शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

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विवेक और विश्वास के मध्य छिपा चिंतन
                                 -    अंकित झा

उस राह पर चलते रहे जिस पर राहगीर न मिलें,
शायर तो कई मिले पर कबीर न मिलें..

मुझे ज्ञात नहीं कि भारतीय समाज की उदासीनता कब समाप्त होगी? यह उदासीनता विवेक के विवेचना बन जाने का है तथा यह विश्वसनीयता की सबसे बड़ी विडंबना है. अक्सर इस देश के विवेकशील व्यक्तित्व के प्राणी समाज में तर्क-वितर्क के खेल को कुतर्क में बदल देते हैं तथा यह समाज के लिए उदासीनता का एक बड़ा कारण बनती है. विवेक का अर्थ क्या है? विचार-विचारधारा-विश्वास तथा विद्रोह का समागम, विद्रोह समाज में नयी लौ के आरोहन के विरुद्ध. हां, यही कुछ चले आ रहे परम्परावादी घटकों के ऐसे आदि हो चुके हैं कि कब समाज दो धारों में बंट जाता है किसी को पता ही नहीं चलता. महाभारत में पांडवों के विजय को धर्म का पराजय मानने वाले भी बहुत हैं तथा विजय मानने वाले भी, यह निर्भर करता है, विवेक पर, जो हर नयी प्रत्युषा को अपनी पाली बदलता है, हर चाय की चुस्की पर नए तर्क को जन्म देता है, तथा कभी वीभत्स योजनायें बनाता है तो कभी विचारशील चिंतन को जन्म देता है.
कहते हैं समाज व इसकी राजनीती व्यवहार से चलती है, ये व्यवहार कुछ और नहीं बल्कि मनुष्य का मनुष्य पर विश्वास है, मनुष्य का मनुष्यता पर विश्वास है. दिल्ली में परिवर्तन अपने वत्सिमा से उठकर आगे की ओर बढ़ने जा रहा है, गोयाकि यह निर्णय पूर्ण रूप से जनता के द्वारा पारदर्शिता से लिया गया. फिर भी आम आदमी पार्टी का दिल्ली में विजयघोष कसी समाज के व्यावहारिक हार की साक्षी बनी सभी ने देखा. एक नयी धरा को कैसे शातिर राजनीतिक प्रपंचों में घेर कर इसकी साँसें निकलने की कोशिश की जा रही है, सभी देख रहे हैं, कुछ पन्नो के पन्ने खर्च किये जा रहे हैं तो कुछ मौन हैं. मौन रहने वाले ये वही विवेकशील व्यक्ति हैं जो अपने आप को सर्श्रेष्ठ ज्ञाता समझते हैं, इनकी नज़र में देश के सूत्रधार बनने की अद्भुत क्षमता जो इनमे है वो किसी और में नहीं. राजनीतिक समझ जो इनको है वो तो कौटिल्य की भी न थी और न ही वृहस्पति की  है. क्या होगा ऐसे समाज का जहां विरोध विवेक का आश्रय है तथा, विश्वास एक नाज़ुक सी डोर जिस पर उम्मीदें लचक रही हैं, ज्ञात नहीं कब छिटक जाये. भारत में वोट किसके नम्म पर पड़ते हैं व्यक्ति, विवेक या विश्वास? कोई निश्चित उत्तर नहीं है इसका. परन्तु विवेक के नाम पर तो नहीं, एंटी-एस्टाब्लिश्मेंट की बात करने वाले विवेकशील व्यक्ति कभी एस्टाब्लिश्मेंट की खामियों पर नज़र क्यों नहीं दौड़ाते? हमारा देश दो खेलों में सदा से पारंगत रहा है; खो-खो व कबड्डी, एक खेल में जहां अपनी ज़िम्मेदारी दुसरे पर धकेलना पड़ता है वही दुसरे में सामने वाले की टांग खींचना है. इस काम में भरतीय सबसे आगे है, किसी की प्रगति को गले उतारना हमारे खीर की शक्कर नहीं, तथा स्वयं ज़िम्मेदारी उठाना भी. ये वही लोग हैं जो अंग्रेजियत को अंग्रेजी में ही गलियाते हैं, तथा सबवे में बैठकर भारत का अमेरिका के गुलाम होने की बात करते हैं. करबद्ध निवेदन है, जनेऊ पहनकर कर इन हड्डी चूसने वाले विद्वानों से कि विवेक की सार्थकता को कायम रखना है तो विश्वास की नीति का सहारा लेना ही उचित है, जहाँ अहंकार हो जाता है वहाँ धर्म नही बस सकता और जहां धर्म के लिए जगह नही वहाँ प्रगति के असार नहीं होते.   



सोमवार, 31 मार्च 2014

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चुनाव विशेष 

व्यक्ति विशेष तथा आम से आदमी का संघर्ष 
                                         - अंकित झा 

अमन बिक रहा है, चमन बिक रहा है,
गरीबों के नसीब का कफ़न बिक रहा है.
कोई शर्म नहीं है कहने में कि,
इन रहनीतिक दलालों के हाथों,
ये हमारा वतन बिक रहा है.”
-    एक आम राजनीतिक कार्यकर्त्ता.

