं जिन्होंने सैकड़ों करोड़ माँगे थे एक ख़बर को ना दिखाने के। ख़ैर, हम लोग भावनाशून्य हो रहे हैं नहीं पता था। क्या शिक्षा सस्ती नहीं होनी चाहिए? अमीर को फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि उनके पास ग़रीब बहुत हैं अपना सर्वस्व सौंपने को। लेकिन इस मध्यम वर्ग का क्या? आपको अपने बच्चों की सचूलम कोचिंग और कॉलेज फ़ीस ज़्यादा नहीं लगती? और किताबों के पैसे? नहीं लगते? मैं तो काँप उठता हूँ सोंच कर शिक्षा किस क़दर महँगी हो रही है। ऐसे दौर में उच्च शिक्षा को सस्ता बनाए रखने के लिए किए जा रहे संघर्ष को इस तरह क्यों देखा जा रहा है जैसे कोई मुफ़्तख़ोरी की लड़ाई लड़ रहा हो? और यदि शिक्षा के लिए मुफ़्तख़ोरी की लड़ाई तो वही सही। ‘प्रथम' संस्था ने वर्षों अपने रिपोर्ट में इस मिथक को सत्य बनाने की पूरी कोशिश की कि सरकारी विद्यालयों में आठवीं तक फ़ेल ना करने की नीति उनका नुक़सान कर रही है और वो बस मध्याह्न भोजन के लिए स्कूल आ रहे हैं। हमें आदत है चीज़ों को सामान्य करके देखने की। 70 प्रतिशत मतलब अधिकांश, अधिकांश मतलब सब। ऐसा नहीं है। यह कोई चुनाव तो हाँ नहीं कि 30% पाकर हम लहर लहर चिल्लाने लगें। यहाँ बात है ‘एक’ के महत्व की। जिसे दरकीनार किया जा रहा है। हमारे बीच सिर्फ़ बेहतरीन विद्यार्थियों को ही अधिकार नहीं है अच्छी शिक्षा का। सबको है। सब को मतलब सबको। जो पास हो रहा है उसे भी, जो फ़ेल हो रहा है उसे भी। और परीक्षा कोई पैमाना नहीं है आगे बढ़ने का, वो आगे सीखने का पैमाना हो सकता है। और अधिक महंत करने का हो सकता है।
यही हैं हम। देश में बहुत कुछ चल रहा है। कई विश्वविद्यालय के छात्र-छात्रा संघर्ष कर रहे हैं। महीनों-वर्षों से। फ़ीस को लेकर, उपस्थिति को लेकर, हॉस्टल में सुविधाओं को लेकर, हॉस्टल के गेट खुलने को लेकर, पुस्तकालयों की स्थिति को लेकर, छात्र-छात्रा के बुनियादी अधिकारों को लेकर और सबसे महत्वपूर्ण गर्व से अपनी विचारधारा को मानने और उसका अनुसरण करने को लेकर। जे एन यू एक उदाहरण है, संघर्ष को जीवंत कैसे रखा जाए, 45 दिनों से उत्तराखंड में आयुष अस्पतालों के विरुद्ध किया जा रहा आंदोलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है और उतना ही महत्वपूर्ण है मदरसों की स्वायत्ता, मंदिरों में पंडिताई का शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों को सिर्फ़ पंडिताई पढ़ाने का संघर्ष और बहुत कुछ। संघर्षों का चलना बहुत ज़रूरी है। हम सब इस बात को याद रखें कि हम यहाँ तक कैसे पहुँचे, राजा-महरजाओं-कम्पनी राज और कॉलोनी से यहाँ तक। संघर्ष। बहुत सारा संघर्ष। चोट। हार। मायूसी। लेकिन आगे कार्य करते रहने की सोंच। और सबसे आवश्यक अपने विचारों पर गर्व करना। जे एन यू को भी करना चाहिए और हमें भी। उनको भी जो विचरभिव्यक्ति को वैचारिक ग़ुलामी मान बैठे हैं। वो प्रश्न नहीं करना चाहते वो धर्मांध होते हैं, जो प्रश्न नहीं करते वो भक्त और जो प्रश्न करना नहीं जानते वो ग़ुलाम। प्रश्न करिए, स्वयं से भी, अपनों से भी और जहाँ शंका हो उससे भी।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

परिवर्तन से परे

ओला-ऊबर नहीं समस्या बहुत विकट है

- अंकित झा 

निर्मला सीतारमण कहती हैं कि ओला, उबर और मेट्रो के उपयोग के बढ़ने के कारण लोग अब कार और उसके ईएमआई वाले मामले में नहीं फंसना चाहते। ये बात ठीक उस दिन आयी जब कोर्ट के आदेश से गुड़गांव के रैपिड मेट्रो का कार्यकाल और बढ़ाया जा रहा है।
क्या ये बात सही है? मेरे ख्याल से बिल्कुल नहीं। भारत के कितने शहरों में ओला-उबर की सेवा उपलब्ध है? 63 और 29 में। कितने में मेट्रो है? 9 में। भारत मे कुल 6 लाख से अधिक ग्रामीण और करीब 4500 शहरी क्षेत्र हैं। फिर क्या इतनी बड़ी जनसँख्या इतने बड़े गिरावट को प्रभावित कर सकती है? पता नहीं।
फिर आते हैं तीन अहम मुद्दे।
पहला गाड़ियों की पार्किंग।
दूसरा सड़क की व्यवस्था।
और तीसरा भारत का औसत परचेसिंग पावर।
पहले पर आते हैं, 2 सितंबर को सर्वोच्च न्यायलय ने एक मामले में कहा कि हमारे देश मे 2 प्रतिशत से भी कम लोगों के पास गाड़ियां हैं। लेकिन उन गाड़ियों को पार्क करने हेतु स्थान का भयंकर अभाव है। आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में प्रति 150 वर्ग मीटर के प्लाट पर 8 गाड़ियां हैं। फिर सवाल ये कि लोग रहे कहां और गाड़ी पार्क कहाँ करें। उस आदेश की समीक्षा में ये भी कहा गया है कि दिल्ली में पार्किंग क्षमता से 130 गुना अधिक गाड़ियां हैं। और ये बात सिर्फ दिल्ली की है, दिल्ली की तरह भारत मे 9 और बड़े शहर हैं और उसके अलावा कितने ही अन्य शहर। यदि गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं होगी तो गाड़ी खरीद के उसे कहां पार्क करेंगे? जहां ओला उबेर वाले पार्क करते हैं? और कहीं भी पार्किंग शहरी आधारभूत संरचना के सबसे आवश्यक संरचनाओं में तो है नहीं कि वो चाहिए ही। हर बार सरकार केवल अमीरों के लिए जमीन क्यों उपलब्ध करवाए? पार्किंग का उपलब्ध ना होना भी एक कारण हो सकता है।
दूसरा है सड़कों की पर्याप्तता। 2018 के नवम्बर में भारत के 154 शहरों में किये गए एक शोध के अनुसार भारतीय सड़कों की औसत रफ्तार 24 किमी प्रति घण्टा है जो कि पीक ऑवर में घट के 10 के आस पास रह जाता है। जब सड़कों पर रेंगना ही है तो गाड़ियां होने से क्या फायदा? सड़क से अधिक क्षमता की गाड़ियां आ गयी हैं। जितने हम तैयार हैं उससे बहुत ज्यादा। हो सकता है युवा आबादी दौड़ना चाहती हो, उड़ना चाहती हो, गिरना चाहती हो, फिर उठना चाहती हो, लेकिन ट्रैफिक अर रुकना और रेंगना नहीं चाहती है।
अब है तीसरा, भारतीय नागरिकों की औसत परचेसिंग पावर। इसे परचेसिंग पावर पैरिटी से कंफ्यूज ना किया जाए। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि इस समय एक औसत भारतीय की क्या इतनी कमाई है कि वह गाड़ी खरीद सके?
उससे भी जरूरी है समझना गाड़ी खरीदने की आवश्यकता।
हमें गाड़ियां क्यों खरीदनी है? ताकि हम शान से अपनी निजता का जश्न मनाएं, या मौसम की मार से बचने के लिए, या अपनी खुशियों की चाभी घर लाने के लिए, या इसलिए कि सिर्फ अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ानी है। हमने हमारे देश में कभी भी सार्वजनिक वाहनों का सम्मान नहीं किया। हम सब निजता पसंद लोग हैं और दिखावटी भी। ई एम आई भर के गाड़ी खरीदना लोग नहीं चाहते क्योंकि नौकरी को लेकर वो असमंजस में हैं।
ख़ैर, कुछ भी लिख दें, क्या ही फायदा। राम जी का नाम लीजिये, गाय को रोटी खिलाइये, मोदी जी सब ठीक कर देंगे।

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

मित्र के नाम

युद्ध और शांति 

- अंकित झा  


युद्ध और शांति,
दोनों के मध्य छिपा होता है
एक वर्ग।
एक वर्ग जो नहीं चाहता
इनमें से एक।
कई बार एक ही झेलते हैं
दोनों अपने अंदर
युद्ध और शांति।
युद्ध स्वयं से कि इस में हम कहां खड़े हैं
शांति कि अंदर यह युद्ध चल रहा है।
मित्र तुम्हारी इस लड़ाई के साथ
मैं रोज़ यह झेलता हूँ
युद्ध और शांति अपने अंदर।
तुम चाहो तो हमे युद्ध की बधाई दो,
हम शांति के लिए लड़ते रहेंगे
एक पिता के लिए कि वो वापस
आये अपने छोटी सी क्रांति मशाल के पास
एक भाई के लिए जो
अपनी 'प्रिय' को फिर से पढ़े।
एक जीवनसाथी के लिए जो
हाथ थामे अपनी सताक्षी का
और दोनों एक दूसरे को देख कर
कुछ यूं मुस्कुराये कि
युद्ध शर्म से शांति के सामने घुटने टेक दे।।