12 वर्ष बीत गये उस त्रासदी को, लपट आज तक बरकरार है, इतिहास कितना महत्वपूर्ण हिस्सा है हमारी ज़िन्दगी का अब पता चल रहा है. चुनावी सरगर्मियां अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच चुकी है, हर और तीखे बयान, आरोप-प्रत्यारोप, अपनी शेखी, बड़ी बड़ी डींगे, तो वही घिसे पिटे चुनावी वादे. यही यही दिख रहे हैं, आपके अपने उम्मीदवार, आपके बीच से, आपकी सेवा के लिए, आपके समर्थन हेतु उपलब्ध है, बस मतदान तो कीजिये और छोड़ दीजिये देश अगले कुछ समय के लिए इनके हवाले. आप अगले 5 साल इन्हें अपने मत की गरिमा का मुखौल उड़ाते देखिये. कभी संसद में, कभी प्रेस वार्ता में, कभी अलग अलग सभाओं में तो कभी टीवी साक्षात्कार में. कहीं प्रयोग है, कहीं कुर्सी का सुयोग है, कहीं कुर्सी जाने का वियोग है, कहीं अपने शक्ति का विलक्षण उपयोग है. हर ओर एक अजीब सा दावानल है, धधकती आशाएं और आकांक्षाएं, नित्य अंकुरित होते स्वप्न और धराशायी होती साख.
यह चुनाव एक चुनाव मात्र नहीं है, यह एक आइना है, अपनी औकात दिखाने हेतु, अपना चेहरा दिखने हेतु, आगे का मार्ग प्रशस्त करने हेतु, ग़ालिब का शेर है, “तू न देख कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे, तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे”, अबकी चुनावी मौसम में सटीक बैठता है. जनता के आगे अपना रंग देख लें नेता जि, आपकी यही औकात है, ये बिगड़ गयी तो कुर्सी के पाए तोड़ देगी. उदहारण देख लीजिये कभी जिस सीट से रिकॉर्ड जीत हासिल कि थी, उसी सीट से हार का सामना करना पीडीए था केन्द्रीय मंत्री रहे राम विलास जी पासवान को. ये जनता है, कुछ भी कर सकती है, कमोबेश अपने मन में हो, और अपने मन का करना चाहती हो. जनता मुद्दा नहीं देखती, यदि ऐसा होता तो ६५ साल से, 4 मुद्दे देश के चुनाव तय नहीं करते, बिजली, पानी, सड़क और आरक्षण. इस बार रोटी, भ्रष्टाचार से मुक्ति, रोजगार, कुछ नये सपने और बहुत कुछ नया नया आ गया है. सच तो ये है कि इस बार नया पुराना समागम है. हाँ, ये चुनाव अलग है, ऐतिहासिक है, अलौकिक है, ऐसा चुनाव पहले कभी नहीं हुआ. इस चुनाव में मुद्दा नहीं है, मॉडल है, मोदी है, कोई मोदी के समर्थन में है तो कोई उसके विरुद्ध. परन्तु हर जगह मोदी है, हर हर मोदी घर घर मोदी. कोई अराजक कहे, कोई बडबोला परन्तु सुनने को सब तैयार हैं. ये चुनाव आम चुनाव नहीं है, ये मोदी चुनाव है, आम चुनाव में आम बात नहीं होती, यहाँ तो समूचा माहौल ही आम है, मोदी कि आम बातें तथा मोदी के आम समर्थक. मोदी पर लगने वाले आम आरोप, आम से प्रत्यंच तथा आम से प्रलोभन. हर चीज़ आम है, सिर्फ एक व्यक्ति को छोड़कर. वो विशेष हैं, मोदी. ये चुनाव मोदी विशेष हैं. अतः ये विशेष चुनाव है.  
मानव इतिहास इस बात कि साक्षी रही है कि जब जब ऐसा कुछ हुआ है, किस तरह परिवर्तन होते होते रह गया है, आगे क्या होने वाला है कोई नहीं जानता, सिर्फ इतना पता है, कुछ अलग होगा, इतनी उम्मीदें एक साथ गलत नहीं हो सकती, नहीं कतई नहीं. दिल्ली में क्या हुआ? क्या हुआ? उम्मीदें टूटी न? कैसे धराशायी हुई इतनी उम्मीदें, इतने उम्मीद के साथ नवाज़ा था सत्ता, एक आम से आदमी को. कितने सपने दिखाए थे, इन आँखों ने अच्छे समाज पर विश्वास करना प्रारंभ कर दिया था फिर कैसे अगले डेढ़ महीने हमारे उम्मीदों से खिलवाड़ किया गया. वसुंधरा के कुछ लड़कों ने वसुधा को लूटने की कोशिश तो नहीं की परन्तु हमारी उम्मीद लूट के ले गये. अब विश्वास करने का मन नहीं करता किसी पे, सब बहकावा ही लगता है, सब खोखले वादें लगते हैं. ये सबका कहना है. परन्तु जो सब कहें आवश्यक नहीं कि वो सच ही हो, राजनीती और शतरंज में यही तो समानता है कि पहले प्यादों को मरने का मौका दिया जाता है, बड़े नेता के विरुद्ध छोटा उम्मीदवार. ताकि नेता भी न हारे, और हम पर ये इलज़ाम भी न आये कि हमने कोशिश नहीं की. परन्तु ये पार्टी अलग है, बड़े नेता के विरुद्ध बड़ा नेता उतरना जानती है, अर्थात राजनीती से इत्तेफाक नहीं रखती. जीत कि मोह नहीं, हार की चेष्टा नहीं. कजरी दिल्ली से, गाजियाबाद से, हिसार से, राजस्थान से, किसी भी बड़े शहर से लड़ सकते हैं, जीतने की उम्मीद कर सकते हैं, वाराणसी ही क्यों? ताकि उन्माद कम हो, विशेष आदमी का प्रचार भी विशेष हो. मुघालते में न रहे, जैसे शीला दीक्षित रह गयी थी. वो दौर थोडा अलग था, झाड़ू तब नई थी, अब थोड़ी पुराणी है, और सफाई करते करते थोड़ी गन्दी भी हो गयी है, और कुछ मैले होने का इल्ज़ाम भी लग गया है. फिर भी राजनीती में दाग़ अच्छे हैं. राहुल गाँधी के विरुद्ध कविवर का खड़ा होना. राजनीती में दर पर जीत ही, असली जीत है. शत्रुघ्न सिन्हा के सामने शेखर सुमन की क्या बिसात, फिर भी १५००० से भी कम वोट से हारे, क्योंकि घबराये नहीं. ऐसा ही होता है और ऐसा ही होना चाहिए. देश को जितनी आवश्यकता मोदी की है, उतनी ही आम से आदमी की भी. आलोचक कुछ भी कहे, दिल पे हाथ रख के नहीं कहेंगे कि मोदी पूरे साफ़ हैं और आम से आदमी पूरे गंदे. यही साख है, अपने चरित्र पर दाग़ लग जाए परन्तु आत्मा पर दाग़ न लगने पाए. उम्मीद है, देश आम से आदमी को मौका देगा, सरकार बनाने की न सही परन्तु संसद में अपनी बात रखने की, सत्ता का मोह तो वैसे भी इन्हें नहीं है, होता तो दिल्ली की कुर्स क्यों जाने देते, लोकसभा में प्रचार के लिए. नहीं, ऐसा सोंचते हैं तो राजनीतिक समझ बढाइये. कजरी कतई गलत नहीं हैं ये कहने में कि एक सरपंच या एक पार्षद भी ये हिम्मत कर सकता है कि वो हाथ आये सत्ता को इस तरह छोड़ दे. मुख्यमंत्री तो बहुत बड़ी बात है, प्रधानमंत्री को देखिये, इतिहास बनाने और मिसाल बनने के कई मौके गवांये. १०० दिन में महंगाई कम तथा अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने का वादा, विफल हुए, कोयले का दाग़ लगा, डटे रहे, विफल हुए, भ्रष्टाचार के आरोप सरकार पर लगते रहे, चुप रहे, विफल हुए. एक बार भी अगर दिल पे हाथ रख के, इस्तीफा देने की बात भी कर देते मिसाल बन जाते कि वो दुखी थे, सरकार पर लगने वाले दागों से, परन्तु विफल रहे. ऐसी दुखद विदाई की कल्पना किसने की होगी, इतने होनहार व्यक्ति की.  

अब की बार जिसे भी वोट दें परन्तु वोट अवश्य दें. कोई भी जीते, लोकतंत्र की जीत आवश्यक है. कब तक वोट की अहमियत ख़त्म होती रहेगी, इस बार स्वयाम्भुओं को दिखा ही दें कि वोट की कीमत क्या होती है. और इससे खिलवाड़ की कीमत क्या होती है, अपने सपनों को कवाब और साड़ी पे बिकने मत दीजिएगा, यदि ऐसा हुआ तो कोई नेता विशेष या आम सा आदमी देश नहीं बचा पायेगा. तीसरे को तो उल्लेखित ही नहीं करना चाहुंगा, इतिहास उन्हें सजा देगी, 10 वर्षों तक किये गये पापों की सजा. फिर जब समय आएगा तब उन्हें भी मौका दिया जायेगा. इस बार तो इन दोनों में ही विकल्प ढूंढा जाए. कुछ और भी हैं जो अपनी आदर्शवादिता के स्वयं ही शत्रु बन बैठे हैं, कुछ समाजवादी, कुछ साम्यवादी, तो कुछ सिर्फ अवसरवादी. देश इनके साथ साथ अपने ओर भी देख रहा है, अब परिवर्तन आएगा शायद.  