सोमवार, 10 जून 2019

प्रशंसक का पोस्ट


धन्यवाद युवराज, देश को क्रिकेट से इश्क़ करवाने के लिए.
- अंकित झा 

दुनिया के लिए युवराज 2011 विश्व कप और 2007 टी20 विश्वकप का हीरो होगा. मेरे लिए युवराज क्रिकेट का मेरा पहला पोस्टर बॉय था. मैंने उस दौर में क्रिकेट शुरू किया जब सचिन सहज हो चुके थे, गांगुली कप्तान बन गये थे और हमने विदेश में नए कीर्तिमान रचने शुरू कर दिए थे. अब बाहर जाती गेंदो पर ड्राइव लगाते समय बल्लेबाज़ एक बार सोंचता ज़रूर थे अगर थोड़ी सी भी टाइमिंग में गड़बड़ी हुई तो बैक्वर्ड पोईंट में एक उड़ता पंजाब खड़ा है. नाम युवराज सिंह. ऊँची क़द का वो खिलाड़ी जो नैट्वेस्ट ट्रोफ़ी 2002 के फ़ाइनल में इंगलैंड के ख़िलाफ़ खेले अपने उस 69 रन की पारी से मेरे दिल में बस गया. उसका वो आउट होने के बाद निराश हो के जाना मेरे बचपन की सबसे बड़ी टीस थी. फिर मुझे उसका न्यूजीलैंड में संघर्ष करती भारतीय बल्लेबाज़ी का इकलौता चमकता सितारा याद है जो रन कम बनाता था पर आके खड़ा होता था. जेकब ऑरैम, डीमन टफ़्फ़ी, शेन बॉंड की गेंदें झेलता था. ऑस्ट्रेल्या के विरुद्ध सिड्नी में खेली गयी 139 रन की वो पारी मैं कभी नहीं भूल सकता. रेडीओ पर सुनी गयी वो पारी आज तक मेरे ज़हन में है. ईयन हार्वी को लगाए गये वो छक्के भारत के क्रिकेट में आने वाले बेहतरीन दौर की शुरुआत थी, अगर बारिश नहीं हुई होती तो वो मैच भारत कभी नहीं हारता. फिर 2004 पाकिस्तान के विरध लाहोर टेस्ट में वो शतक जिसमें उसने साबित किया कि टेस्ट में भी वो किसी से कम नहीं है.
2005 में फ़ॉर्म ख़राब और फिर टीम में वापसी के बाद वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध लगाया वो शतक भी कम यादगार नहीं था, जब युवराज के मुँह से गालियाँ फूट पड़ी थी. वो ग़ुस्सा उसके चरित्र की द्योतक थी. दौड़ूँगा, गिरूँगा, फिर उठूँगा, दौड़ूँगा, फिर गिरूँगा, फिर उठूँगा, और यूँ ही क्रम चलता रहेगा. युवराज द्रविड़ की टीम का वो हिस्सा था जिसके बिना जीतना नामुमकिन सा था. प्रमाण के लिए 2006 में लगातार 3 सिरीज़ (दक्षिण अफ़्रीका, पाकिस्तान और इंगलैंड) में मैन और दी सिरीज़ रहे तो टीम तीनों सिरीज़ नहीं हारी और फिर वेस्ट इंडीज़ में जब बल्ला कुछ शांत हुआ तो भारत वो सिरीज़ 4-1 से हारा. 2007 के बाद क्रिक्केट का एक नया दौर शुरू हुआ. टी20 वाला दौर जब क्रिकेट पर चकाचौंध छा गयी. इस चकाचौंध में युवराज सिंह ने अपनी अलग चमक बनायी, फिर वो छः छक्के हों, या कमर दर्द के साथ राजकोट में खेली गयी 138 की अद्भुत पारी. युवराज वो सब हैं जो फ़ैन उसे कहते हैं, वो सब जो आलोचक उसे कहते हैं, वो सब जो उसने हासिल किया, वो सब जो वो नहीं कर पाया, वो सब जो उसके पहले क्रिकेट में था, वो सब उसके बाद भी होगा. युवराज मेरे लिए क्रिकेट था और क्रिकेट मेरे लिए युवराज. युवराज कैन्सर के विरुद्ध लड़ाई है, युवराज 2014 टी20 वि श्व कप फ़ाइनल की नाकामी है, युवराज विश्व कप का हीरो है, युवराज वो यादें हैं जिसने कितनी ही बार हमें उस दौर में मुस्कुराने का मौक़ा दिया जब क्रिकेट इतनी तेज़ नहीं हुआ करती थी.
युवराज मेरे लिए वो सब पारी हैं, जिन सब के बदौलत उनके प्रति मेरी दीवानगी बढ़ती गयी.
युवराज भारतीय क्रिकेट का वो नाम है जिसने अज़हरुद्दीन युग के मध्यक्रम बल्लेबाज़ी की निराशा से गांगुली युग की आशा, द्रविड़ युग के आरोहण और धोनी युग की दबंगई से दुनिया को अवगत करवाया. क्रिकेट के मैदान पर युवराज मुझे हमेशा याद रहेंगे, उनके अलविदा कहने से दुःख तो है लेकिन खेल यही है, जीवन यही है, कुछ भी हमेशा के लिए नहीं है. बाक़ी और भी लिखेंगे, तब तक के लिए इतना ही कि युवराज एक भावना है, आज भारतीय क्रिकेट में एक भावना की लहर थोड़ी कम हो गयी.

रविवार, 9 जून 2019

कविता

परेशानी

- अंकित झा 


सुनों,
उन्हें तुम्हारे चुटकुलों से
परेशानी होने लगी है।
हो सकता है कल तुम्हारे
बोलने से भी होने लगे।
आज हंसाने से हुई है,
कल हँसने से भी होने लगे।
परेशानी ही तो है,
ना जाने कब हो जाये,
किससे हो जाये,
कौन समझाता फिरे,
कौन बताता फिरे,
हमारे हिस्से में कल तक प्रतिरोध था,
आज बस विरोध बचा है,
हो सकता है कल सिर्फ
अनुरोध बचे।
ये सब होने से पहले,
हमें तय करना होगा,
हमारे संघर्ष के आयाम,
जहाँ किसी धर्म के चक्कर में
दो बेटियों में फर्क नहीं करेंगे,
जहाँ जाति को लेकर
मृत मनुष्यों में फर्क नहीं करेंगे,
जहाँ दल को लेकर दो
नेताओं में फर्क नहीं करेंगे,
और भी बहुत कुछ।
जिससे हमारी करुणा
सबके साथ रहे,
हमारा सम्मान
सबके प्रति रहे,
और हमारा मज़ाक
सबके लिए बराबर हो।
इतना ही करना है
इन स्वयंभुओं से लड़ने के लिए,
जो धिक्कारते और ललकारते रहेंगे
तुम्हारी अच्छाई के पीछे छिपी
ज़ाहिलियात को।
लेकिन हम यूँ ही रहेंगे
तटस्थ।
अपने विचारों और संघर्षों के साथ।।

सोमवार, 3 जून 2019

परिवर्तन से परे

यातायात का अधिकार होना ही चाहिए, इसमें यद्यपि-कदापि कुछ नहीं 
- अंकित झा 

शहर में जीवन यापन करने का अर्थ है कमाई व खर्च का हिसाब। कितनी कमाई होती है और उसका कितना हिस्सा हम अपनी सबसे आवश्यक आपूर्तियों के लिए करते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से समाज के उस श्रेणी से आता हूँ जिसमें ये हिसाब रखना पड़ता है, कुछ दिनों के अपवाद के साथ। शहर में रहने के कई खर्चों में मुख्य 4 खर्च हैं: आवास, भोजन, स्वास्थ्य और काम पे जाने का किराया। इनमें से किसी एक के भी बढ़ने पर हमें विचार करना पड़ता है। संतुलन शहरी जीवन का मूल सिद्धांत है।
कभी कभी इन सभी खर्चों के साथ हमें चाहिए सुविधा, सम्मान और सुरक्षा। आवास की। भोजन की। स्वास्थ्य की। और यातायात की?? क्या दिल्ली के यातायात में सुविधा, सम्मान और सुरक्षा है? शायद हाँ और शायद नहीं। फिर भी हम सार्वजनिक यातायात के साधनों से मुंह नहीं मोड़ सकते। दिल्ली के पहले 5 वर्ष 2012 से 2017 तक अधिकांश सफर डीटीसी की बसों में किया है (साथ में क्लस्टर बस भी शामिल हैं)। कुछ समय मेट्रो में भी किया और कुछ दोस्त की गाड़ी में भी। फिर जब कमाने लगे तो कार्यक्षेत्र दूर था और विभिन्न भी तो मेट्रो पे आ गए। दिन के 72 रुपये सिर्फ काम और जाने और आने के। जीटीबी नगर से हौजखास तक। यह बहुत महंगा सफर है। लेकिन यहाँ सुविधा भी है, सुरक्षा भी कुछ हद तक और सम्मान भी कुछ देर तक। मैं अक्सर सोंचता हूँ कि मेट्रो में इतने मर्द क्यों भरे रहते हैं? मेट्रो में एक महिला डिब्बे का होना कोई सम्पूर्णता नहीं है। यह एक खालीपन है। एक डिब्बा विशेष होने के बाद भी संख्या एक तिहाई क्यों है महिला यात्रियों का मेट्रो में? क्या वे यात्रा नहीं करती? मतलब क्या वे काम पर नहीं जाती? क्या वे पढ़ाई करने नहीं जाती? क्या वे घूमने नहीं जाती? क्या वे भी एयरपोर्ट और स्टेशन जाने के लिए मेट्रो को भूल जाती हैं? फिर सार्वजनिक यातायात का क्या मतलब शहर में?
दिल्ली में जब महिलाओं के लिए मेट्रो व डीटीसी बसों में सफर मुफ्त करने का प्रस्ताव आया तो लगा कि सरकार आखिरकार उस चौथे खर्च को समझी है। अगर चौथा खर्चा नहीं होगा तो बाकी तीन पर ध्यान दे पाएंगे। बस और मेट्रो के नाम और अगर सुविधा, सुरक्षा और सम्मान मिलेगा तो शायद दनदनाती कैब और ऑटो से निज़ात मिलेगी। वो महिलाएं जो काम पर जाती हैं अब निश्चिंत होकर बस में सफर कर सकती हैं वो उस 30 रुपये के किराए को वह शायद अपने लिए खर्च कर पाए। रोटी पर, या जो भी वो खरीदना चाहे। कॉलेज में पढ़ने वाली छात्रा को अब मेट्रो कार्ड रिचार्ज करवाने के लिए पैसे नहीं मांगने पड़ेंगे। उस पैसे से शायद वो किताब खरीद ले, या जो मन में आये वो करे।
हाँ मुफ्त की चीज़े बांटने से मुफ्तखोरी की आदत लग जाती है। गलत। सार्वजनिक सुविधाओं का मुफ्त में मिलना एक वेलफेयर सरकार की जिम्मेदारी है। बुनियादी सुविधाएं यदि मुफ्त की जाएं तो वह उन सुविधाओं को समावेशी बनाता है। जो ये तर्क आ रहा है कि महिलाएं अपने खर्च वहन कर सकती हैं, उन्हें कोई रोक नहीं है। शौक से करें। लेकिन आप समाज में प्रतिनिधित्व को अवश्य देखें। सशक्त महिलाएं इसे अपने अभिमान पर ना ले कि हम मुफ्त में कुछ नहीं लेते। मुफ्त कोई एहसान नहीं है सरकारी कर्तव्य है और वो होना ही चाहिए। दिल्ली एक बहुत बड़े शहरी परिवेश का नाम है जिसमे दिल्ली के अलावा, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के भी हिस्से आते हैं। और दिल्ली में काम करने वाली जनसंख्या चहुँ ओर से आती है। यह प्रस्ताव शायद देश मे यातायात के अधिकार को और सशक्त करेगा ऐसी आशा है। सार्वजनिक यातायात के साधनों को तवज्जो देना आवश्यक है। सामाजिक आर्थिक मायनों पर भी यह निर्णय खरा है। अब प्रश्न है खर्च के संतुलन का। सरकार के लिए। वो सरकार देखेगी। और देखना भी चाहिए। आप महिलाओं के साथ खुश हो कि कामकाजी हो या ग़ैरकामकाजी, छात्रा हो दूर शहर से घूमने आए कोई परदेसी सरकारी यातायात के साधनों में चढ़ने से पहले सोंचना नहीं पड़ेगा। सामाजिक ढांचे को सुदृढ़ सबसे पहले उस परत को मजबूत करने से होता है जो सशक्त होते हुए भी दवाब अधिक सहती है। जैसे महिलाएं।
ज़िंदाबाद।।