रविवार, 30 मार्च 2014

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असहिष्णु अस्तित्व के अवतारी
-          अंकित झा

पूज्यनीय कौन है? जो कभी पूजे जाने की चाह न रखता हो. आदरणीय कौन है? जिसके लिए आदर स्वतः ही निकल जाये, कभी यूँ भी होता है कि आदरणीय बनाने की श्रृंखला सी लग जाती है, आदर उसे मिले जिसे इसकी इच्छा व अपेक्षा न हो. बीते दिनों अहमदाबाद जाना हुआ, (वृत्तान्त अलग से उपस्थित है) साबरमती आश्रम में गाँधी संग्रहालय के बाहर लगे गाँधी के प्रतिमा पर तरह तरह से तसवीरें खिंचवाने की होड़ लग गयी. किसे फुर्सत थी कि जरा ध्यान देकर एक बार को ये सोंच ले कि क्या कर रहे थे. मेरी एक काल्पनिक मित्र है जो दिल्ली के ही नामी कॉलेज में अध्ययनरत है, उसके कॉलेज की ही कुछ लड़कियां हमारे हत्थे चढ़ी थी, एक ने तो हमारे कैमरे पर इतना जोरदार प्रहार किया था कि टूटते टूटते बचा. कोई गाँधी के सर पे हाथ फेर रहा है, कोई कंधे पे हाथ डाले बैठा है, कोई चश्मा पहना रहा है, कोई माला खींच रहा है, तो कोई गोद में बैठने को आतुर है. यह नए समाज की नयी नस्ल है, ये गाँधी विरोधी हैं या नही ज्ञात नहीं परन्तु ये नयी अंकुरण ज्ञान के शून्य हैं ये तय है. 
इसी बात पर मेरी उस मित्र से बात हुई, उसने कहा हाँ लड़कियों ने गलत किया परन्तु गाँधी इतने भी कोई सम्मान के हक़दार नहीं थे. सम्मान, सहिष्णुता व समझदारी एक बात नहीं होती. परन्तु न मानने का अर्थ अपमान करना तो नहीं होता. हां मैं कोई गाँधी समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस नयी पिशी के गाँधी-विरोधी होते जाने के क्या कारण हैं. ये पीढ़ी उनके विचारों से लेकर उनके कृत्य तक हर विषय पर उनके विरोध में खड़ी है. ये पीढ़ी गाँधी से बड़ा आदर्श उनकी हत्या करने वाले हिन्दू राष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे को मानने लगी है. यह घृणा है, या फिर सिर्फ समर्थकों कि कमी या फिर समय की करवट मात्र? भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस तथा बाबा साहब आंबेडकर समेत सरदार पटेल को आज की पीढ़ी नायक के रूप में देखती है तो वहीँ गाँधी, नेहरु को दरकिनार करने का एक मौका नहीं गंवाती. क्या आज की पीढ़ी के लिए पकिस्तान का बंटना गलत था या फिर नेहरु का प्रधानमंत्री बनना, या फिर गाँधी का पकिस्तान को 55 करोड़ देने के पक्ष में भूख हड़ताल पर बैठने के फैसले से नाराज़ है? नहीं ऐसा कुछ नहीं लगता, कुछ तो खिलाफत आन्दोलन के समर्थन को गलत मानते हैं, तो कुछ उनके असहयोग आन्दोलन को वापस लेने के फैसले से आहात होते हैं आज तक. कुछ उनके मुस्लिमों के पक्षधर होने के कारण उनसे नाराज़ होते हैं तो कुछ उनके इरविन पैक्ट पर हस्ताक्षर करने के फैसले पर. सिद्धांत व सत्य में एक अंतर निहित है, ये अंतर ये है कि सिद्धांत को सिद्धि की आवश्यकता होती है तथा सत्य को स्वीकृति की. अतः सिद्धि व स्वीकृति के मध्य गाँधी की दार्शनिकता अटक के रह जाती है, गाँधी की दार्शनिकता सिद्धांत है, जिसे सिद्ध करने की आवश्यकता है, ये सत्य नहीं हैं जैसा कि अब तक दर्शाया जाता रहा है, यहाँ पे इतिहास विफल हो जाता है. इतिहास आज किसी के लाठी, धोती और यिनक की ग़ुलाम बन बैठी है, गाँधी परम सत्य कतई नहीं हैं. ऐसी कतई व्यसनें हैं जो गाँधी को गाँधी अर्थात परम इतिहास बनने से रोकती है, कई कारण विश्व को ज्ञात हैं तो कतई अब तक कहीं छुपी हुई या कहें छुपाई हुई. उस मित्र से मेरी बहस का अधर ये था कि उसका कहना था गाँधी को लेकर देश अपनी आँखें मूंदें हुए है, गाँधी को आवश्यकता से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुका है, जैसा कि नहीं होना चाहिए था. कहा जाता है कि गाँधी अनुभूति पर विश्वास नहीं करते थे, वो अनुभव में विश्वास करते थे, इस अनुभव के लिए वो प्रयोग किया करते थे. किवदंतियों के अनुसार ब्रम्हचर्य में स्खलन के बचाव हेतु वो कई बार पर स्त्रियों के साथ हमबिस्तर होते थें, यहाँ तक कहा जाता है कि उनकी पौत्री मनु को भी कई बार उनके साथ एक ही बिस्तर पर, नग्न अवस्था में सोते देखा गया था. गाँधी त्याग में विश्वास रखते थे, वे स्वाबलंबी थे, कस्तूरबा को उन्होंने कुलीन रिवाज़ छोड़कर स्वयं पखाना साफ़ करने के लिए प्रेरित किया था. परन्तु एक सत्य यह भी है कि वो कई बार आश्रम की स्त्रियों के सामने नग्न घुमा व स्नान किया करते थे, स्त्रियों के कंधे थाम कर चला करते थे. महाराष्ट्र से आये उनके एक शिष्य के चिट्ठी से ये खुलासा होता है. साथ ही साथ गाँधी वध के दोषी नाथू राम गोडसे द्वारा दिए गये अदालत को कारण जिसे कि एक पुस्तक के रूप में संकलित किया गया, (जो कई वर्षों तक प्रतिबंधित भी रहा था) के अनुसार भी गाँधी को मारने के 6 प्रयास हुए थे, खिलाफत के बाद से उनके संहार तक. हालाँकि गोडसे के कुछ कारण उनके मंशा को कमजोर कर देते हैं परन्तु अधिकांश कारण चीख चीख कर यह कहते हैं कि गाँधी परम सत्य नहीं थे, ग़ुलाम देश में उन्हें इतनी आजादी कहाँ से प्राप्त हो गयी थी कि वो जो चाहें प्रयोग कर सकते थे. सबसे बड़ा दोष है आश्रम से नित्य आने वाली करुण रुदन की दयनीय आवाज़. गाँधी आश्रम स्वच्छ नही था, ये दूषित था, यहाँ सिद्धांत के साथ साथ दुर्व्यसन भी पलता था, इसे जो नाम दे दिया जाये वो सही. गाँधी अपने अहिंसा के कारण प्रसिद्द थे, आश्रम में किसी भी तरह का हिंसा वर्जित था, यहाँ तक कि यौन सम्बन्ध बनाने पर भी रोक थी, क्योंकि ये भी एक तरह का हिंसा है परन्तु बा के साथ हुए हिंसा का क्या? गाँधी के प्रयोग के दौरान होने वाले हिंसा का क्या? गाँधी ने भगत सिंह के बम काण्ड को दमनकारी तथा पागलपन कहा था, उसी भगत सिंह ने 63 दिवस ताज हक़ के लिए भूख हड़ताल किया था तथा अंग्रेजी हुकूमत कि जडें काँप गयी थी, २३ वर्षीय भगत सिंह के समाजवादी सिद्धांत 70 वर्षीय गाँधी के सिद्धांतो को आसानी से टक्कर देते थे, गाँधी सकारात्मक सोंच वाले, आस्तिक तथा कौमी एकता को मानने वाले थे, उनपर अध्यात्म की छाप उनकी माता पुतली बाई के समय से ही था. आश्रम में सुबह शाम भजन गूंजा करते थे, सारे विषों-विपदाओं को काटने वाले भजन. “वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पेड परे जाने रे”, परन्तु गाँधी से यूँ भगत के माता-पिता व देश के युवाओं का दर्द क्यों नहीं देखा गया, यह रहस्य है. पर्दा उठाना नामुमकिन सा है. सिर्फ गाँधी, उस फांसी को रोक सकते थे. परन्तु ऐसा नहीं हुआ. देश के सपूत हंसते हंसते फांसी को चूम गये, गाँधी मौन रहे. सदा की तरह उनमे बौखलाहट नहीं दिखी. गीता में लिखा है कि जिस समय सारे तर्क विफल हो जाते हैं, उस समय शस्त्र उठाना ही पड़ता है, परन्तु गाँधी के शस्त्र ना उठाने की जिद्द देश को कई वर्ष पीछे ले गयी. न देश तब तैयार था और न वास्तविक आजादी के समय. और देश को ऐसे प्रधानमंत्री का तौफा दिया कि देश के मुकूट को ही विश्व समस्या बना कर रख दिया.  

कारण कईं हैं, परन्तु गाँधी कौन है ये कोई नहीं जान पाया. और न जान पायेगा य इतिहास उसे जानने नहीं देगा. क्योंकि कलम सिर्फ उनकी जय बोलता है जिनकी स्याही किसी के सजदे झुक गया होता है और इतिहास सिर्फ उनकी गवाही देता है जो अपने नाम को बेचना जानते हो. कभी फिर बहस छेड़ेंगे, अनशन पर बैठकर गाँधी के लिए न सही तो गाँधी के विचारों ही के लिए सही पर एक बार को आँखें जरुर मूँद लेंगे और कहेंगे “आज फिर से किसी माँ की कोख में हलचल सी मची है, शायद ये नए क्रांति के अंकुरण का समय है.”     

सोमवार, 10 मार्च 2014

Movie Review

आधुनिकता व यथार्थ के रस से बनी है 'क्वीन' 
                                          - अंकित झा 

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दो फिल्में रिलीज़ हुईं, दोनों ही महिला केन्द्रित तथा दोनों ही छोटी बजट की बड़ी अपेक्षाओं वाली फिल्में. आज के दौर में जब हर ओर स्त्री विमर्श का बोलबाला है, उस समय ऐसे मौके पर फिल्म के रिलीज़ होने का अर्थ है, मुनाफा. मैं भी किसी एक फिल्म को देखना चाहता था, एक ओर समकालीन शीर्ष अभिनेत्री रह चुकी दो महाभिनेत्रियाँ(माधुरी दीक्षित तथा जूही चावला) थी तो दूसरी ओर नित्य संघर्षरत नई त्रासदी साम्राज्ञी बनने जा रही अभिनेत्री (कंगना रानौत). एक ओर शीर्ष कलाकारों से अलंकृत फूहड़ संवादों वाली यथार्थ के करीब वाली काल्पनिक कहानी थी तो दूसरी ओर निम्न ही सही परन्तु अध्ययनरत कलाकार के परिश्रम का परिणाम. एक ओर वो फिल्म थी जिसके मुख्य कलाकार की पिछली फिल्म मेरे सर्वकालीन पसंदीदा फिल्मों में शुमार है तो दूसरी ओर के फिल्म के कलाकार की पिछली फिल्म को मैं जल्द से जल्द भूल जाना चाहता हूँ, रज्जो तथा कृष3. फिर ऐसा क्या था जो मुझे गुलाब गैंग की जगह क्वीन देखने को जी चाहा? उत्तर तय है, फिल्म का ट्रेलर, संगीत तथा निर्माण से जुड़े लोग; अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवाने, अन्वित्ता दत्त, अमित त्रिवेदी तथा विकास बहल जैसे लोगों का नाम जिस फिल्म से जुड़ा हो उसे यूँ ही तो नहीं जाने देना चाहिए. उस पर से कंगना रानौत की विलक्षण प्रतिभा को दर्शाता मनमोहक ट्रेलर.
अमित त्रिवेदी का संगीत तथा लभ जुनेजा की आवाज से अलंकृत गीत से फिल्म की शुरुआत तथा गीत के ठीक बाद आने वाले मोड़ और कहानी का नित्य बढ़ते रहना. फिल्म एक अद्भुत यात्रा है, मनुष्य का स्वयं में विश्वास तथा स्वयं के साथ सहवास का. साथ ही साथ यह एक कटाक्ष है, हमारे समाज पर जहां आज भी कहीं न कहीं मायेके की गुडिया बनाकर ही बेटियों को खुश कर दिया जाता है, जो कि फिल्म के एक गीत की पंक्तियाँ ज़ाहिर करती हैं, “बाबुल के अंगना में, अमवा के तले, मैहर की दुलारी नाजों से पले”. फिल्म की मुख्य पात्र ‘रानी’(कंगना) एक छोटे से कॉलेज से गृह विज्ञान पढ़ रही है, कॉलेज किस क्षेत्र में है यह भी वो ठीक ठीक नहीं जानती, पूछने पर वह पूरा पता बता देती है, परन्तु जगह नहीं बता पाती. किसी के इज़हार-ए-इश्क का उत्तर देना भी नहीं जानती, i love you का उत्तर वो धन्यवाद कह कर देती है. विदेश जाने पर अपना पता वो दिल्ली नहीं राजौरी बताती है. राजौरी गार्डन से उठकर पेरिस व अम्स्तेर्द्रेम का सफ़र मनमोहक व संघर्षपूर्ण है. एक लड़की जिसे शादी के २ दिन पहले लड़का केहता है, वो उससे शादी नहीं कर सकता, कारण नहीं बताता. कारण साफ़ है कि लड़की उसके ओहदे से मेल नहीं खाती. समाज भी तो दुष्ट है, भोलेपन को बेवकूफी समझ लेता है. विजय(राजकुमार) के संग अपने सपने सजा चुकी रानी, ये सुनते ही बिखर सी जाती है. परन्तु बहुत जल्द वो खुद को संभालती है व फिर शुरू होती है एक अद्भुत यात्रा. रानी परिवार से अनुमति लेकर निकल जाती है, अपने सपनों के शहर पेरिस के लिए, अपने हनीमून पर, अकेले.
अजनबी शहर, नए लोग, अनजान भाषा, अलग संस्कृति तथा चिंता व कुंठा. रानी परेशान हो जाती है. एक-एक सपनों को वो अपने सामने टूटते हुए देखती है. परन्तु परदेस में उसे किसी अपने की तलाश समाप्त होती है, जब उसकी मुलाकात होती है, विजय लक्ष्मी(लिसा) से. लक्ष्मी के साथ रानी की मित्रता उसे नए राह पर ले जाती है, जहां वो अपने लज्जा से मुक्त होती है, खुलने को दिल करता है, तो hindi गानों पर थिरकने को विवश हो जाती है, और फिर पूरे क्लब को नचा देती है. कभी शराब पीकर अपने दिल की व्यथा लोगों से कहती है. फिर उसका ये कहना कि हमारे यहाँ तो लड़कियों को डकार करना अलाव ही नहीं है, वहाँ पर तो बहुत कुछ अलाव नहीं है. यहाँ पर तो सब कुछ कर सकती हैं, झकझोरता है. और स्त्रिविमार्षकों के दिल में चिंगारी लगता है. कभी घर से अकेले भी नहीं निकलने वाली परदेस में 3 अजनबी विदेशी लड़कों के साथ एक ही कमरे में रहती है. एक जापान से है, एक रूस से तो एक फ्रांस से. चारों अम्स्तेर्द्रेम की गलियों को नापते हैं व अपने जिंदगी को खुशियों से भर लेना चाहते हैं. सभी की अपनी व्यथाएं हैं जो कहानी को बल प्रदान करता है, जापानी लड़के के हंसी के पीछे छुपी है, २०१२ में आये सुनामी में अपने मात-पिता को खोने का दर्द, तो ओलेक्जंदर की ख़ामोशी व गुमनाम कलाकारी के पीछे किसी क्रांति के निमंत्रण की चेष्टा है. सभी एक दुसरे की ख़ुशी में हँसते हैं, सभी छिपकली से डरते हैं, सभी एक दुसरे के लिए रोते हैं, भावनाओं की इस उतार चढाव के बीच हम अपने आप को उनके बीच पाते है. फिल्म को इतनी सुन्दरता से नियंत्रित किया गया है कि यह कागिन भी बनावटी नहीं लगती. गोलगप्पा खा कर मुंह जलना हो या मछली के आँख निकलने पर डरना और इफेल टावर से घबरा कर भागना, हर चीज यथार्थ के करीब ही लगती है. मानवीय मुस्कान के पीछे छुपे दर्द को ज़ाहिर करती दो लड़कियां जो रानी की जिंदगी में स्वतः ही आती हैं व उसके जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं. लक्ष्मी का खुलापन रानी को अटपटा अवश्य लगता है परन्तु वो उसे स्वीकार करती है, वहीँ हॉलैंड में रुखसार का एक सेक्सवर्कर के रूप में कार्य करना उसे पसंद नहीं हैं परन्तु उससे भी अपनापन जता जाती है. ये सब किरदार हमें सोंचने पर मजबूर करती हैं तो कुछ दृश्य हमें खिलखिलाने के लिए विवश कर देते हैं.
यह एक लाजवाब फिल्म है, भावनाओं के उतार चढाव को काफी कुशलता से निर्देशक ने सजाया है, जिससे ये फिल्म याद रखने लायक बन जाती है, साथ साथ चलने वाला अमित त्रिवेदी के संगीत का जादू. नज़र व कान दोनों ही हटाने को जी नहीं करता. कहानी, संगीत व निर्देशन से भी अधिक यदि यह फिल्म याद रखी जायेगी तो वो है, कंगना रानौत के शानदार अभिनय के लिए. कंगना ने रानी को परदे पर जीवंत कर दिया. कुछ कुछ दृश्यों में उनके चेहरे के भाव को इतनी सुन्दरता से बदलते देखा कि लगा मनो यह फिल्म कोई और नहीं कर सकता. चोर से भिड़ने का दृश्य हो या hindi गाने पर आँखों में आंसू आने के बावजूद झूम उठने को तैयार होना, इतनी ख़ूबसूरत अदायगी है कि शब्द नहीं है बयां कर पाने को. लिसा व राजकुमार भी अपने चरित्र को बखूबी निभाते हैं तथा विदेशी कलाकार भी अपने चरित्र के साथ इन्साफ करते हैं.
यह एक और इंग्लिश विन्ग्लिश है, शायद उससे अधिक सार्थक तथा नवीन. कुछ आधुनिकता से भरी व कुछ युवापन से जुडी. यहाँ अंतर्वस्त्र से खेल है, तो वहीँ विजयलक्ष्मी पर रानी के पिता व भाई की नज़र. कुछ दृश्य गुदगुदाते हैं, कुछ भावुक कर देते हैं, कुछ आँखें चुराने को भी मजबूर करते हैं खासकर पेरिस में लक्ष्मी व रानी के बीच के कुछ दृश्य. परन्तु यह सब कतई अश्लील नहीं लगता, फिल्म है फिल्म के प्रभाव में यह बहते चले जाते हैं. ऐसी और भी फिल्में बनेंगी और बनी भी है परन्तु इसे कतई भी किसी के साथ तुलना न किया जाये वरना इसकी मार्मिकता मर जाएगी और इसका दोष भी समाज पर ही आयेगा.
क्वीन आपके दिलों पे राज कर लेगी, देखने जरुर जाएँ.  