परिवर्तन से परे

यातायात का अधिकार: महिलाओं से शुरुआत, रास्ते और भी तय होने बाक़ी हैं। 

- अंकित झा
शहर में जीवन यापन करने का अर्थ है कमाई व खर्च का हिसाब। कितनी कमाई होती है और उसका कितना हिस्सा हम अपनी सबसे आवश्यक आपूर्तियों के लिए करते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से समाज के उस श्रेणी से आता हूँ जिसमें ये हिसाब रखना पड़ता है, कुछ दिनों के अपवाद के साथ। शहर में रहने के कई खर्चों में मुख्य 4 खर्च हैं: आवास, भोजन, स्वास्थ्य और काम पे जाने का किराया। इनमें से किसी एक के भी बढ़ने पर हमें विचार करना पड़ता है। संतुलन शहरी जीवन का मूल सिद्धांत है। 

कभी कभी इन सभी खर्चों के साथ हमें चाहिए सुविधा, सम्मान और सुरक्षा। आवास की। भोजन की। स्वास्थ्य की। और यातायात की?? क्या दिल्ली के यातायात में सुविधा, सम्मान और सुरक्षा है? शायद हाँ और शायद नहीं। फिर भी हम सार्वजनिक यातायात के साधनों से मुंह नहीं मोड़ सकते। दिल्ली के पहले 5 वर्ष 2012 से 2017 तक अधिकांश सफर डीटीसी की बसों में किया है (साथ में क्लस्टर बस भी शामिल हैं)। कुछ समय मेट्रो में भी किया और कुछ दोस्त की गाड़ी में भी। फिर जब कमाने लगे तो कार्यक्षेत्र दूर था और विभिन्न भी तो मेट्रो पे आ गए। दिन के 72 रुपये सिर्फ काम और जाने और आने के। जीटीबी नगर से हौजखास तक। यह बहुत महंगा सफर है। लेकिन यहाँ सुविधा भी है, सुरक्षा भी कुछ हद तक और सम्मान भी कुछ देर तक। मैं अक्सर सोंचता हूँ कि मेट्रो में इतने मर्द क्यों भरे रहते हैं? मेट्रो में एक महिला डिब्बे का होना कोई सम्पूर्णता नहीं है। यह एक खालीपन है। एक डिब्बा विशेष होने के बाद भी संख्या एक तिहाई क्यों है महिला यात्रियों का मेट्रो में? क्या वे यात्रा नहीं करती? मतलब क्या वे काम पर नहीं जाती? क्या वे पढ़ाई करने नहीं जाती? क्या वे घूमने नहीं जाती? क्या वे भी एयरपोर्ट और स्टेशन जाने के लिए मेट्रो को भूल जाती हैं? फिर सार्वजनिक यातायात का क्या मतलब शहर में? 