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

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इंसानियत के कंकाल तले
              
                                 -    अंकित झा

ज़िन्दगी महान बनने के कईं मौके देती है परन्तु मिसाल बनने के लिए सिर्फ एक. और ये मौका छीनना पड़ता है. मनुष्य अब केवल महान बनने की होड़ में लग गया है, मिसाल बनने की जिद्द अब कहीं पीछे छूट गयी है, जिसके पार जाना असंभव सा लगता है. खेल, मानव ज़िन्दगु का हिस्सा है. खेल परिश्रम से लेकर प्रतिज्ञा तथा मनोरथ से मुखरता सब कुछ सिखाता है. दिमागी कसरत हो या शारीरिक चपलता खेल के कुछ अभिन्न अंग हैं, साथ ही साथ खेल से जुड़ा होता है, सहनशीलता. सबसे महत्वपूर्ण व सबसे नाजुक. इसका दामन छूटने पर खिलाडी जीवन का दमन भी संभव है. परन्तु कईं बार ऐसे वाकये हो जाया करते हैं जब खेल भावना पर किस्सागोई भावना प्रबल हो जाती हैं व कब मनुष्य अपने कंकाल को पूजने लगता है पता ही नहीं चलता. खेल से देश की समृद्धि भले ही न जुडी हो परन्तु साख जुडी होती है, दुसरे देश के सामने घुटने टेकने का अर्थ क्या उस देश के समक्ष सर्वस्व समर्पण होता है, समझ में नहीं आता. खेल में नतीजे आते हैं, नतीजे या तो सुखद हो सकते हैं या दुखद परन्तु विध्वंशक तो कतई नहीं होते. फिर ऐसा क्या घट गया कि मेरठ के एक निजी विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों के जश्न पर इतनी बड़ी साहसिक पटकथा लिख दी गयी व नया वाद-विवाद शुरू हो गया. यह कतई नयी बात नहीं है कि भारत में क्रिकेट मैच का अर्थ क्या है व जब मुकाबला भारत व पाकिस्तान के मध्य हो तो उसका अर्थ क्या होता है. क्या ये शत्रुता खेल व खेल भावना से ऊपर हो जाती है. कैसी शत्रुता? ये कोई शत्रुता तो नही कि हम उनके मसाले खाते हैं, हमारे हर गोर चेहरे पर मुल्तानी मिटटी का प्रभाव है तो हर पाकिस्तानी चिकन मसाला में भारतीय प्याज. ये कैसा बैर है? ये सिर्फ वहम है कोई बैर नहीं. परन्तु कैसे खेल आर ये बैर भारी पड़ा इसका ताज़ा उदाहरण है, 2 मार्च को संपन्न हुए एशिया कप के भारत-पाकिस्तान मुकाबले के बाद का. मैच का अंतिम ओवर, जीत और हार के मध्य खड़े शाहिद अफरीदी. 2 लगातार छक्के और जीत भारत की झोली से फिसलकर पकिस्तान के आँचल में जा लिपटा. 27 वर्ष पुराना वाकया सबके ज़ेहन में उतर आया जब मियांदाद ने चेतन शर्मा को अंतिम गेंद पर छक्का जड़ा था. इस जीत के साथ ही भारत ख़िताब के दौर में पिछड़ गया. परन्तु एक ऐसी घटना घटी कि भारत मनुष्यता की कसौटी पर भी फिसल गया.
भारत की हार के पश्चात जहां देश भर में निराशा थी वहीँ कुछ कश्मीरी छात्र कथित तौर पर जश्न मनाने लगे. ये जश्न किस लिए मनाया गया, इसे जानने की चेष्टा किये बगैर ही सजा सुना दी गयी. यह जश्न भारत की हार पर था या पकिस्तान की जीत पर या फिर किसी तीसरे कारण से. प्रतिद्वंदिता में कोई न कोई पिछड़ता ही है, यह जग जाहिर है, इस पर जश्न कसा और मातम कैसी. परन्तु जब उल्लास उन्माद का रूप धारण कर ले, तो हालात बिगड़ना तय है. हुआ भी ऐसा ही. कुछ 65 कश्मीरी छात्रों को निलंबित कर दिया गया. हालात इतने बिगड़ गये कि यह राष्ट्री मुद्दा बन गया व अगले ही दिन कश्मीर के विधान सभा सत्र में इस पर विरोध प्रदर्शन भी हुए. हालात और बिगड़े तथा उन छात्रों के विरुद्ध एफ़आईआर दर्ज करवाई गयी तथा उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की गुहार की गयी है. यह मुद्दा कहाँ से कहाँ बढ़ता जा रहा है, इसे देख कर नयी बहस छिड़ रही है, एक गुट उनके समर्थन में आ खड़ा हुआ है तो कुछ लोग विश्वविद्यालय के कदम को सही बता रहे हैं.