दिल्ली में जब महिलाओं के लिए मेट्रो व डीटीसी बसों में सफर मुफ्त करने का प्रस्ताव आया तो लगा कि सरकार आखिरकार उस चौथे खर्च को समझी है। अगर चौथा खर्चा नहीं होगा तो बाकी तीन पर ध्यान दे पाएंगे। बस और मेट्रो के नाम और अगर सुविधा, सुरक्षा और सम्मान मिलेगा तो शायद दनदनाती कैब और ऑटो से निज़ात मिलेगी। वो महिलाएं जो काम पर जाती हैं अब निश्चिंत होकर बस में सफर कर सकती हैं वो उस 30 रुपये के किराए को वह शायद अपने लिए खर्च कर पाए। रोटी पर, या जो भी वो खरीदना चाहे। कॉलेज में पढ़ने वाली छात्रा को अब मेट्रो कार्ड रिचार्ज करवाने के लिए पैसे नहीं मांगने पड़ेंगे। उस पैसे से शायद वो किताब खरीद ले, या जो मन में आये वो करे। 
हाँ मुफ्त की चीज़े बांटने से मुफ्तखोरी की आदत लग जाती है। गलत। सार्वजनिक सुविधाओं का मुफ्त में मिलना एक वेलफेयर सरकार की जिम्मेदारी है। बुनियादी सुविधाएं यदि मुफ्त की जाएं तो वह उन सुविधाओं को समावेशी बनाता है। जो ये तर्क आ रहा है कि महिलाएं अपने खर्च वहन कर सकती हैं, उन्हें कोई रोक नहीं है। शौक से करें। लेकिन आप समाज में प्रतिनिधित्व को अवश्य देखें। सशक्त महिलाएं इसे अपने अभिमान पर ना ले कि हम मुफ्त में कुछ नहीं लेते। मुफ्त कोई एहसान नहीं है सरकारी कर्तव्य है और वो होना ही चाहिए। दिल्ली एक बहुत बड़े शहरी परिवेश का नाम है जिसमे दिल्ली के अलावा, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के भी हिस्से आते हैं। और दिल्ली में काम करने वाली जनसंख्या चहुँ ओर से आती है। यह प्रस्ताव शायद देश मे यातायात के अधिकार को और सशक्त करेगा ऐसी आशा है। सार्वजनिक यातायात के साधनों को तवज्जो देना आवश्यक है। सामाजिक आर्थिक मायनों पर भी यह निर्णय खरा है। अब प्रश्न है खर्च के संतुलन का। सरकार के लिए। वो सरकार देखेगी। और देखना भी चाहिए। आप महिलाओं के साथ खुश हो कि कामकाजी हो या ग़ैरकामकाजी, छात्रा हो दूर शहर से घूमने आए कोई परदेसी सरकारी यातायात के साधनों में चढ़ने से पहले सोंचना नहीं पड़ेगा। सामाजिक ढांचे को सुदृढ़ सबसे पहले उस परत को मजबूत करने से होता है जो सशक्त होते हुए भी दवाब अधिक सहती है। जैसे महिलाएं।
ज़िंदाबाद।।

रविवार, 2 जून 2019

असम्भव के किनारे

विध्वंश 

- अंकित झा

क्या नज़रिए के साथ हमारी
आँखें और नज़र भी अलग हैं
जो हम नहीं देख पाते समाज को 
एक तरह से? 
क्यों नहीं देख पाते हैं कुछ लोग 
गरम सड़क पर उबलते पैरों को, 
खेत की मेड़ पर आसमान में 
एक तक निहारती आँखों को,
जिन्हें तलाश है पानी एक बूँद की, 
क्यों नहीं देख पाते लाल हो चुके 
हरे-भरे जंगलों को, 
क्यों नहीं दिखता सिर पर मैला उठाए 
मनुष्य 
और भी बहुत कुछ जो कुछ को दिखता है
और कुछ को बिलकुल नहीं 
क्या आँखों के ऊपर भी कोई परत होती है
अलग सी, लेंस की तरह? 
अगर नहीं होती है तो क्यों हमारी आँखें 
भरती नहीं है, 
भीड़ द्वारा मार दिए गये 
किसी परिवार के मुखिया की मृत शरीर को देखकर, 
क्यों ये आँखें भावनाशून्य हो जाती हैं, 
अपनी ज़मीन की रक्षा करते हुए 
शहीद हो रहे आदिवासियों की मृत्यु पर। 
क्या विचारों की तरह 
हमारे दिमाग़ भी अलग हो गए हैं, 
जो नहीं याद कर पाते वो ज़ुल्म, 
वो अपघात, वो दरिंदगी 
जो हम मनुष्यों ने ही की है, 
किसी अन्य मनुष्य पर
जाती, लिंग, धर्म और रंग के नाम पर। 
हमारी कहानियाँ अब अलग 
क़लम से लिखी जाती है, 
हमारी कहानियों में अब काग़ज़ भी अलग 
हो चले हैं, 
हम ऐतिहासिक रूप से 
प्रेम में धिक्कारे हुए समाज हैं, 
कुछ ऊब चुके हैं इस धिक्कर से, 
अतः उन्हें बस अब प्रतिशोध में जीना है, 
कुछ आज भी तलाश में हैं, 
उस प्रेम के जो निस्वार्थ है,
समर्पण और प्रगति के प्रति हमें 
प्रेरित करती है, 
और शायद यही वो अंतर है 
जो नज़र, नज़रिया, आँखें, विचार 
और दिमाग़ को अलग करती हैं। 
वरना कोई मनुष्य 
किसी भी मनुष्य की मृत्यु पर
उन्माद में नाचेगा क्यों? 