मैं इस पर मौन रहना चाहता हूँ, कुछ भी कहना नहीं चाहता हूँ, इस नुद्दे पर कुछ कहने का अर्थ है कि या तो मैं समर्थन में हूँ या फिर विरोध में. ना ही मैं पाकिस्तान के विरोध में हूँ और न ही इस कृत्य के समर्थन में. कुछ भी कहने के लिए बाध्य नहीं होना चाहता हु. बस इतना पूछना चाहता हूँ कि पाकिस्तान से ही बैर क्यों, श्रीलंका और चीन हमारे लिए बड़ी समस्याएं पैदा करते रहे हैं. पाकिस्तान से ये सौतेला व्यवहार क्यों? अचरज की बात है कि इतने बड़े देश की ऊँगली एक ओर जा के थम जाती है. आफरीदी के छक्को का कोई मोल नहीं रह जाता, यदि भारतीय गेंदबाज को मारे गये हो परन्तु कैलिस का बिदाई शतक प्रशंसनीय लगता है, कारण समझ में नहीं आता. जब भारतीय खिलाडी ही फिक्सिंग में पकडे गये हो तो पाकिस्तानी खिलाडियों से परहेज क्यों? यह हमें रोग लग गया है नफरत और भेदभाव का. यह कुछ और नही बल्कि राष्ट्रिय भेदभाव है. सभी लफ्ज़ खामोश हो जाते हैं जब बात पाकिस्तान पर हो, ऐसा क्यों है. किसी अमन की आशा कि वकालत नही करता हूँ परन्तु ये भेदभाव पसंद नहीं है. ये बैर नहीं मनोरोग है, जो की लाइलाज़ है. कितनी ही मासूम जिंदगियां बेखता होने के बावजूद इस मनोरोग का शिकार हुई हैं. सरबजीत याद नहीं, इसी मनोरोग की भेंट चढ़ गया था. सत्य से सभी अनभिग्य हैं, व सत्य को मानव अपने कंकाल में छुपा के रखने लगा है. नग्न आंखों से इस सत्य को देख पाना असंभव है, इंसानियत का कंकाल ढूंढने की आवश्यकता है जिसके नीचे ये सत्य छिपा हुआ है कि गुनाह क्या था उन छात्रों का जो वो पढाई छोड़कर अपने घर लौट गये हैं व अपने सुरक्षा की भीख मांग रहे हैं. 

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

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कौन नगर से हो भाई?
-                                                                                                                                                                                                                                   -  अंकित झा

व्यंग्य का रिकॉर्ड काफी खराब रहा है हमारा, ऐसा ही कुछ सोंच के लिखने की हिम्मत नही जुटा पाते थे. पर अब क्या, अब तो लाज भी घोल के पीने की नौबत आ गयी है, जबसे कुछ लेखक-लेखक सा लगने लगा है, स्वयं में ही एक सम्पूर्ण ब्रम्हांड के ज्ञाता वाली भावनाएं आने लगती है, वो खाते हैं न दो ब्रम्हांड है; एक यथार्थ का व दूसरा लेखकों के कल्पनाओं का. ऐसे ही संसार का हिस्सा है हमारा देश भारत, वही विविधताओं में एकता वाला देश. याद है न, कि भूल गये हैं, नही विस्मृत हो सकते हैं, हालात ही ऐसे हैं कि अब क्या करें? दिल्ली आना हुआ, मई में पिछले साल. सुना था कि राजधानी बड़ी सुंदर जगह है, चौड़ी सड़कें, सड़कों के किनारे हरियाली, सड़कों पर दौड़ते एक से एक महंगे वाहन तथा ऐतिहासिक धरोहरें. क्या पता था कि इन धरोहरों के परे भी एक दिल्ली बसती है, प्रवासी दिल्ली. एक बड़ा क्षेत्र प्रवासी दिल्ली का ही है. ये वो हैं जो कभी काम, शिक्षा तो कभी मित्र से मिलने यहाँ आ पहुचे थे परन्तु अब यही के हो चुके हैं. इनमे बिहार, हरियाणा, राजस्थान, बंगाल तथा उत्तर प्रदेश से सबसे अधिक है. पंजाबी इसलिए नहीं क्योकि, दिल्ली कभी कभी पंजाब का ही हिस्सा लगती है. डीटीसी की बसों से लेकर मेट्रो की खचाखच भरे डिब्बों में प्रवास की एक गंध आती है. यह दिल्ली किसी की नहीं है, किसी कीभी नहीं. फिर यहाँ ज़मीन खरीद लेने से क्या ये तुम्हारी हो जाएगी? ज़मीन खरीद सकते हो उसका इतिहास नहीं. अपना भूतकाल भुला सकते हो, इतिहास नहीं. प्रवासी होना कोई पाप नहीं, परन्तु अपनी जड़ों को भुला देना, एक पाप है, घोर पाप. तभी तो जब भी कभी, ऑटो या रिक्शे में बैठकर सफ़र करता हूँ तो एक प्रश्न अवश्य करता हूँ कि कौन नगर से हो भैया? जवाब मिला तो उस समय का मोल कोई लगा के देख ले, वह अनमोल है. छपरा से हैं, मुजफ्फरपुर से हैं, दरभंगा से हैं, इलाहाबाद से हैं तो रामपुर या श्रावस्ती से हैं, परन्तु हैं वहीँ कहीं के जहाँ से हम हैं. फिर उनसे अपनी जबान में बात करने का आनंद कोई लूट के देख ले, कोई नहीं कर सकता.

बस एक बात जो अक्सर झकझोर जाती है वो है, उपनाम, ‘बिहारी’. नगरीय अपभ्रंशों की फेहरिश्त काफी लम्बी है जिसमे साधारण वस्त्र पहनने वाली लड़की को, बहनजी कह कर संबोधित करते हैं तो किसी भी साधारण व्यक्तित्व के लड़के को बिहारी. बिहारी संज्ञा कबसे बन गयी? पता ही नही, वो भी एक नकारात्मक संज्ञा. जो कि किसी गाली के समतुल्य है. कोई पूछे जरा इन शहरी विवेकवानों से कि बिहारी का शाब्दिक अर्थ क्या है? ज्ञात है अथवा नहीं? बिहारी तो पाहून को कहते हैं, अर्थात मेहमान को. मेहमान इस देश में भगवान स्वरुप है, अर्थात किसी भी इंसान को बिहारी कहना उसे इश्वर के समतुल्य रखना है, परन्तु आप तो उसे गाली की तरह बोलते हैं. अनुजा चौहान की पुस्तक ‘Those Pricey Thakur Girls’ में सबसे छोटी बहन इश्वरी को उसके सहपाठी बिहारी कहते हैं क्योकि वो काफी ही स्फूर्तिवान तथा मुहफट है व बास्केटबॉल खेलते समय उसके जूनून में तार्किकता व हिंसा छुपी रहती है. क्या कारण है ये किसी को कुछ कहने का. मुझे सदा ही ये पुछा गया कि बिहारी हो तो कहते क्यों नहीं हो? यूँ तो मेरा सम्बन्ध बिहार से है परन्तु मेरी परवरिश मध्य प्रदेश की है. वहां ऐसा कुछ नहीं है, हां, कभी को कौतूहल वश मुझसे मैथिलि जिसे कि वो बिःरी कहते थे बोलने को कहते व मेरे बोलते ही सब तालियाँ पीट लेते. पता नहीं ऐसा क्या था उसमे, सोचता था कि बिहार में तो इनकी ज़िन्दगी तालियाँ पीटते ही गुजर जाएगी. परन्तु दिल्ली आने के बाद जब पता लगा कि बिहारी कहलवाना तो यहाँ पाप के सामान है तो फिर एक पल को सोंचा और गर्व से स्वयं को बिहारी कहलवाने लगा, वही बोली वही भषा व वही बोलने का ढंग. सब कुछ वही. कोई दो राय नही कि मैं बिःरी हूँ, हां बिहारी हूँ. जब तक साँसे रहेगी बिहारी रहूँगा, देखता हु पहले साँसे जाती है या पहचान. पहचान तो कोई नहीं मिटा सकता है, मेरा नाम मिटा दो भले ही. परन्तु यदि कोई अब मुझसे ये पूछे कि कौन नगर से हो भैया तो गर्व से कहूँगा कि मधुबनी बिहार से हूँ, और आप?   

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

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क्या विवाह-पूर्व संबंध अनैतिक है?
                                            - अंकित झा 

किस ओर बढ़ रहे हैं हम, जिस ओर प्रगति नही है
जिस ओर जिज्ञासा नहीं है, जिस ओर कुंठा ही कुंठा है
जिस ओर प्रणय है, जिस ओर खिलाफत है,
जिस ओर समाज नहीं है, समाज का डर व्याप्त है
                                                   - अंकित झा 

शादी है, क्या है कोई लाइसेंस है क्या? आवश्यकता क्या है? परंपरा है, जो चली आ रही है, चलती जानी चाहिए। ये विवाह पूर्व सम्बन्ध क्या हो गये, कोई नयी बीमारी है क्या? या अंग्रेजी गंद है कोई? हिंदी में तो शब्द की आत्मा ही मर रही है, नाम है, प्री-मैरिटल सेक्स। परन्तु जैसे जैसे हिन्द में इसका पैठ बढ़ रहा है, इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। अर्थात ये अंग्रेजी गंद ही है। कौन कहता है, हर मुद्दे को उस गली नहीं धकेल सकते हैं, वरदान ही सही परन्तु महाभारत में कुंती को विवाह से पूर्व कर्ण हुआ था, हाँ अपनी कोख से नहीं परन्तु महाकाव्य के अलंकरण को हम क्या समझने गए, समाज के डर से गंगा में प्रवाहित कर दिया, अपने अंश को, सूर्य के आशीर्वाद को, समाज  के साख बचने के लिए ममता का गला घोंट दिया तथा समूची ज़िंदगी कचोट में रही। 
भारत के विषय में बात करते हैं तो हिन्दू ही प्रासंगिक है, हिन्दू इतिहास की बात हो तथा महाभारत छूट जाये, सम्भव नहीं। परन्तु ये बात महाभारत के प्रारम्भ की है, सम्राट भरत के पिता दुष्यंत व माता शकुंतला की अमर प्रेम कथा। जंगल में दोनों का मधुर मिलन परन्तु समाज के नज़र से दूर, दुष्यंत अब तक अविवाहित, शकुंतला तो महर्षि की पुत्री, कोई जीजिविषा नहीं, कोई आकांक्षाये नहीं, सिर्फ प्रेम और प्रेम। शापित हुई और दुष्यंत ने पहचानने से मन कर दिया, परन्तु गर्भवती, कोख में कुरु वंश का युवराज, भरत। ये गाथा तो भारत की ही है, पूर्णतः, विवाह पूर्व यौन समबन्ध की। उस समय तेज़ अलग थे, समय अलग था। कुछ भी चल सकता था, सामाजिक बंदिशे आज से कई ज्यादा थी। अब तो हम बदल रहे हैं, फिर क्या आवश्यकता है उन बंदिशों की? बंदिशें नहीं, हालत कहते हैं उन्हें। विज्ञानं कहता है कि १३ वर्ष से एक बालिका में शारीरिक परिवर्तन शुरू होते हैं तथा १५ वर्ष से एक बालक में। पहले इस उम्र तक विवाह हो जाया करते थे, परिणय व प्रणय में उम्र का अंतर बहुत कम था, उस समय  ऐसा समाज भी हमने नही बनाया था, जहाँ निर्लज्ज्ता परोसी जाती हो। आज तो सीमान्त पर खड़े हैं हम, निर्लज्ज्ता के, फिल्मों से लेकर मैगज़ीन और इंटरनेट पूरा खुला संसार बना बैठा है गंद  का और मानवीय विकृतियों का। परन्तु मानवीय संवेदनाएं कभी भी किसी साधन का मोहताज़ नहीं रहा, ययाति को ही ले लीजिये, पत्नी के होते हुए भी, दासी से अंतरंग सम्बन्ध व उससे कुछ चिराग भी। भारतीय इतिहास ऐसी कई किवदंतियों से भरा पड़ा है, तय हमें करना है कि हम किसके पक्ष में हैं? पक्ष-विपक्ष का ढोंग बहुत पुराना है, कितनी ही बार माशूक मोहल्ले में धोखे खा चुका इंसान किसे पक्ष और किसे विपक्ष समझे समझ ही नही आता।  मनुष्य इतना अपाकृतिक क्यों होता जा रहा है, खुले विचारों के नाम पर, पहले समलैंगिकता, फिर सहचारिता (लिव-इन रिलेशनशिप) और ये नया बिगुल पूर्व विवाह यौन सम्बन्ध। मनुष्य पर है, उसका अपना विवेक अपना विश्वास और अपनी विवेचना। एक बात तो साफ़ है कि गंदगी पर थूक कर तो साफ़ नहीं किया जा सकता उसे, पवित्रता का जल ही छिरकना होगा उस पर। वो क्या हो सकता है, ऐसे कृत्यों पर रोक लगाना, वो तो सरकार कर चुकी है, १८ वर्ष से पूर्व लड़की का विवाह नही हो सकता परन्तु सम्बन्ध के बारे में अब तक कोई फैसला नही  आया, मद्रास हाई कोर्ट ने ही एक फरमान सुनाया था, कुछ कुछ दिलीप कुमार अभिनीत, व मेहबूब खान निर्देशित 'अमर' की तरह। विवाह से पूर्व यदि कोई युगल यौन सम्बन्ध बनाता है तो उसे विवाहित माना जाये, परन्तु उतनी ही जल्दी इस फैसले को वापस ले  लिया गया। संस्कृति की बखान का प्रश्न नही है परन्तु प्रश्न यह है कि मानवीय संवेदना इस पर क्या राय रखती है? क्या मनुष्य का ज़मीर उसे अन्य स्त्री या पर पुरुष के साथ अंतरंग सम्बन्ध बनाने की इजाज़त देती है? क्या ज़मीर प्रणय को परिणय के ऊपर रखने की गवाही देती है? यदि हां तो, कोई और प्रश्न नही, सीधे शब्दों में समाज पर मॉडर्न हो जाने की बात कह देना सुगम होगा।                            

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

Analysis

इंसानियत और हवस के मध्य चिंघारता इंसाफ  
                                                                                            - अंकित झा 