सोमवार, 6 अगस्त 2018

परिवर्तन से परे


पंद्रह मर्दों का एक मंच पर हाथ थाम कर खड़े रहना बताता है कि देश में सब कुछ इतनी जल्दी ठीक नहीं होगा
- अंकित झा 

दिल्ली में रह कर महिला उत्पीड़न का विरोध मुझे हमेशा सांकेतिक ही लगता है और ख़ासकर पुरुषप्रधान सामंती सोंच के क्षेत्रीय दल के नेताओं द्वारा यदि वो विरोध जताया जा रहा हो तब तो अफ़सोस भी। 4 अगस्त को दिल्ली के जंतर मंतर पर एक बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई। विरोध में। उस घटना के जो हम सब को अंदर तक झकझोर देती है। ये वो विरोध था जिसमें हम सब को एक स्वर में बोलना चाहिए था आख़िर कब तक? लेकिन ये स्वर राजनैतिक भाषणों में बंध के रह गयी। उस मंच पर खड़े होने के बाद सब की फ़िक्र राजनैतिक परिवर्तन पर जा टिकी। महिला सुरक्षा के मुद्दे को लेकर पुरुषों से सुसज्जित मंच पर जब एक महिला को जब बोलने का मौक़ा दिया जाता है तो लगता है वो उन पुरुषों को भी लपेटे में लेकर बात कहेगी। पर ऐसा नहीं हुआ। महिला सुरक्षा का मुद्दा सिर्फ़ महिला का नहीं है, उतना ही पुरुष का भी है। क्योंकि असुरक्षा का भाव वहीं से उत्पन्न हुआ है। बड़े गर्व से पुरुष कहते रहे कि असली मर्द बलात्कार नहीं करते। यह पुरुषों द्वारा महिलाओं पर किया गया सबसे बड़ा एहसान है। कितनी अच्छी बात है, कि असली मर्द बलात्कार नहीं करते। तो? कुछ और करते होंगे। जैसे संसाधन से वंचित रखते होंगे, अपनी गालियों में शुमार करते होंगे, या फिर निर्मल-कोमल कह कर रानी बना कर छोड़ देते होंगे। सच तो ये हैं कोई भी पुरुष स्वयं से श्रेष्ठ महिला को बर्दाश्त नहीं कर सकता। बर्दाश्त तो दूर ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकता। इसलिए तो महिलाओं के आगे बढ़ने को वो पुरुष की कमज़ोरी बताते हैं, महिलाओं के पिछड़ने को पुरुष की ज़्यादती। लेकिन पुरुषों के लिए ऐसा नहीं है। पुरुषों के लिए हर रूप में पुरुष ही पुरुष है। बस हर कामयाब पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होता आही। पीछे। फिर क्या अंतर ला दिया इस जमावड़े ने जब वहाँ ये कहा गया कि महिलाओं के मुद्दों पर पुरुष का आक्रोश सराहनीय है। पुरुषों ने आक्रोश जता कर कोई तीर नहीं मारा। यह निम्नतम है जो किया जा सकता है और शायद अधिकतम भी। 
मुज्ज़फरपुर में हुई घटना हम सब के सामूहिक अवचेतन को एक करारा तमाचा है। एक घर (शेल्टर होम) 40 के क़रीब बच्चियाँ। और उन में से 34 के साथ दुष्कर्म। जघन्य। ऐसी परिस्थितियों में कि नरेटिव सुन कर रूह काँप जाए। ये एक पल का बहकाव नहीं है। ये सदियों के उत्पीड़न का एक जीता-जागता मिसाल है। हमारे पूर्वग्रहों और मर्दानगि के सामंजस्य से बनी मिसाल। एक महिला को महिला होने तक सीमित करने की मिसाल। अफ़सोस, इस सब में शारीरिक रूप से महिला भी संलिप्त थी। इस सब के मध्य में मुख्य आरोपी उस शहर का एक शक्तिशाली व्यक्ति जो एक तथाकथित समाजसेवक है, पत्रकार है और साथ ही राजनेता भी। मतलब रसूख़ क़तई काम नहीं। और उस पर ऊँगली उठा पाना भी आसान नहीं है। यह सुधार गृह उन लड़कियों के लिए था जो किसी कारण वश पाने घर से दूर थी, अनाथ थी या समाज से बेदख़ल। फिर भी, किसी भी हालात में, इन सब के सम्मान का अधिकार क़तई काम नहीं हो जाता। सामाजिक शिथिलता के समय भी किसी का नागरिक मानव होने का अधिकार कम नहीं हो जाता। फिर इन 40 बचियों को कमतर मनुष्य और कमतर नागरिक क्यों समझा गया? हम सब की नज़र में सहानुभूति के परे वाली बात क्यों नहीं पा रही है? क्या यह सम्भव है कि किसी सुधार गृह में ये सब चल रहा हो और प्रशासन को कुछ पता ही ना हो, और वो भी विभिन्न घटकों द्वारा बार-बार बताने के बाद भी? बताने के बाद भी मीडिया और प्रशासन की चुप्पी क्या साबित करती है? यही कि उस सुधार गृह में रह रही बच्चियाँ मामूली हैं और प्रशासन से जुड़े वो लोग ख़ास। बिहार में दबंगों को हमेशा ख़ास स्थान मिला है। इतना ख़ास कि ये प्रेरणा भी बन जाते हैं, संरक्षक भी और कई बार तो ईश्वर के समकक्ष भी। इतना अधिक कि ये सब अंधश्रद्धा में बदल जाता है। और ये दौर तो वैसे भी अंधश्रद्धा का है। ये अंधश्रद्धा भय का भी दूसरा रूप है और शक्ति का भी। ब्रजेश ठाकुर यही शक्ति है जो भय बन कर भी व्याप्त है और श्रद्धा बन कर भी। 
फिर हैं वो जो एक हो रहे हैं। इस दुष्कर्म के विरुद्ध। होना भी चाहिए। बहुत पहले होना चाहिए था। ख़ैर जब भी हो ये हो रहा है। लेकिन मेरा प्रश्न अवचेतन में विषय को लेकर अस्पष्टता को लेकर है। एक ही मंच पर जब दो राय के लोग बैठे हो समझ में आता है परंतु जब एक मुद्दे पर दो विपरीत विचार रखने वाले हो यह समझ में नहीं आता। राजद के तेजस्वी यादव से मैं विचारों की स्पष्टता की उम्मीद नहीं करता, परंतु लेफ़्ट के नेता तथा जेएनयू के छात्र नेता रह चुके कन्हैया और शेहला का वहाँ होकर भी विचारों की अस्पष्टता पर असहज ना होना निराश करता है। इस समय एक बहुत बड़ा समाजफाँसी की सज़ाके विरुद्ध है। और इसमें लेफ़्ट के नेताओं से लेकर समुदायों में काम आकर रहे लोग भी हैं। शहला कन्हैया भी इस बात को मानेंगे कि किसी महिला के साथ दुष्कर्म उसके इज़्ज़त का लुटना नहीं होता है। दुष्कर्म पुरुष द्वारा किया गया एक अपराध है, और इज़्ज़त लुटना महिला पर थोपा गया एक अपराध बोध। फिर जब मंच से बार-बार ये इज़्ज़त लुटने वाली बात कही गयी तो उन्होंने असहमति क्यों नहीं जताई? बच्चियों की चीख़ यदि सोने नहीं देती तो मंच पर महिलाओं की आवाज़ क्यों नहीं थी? ये मंच महिला अधिकारों की रक्षा के लिए था या बिहार राजनीति को प्रभावित कर सत्ता में असुरक्षा पैदा करने के लिए? इस समय कोई भी राज्य पूर्णतः आश्वासन नहीं दे सकता कि महिलाओं के लिए वह सुरक्षित है। गुवाहाटी में जब रात के 9 बजे एक लड़की को एक भीड़ ने निर्वस्त्र किया था तब भी, जम्मू-कश्मीर-राजस्थान-मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में मासूम बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्म। फिर बिहार में हुई ये घटना। 34 बच्चियाँ। ऐसी स्थिति सोंच के मन सिहर उठता है कि ये सब किस दौर से गुज़री हैं, और किस मनोस्थिति से गुज़र रही हैं। यह पूरी जद्दोजहद पूर्ण मनुष्य बनने की क़वायद मात्र है। हमारा समाज दुष्कर्म झेल चुकी महिला को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं करता, क्योंकि वो मान चुका है कि महिला का शरीर और ख़ासकर शरीर के कुछ अंग ही महिला है। तभी तो उसकी चीख़ों भारी अतिशयोक्ति बना बना कर राजनेता चिट्ठियाँ लिख रहे हैं। इस उम्मीद में कि पूरे समाज और पुरुष प्रधान सोंच का दोष एक सरकार पर थोप दिया जाए। सरकार गुनहगार है, बिलकुल है। इसलिए नहीं कि प्रमुख अभियुक्त उस पार्टी में रह चुका है, इसलिए नहीं कि मंत्री का पति भी अभियुक्तों की सूची में है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि उसने एक अल्पावास गृह को यूँ ही वीरान छोड़ दिया। अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझी। बार-बार प्रश्न पूछे जाने पर भी कार्रवाई नहीं किया। माफ़ी माँगने में महीनों लगा दिए। अब बारी सरकारी तंत्र के गुनाह गिनाने का है। ख़ैर छोड़िए। इसको ना ही गिने तो ठीक।  
यह दोष एक सरकार या एक सरकारी तंत्र का तो है ही यह हम सब की एक सामूहिक हार है। वही हार जो हम वर्षों से हारते रहे हैं, और अभी सदियों तक हारते रहेंगे। क्योंकि हम सब में से किसी को न्याय और अनुचित बातों को रोकने की नहीं पड़ी हुई है। हम सब अंधेरे में लाठी पीट रहे हैं, उस परछाईं को ढूँढते हुए जो है ही नहीं। क्या ही बदल दिया हमने और क्या ही बदल लेंगे। क़ानून ले आएँगे। फाँसी की माँग कर लेंगे। दुनिया में एक लिस्ट के अनुसार हम सबसे असुरक्षित धरती है महिलाओं के लिए। बिलकुल हैं। जब तक सड़क पर वो घूरती नज़रें हैं, जब तक घरों में वो छुअन है, जब तक वो बस में लगे धक्के हैं, जब तक मेसिज में आए कुछ ख़ास अनुरोध है, और जब तक महिला के मुद्दों पर बात करने के लिए एक मंच पर चार महिलाएँ और 50 मर्द हैं असुरक्षा बना रहेगा।