यह कुछ नया सा प्रयास है, साल के कलंको और कबिलियतों को नए ढंग से याद करने का। काफी कुछ घटा है साल, कुछ बातें भुला दी गयी, कुछ भुलाये नहीं भूलती। कहीं कुम्भ की भक्तिमय साँझ की आरतियाँ गूंजती रही तो, कुम्भ में फैली भगदड़ में हुई मौतों पर आँखें भी नम हो आयीं और रूह भी कांप गया, अफ़ज़ल गुरु को फांसी, हैदराबाद में बम धमाके, दामिनी को गुजरे कुछ महीने ही हुए थे, और एक 5 साल की नयी दामिनी सामने आयी, गुड़िया नाम दिया गया, वही आक्रोश और जनक्रांति। फिर सुदीप्त सेन की ऐतिहासिक धांधली, शारदा चिटफंड का पर्दाफ़ाश, उत्तराखंड में आया महाप्रलय, सचिन तेंदुलकर का संन्यास, प्राण का निधन,  आसाराम की गिरफ़्तारी, ऐतिहासिक फैसले, आप क्रांति की सफलता और न जाने कितने ही ऐतिहासिक और दुखदायी क्षण। 2013, उठापटक से भरा साल रहा,परन्तु एक घटना जिसने मानवता को अंदर तक झकझोर के रख दिया वो था, मासूम गुड़िया के साथ किया गया दुष्कर्म। पृष्ठभूमि पर जाना नही चाहता, फिर भावनाएं उफान पे आ जाएंगी, शांत ही बैठना चाहता हु, परन्तु चुप नहीं।   नीचे लिखे पंक्तियों को पढ़ें- 

तो उसने भर कर आंखों में आंसू का मोती कहा
तेरी अच्छी किस्मत है जो तू जनम नहीं लेती
जनम लेकर भी आखिर तू किया करेगी
इस दुनिया में औरत का कोई सामान नहीं 
(Save the girl CHILD)

गुड़िया के साथ किया गया ये दुष्कर्म, साल के वीभत्सतम घटनाओं में से एक रही, इस पर क्षोभ से लेकर, दुःख, आक्रोश और सजा की मांग मुझे दो फिल्मों की याद दिलाती है, पहली है महेश मांजरेकर निर्देशित संजय दत्त व नंदिता दस अभिनीत साल २००२ की 'पिता'। तथा दूसरी है, 2004 में आयी मेहुल कुमार निर्देशित 'जागो'। दोनों ही फिल्में नाबालिग के साथ दुष्कर्म जिसे अंग्रेजी में ( Child Sexual Abuse)  कहते हैं। इस अति संवेदनशील मुद्दे पर मुख्यधारा की ये दो अच्छी फिल्में मेरी ज़ेहन में सुरक्षित हैं। हालाँकि दोनों ही फिल्में कमाई  में असफल रहो परन्तु इन्साफ के लिए किये गए संघर्ष की ये दोनों ही फिल्में एक अद्भुत उदहारण के रूप में पेश की जा सकती हैं। 
पिता: एक्शन फिल्मों के दो जाने पहचाने चेहरे संजय दत्त व महेश मांजरेकर, इससे पूर्व वास्तव जैसी फ़िल्म दे चुके थे, वास्तव कई मामलो में उत्तम फ़िल्म थी। तथा संजय दत्त ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी इसी फ़िल्म में दिया है, परन्तु जब मुख्यधारा के दो चेहरे कला साम्राज्ञी नंदिता दास के साथ एक शांत व उत्तेजक सिनेमा के लिए साथ आये तो उसका नतीजा रहा, एक विलक्षण सिनेमा। जिसका नाम है, पिता। हालांकि ये श्याम बेनेगल व सुधीर मिश्रा नुमा सराहनीय प्रयास नही था, परन्तु एक अच्छी फ़िल्म थी। फ़िल्म का पहला घण्टा इतने नाटकीय रूप से गढ़ा गया है कि फिल के किरदार दो भागो में बटते हैं, अच्छे और ज़ालिम। कहानी एक गांव की जहाँ पर ठाकुर अवध नारायण सिंह की हुकूमत है, उसके दो बेटे हैं और एक बेटी है, वहीँ दूसरी ओर उसके सबसे वफादार नौकर,रूद्र का परिवार है, उसकी पत्नी पारो, दो जुड़वाँ बेटे और एक ९ साल की बेटी, दुर्गा। कहानी में मोड़ तब आता है, जब रूद्र को पता चलता है कि उसकी मासूम बेटी के साथ दुष्कर्म हुआ है, और ये जघन्य दुस्साहस किसी और ने नहीं बल्कि ठाकुर के दोनों बिगड़ैल बेटों ने किया है, फिर शुरू होता है दो पिता का अद्भुत संघर्ष। इन्साफ और साख की अनोखी लड़ाई। एक तरफ पैसे और पॉवर है तो दूसरी ओर सत्य और इन्साफ का जूनून। अंततः सत्य की विजय होती है, परन्तु बहुत कुछ खोने के बाद। 
फ़िल्म में रूद्र के किरदार में संजय दत्त है, उन्होंने इससे पहले ऐसा चरित्र कभी नही निभाया, और ऐसा अभिनय भी कभी नहीं किया, ये उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था, पहली बार किसी फ़िल्म में उन्होंने अपने आप को पूर्ण रूप से झोंक दिया, दूसरी ओर नंदिता दास हमेशा की तरह  ख़ामोशी से बहुत कुछ बोलने का प्रयास करती हैं, और हर दृश्य में बेहतरीन अभिनय का मुजायरा, ठाकुर के किरदार में ओम पूरी जान डालते हैं, परन्तु कई बार वो अति आत्मविश्वास का शिकार होते हैं, परन्तु वो एक विलक्षण अभिनता हैं,  किरदार में जॅकी श्रॉफ संतुष्ट करते हैं। संगीत बहुत कमजोर है, पार्श्व संगीत और कला निर्देशन फ़िल्म की जान है। 
परन्तु ये एक अच्छी फ़िल्म थी, इसलिए नहीं क्योंकि ये ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित थी, और एक अहम् मुद्दा उठती है बल्कि इसलिए क्योकि तेज के द्वारा लिखित इस कहानी में सामंती व्यवस्था पर कटाक्ष है तथा साम्य वाद की एक झलक है, एक पिटा का दुसरे पिता से संघर्ष है, एक बचपन के लूटने की व्यथा है, एक माँ के दो बेटों को बचने की दारुण कथा है, एक माँ के आत्मा के दागदार होने की कथा है, एक ठाकुर के साख व इन्साफ के अग्निपरीक्षा की कथा है, और एक नाबालिग के अस्मिता लूटने के दुस्साहस की कथा है। मनुष्य के उत्तम से न हटने की ज़िद्द का आह्वान करने वाली ये फ़िल्म भारत के 100 वर्षों के सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में कटाई स्थान नहीं बनाता परन्तु मानवीय करुणा के गलियारों में ये शीर्ष मुकुट का हक़दार है

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

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गर्मी की लपट में ठिठुरती ज़िंदगियाँ 
                                                                    - अंकित झा 

"दंगे के बड़े दुष्प्रभाव होते हैं, सबसे बड़ा तो ये कि छीने जा  चुके हक़ को लूटने वाले बहुत होते हैं,  हक़ बाँटने वाले बहुत कम। समस्या बाँटने वाले बहुत होतेहैं, परन्तु सुलझाने वाला कोई नहीं। कोई भी सांप्रदायिक तनाव नया इतिहास लिखती है, इस इतिहास के पन्ने या तो सुर्ख होते हैं या फिर काले।"

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये
छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये
                                                   - रामनाथ सिंह “अदम” गोंडवी
कुछ आवश्यक सा लगा इन पंक्तियों को लिखना, काफी विचारोत्तेजक पंक्तियाँ हैं, अंदर तक झकझोरने वाली। आज कल के हालत भी तो ऐसे ही हैं, 4 महीनो से अधिक हो चुके हैं, उस काले अध्याय को गुजरे, कई गिरफ्तारियां, कई केस और सजाएं परन्तु दर्द तो कम नही हुआ, एक अज़ीब से ज़िद्द से जन्मी वो झंझट आज एक विकराल से दर्द में तब्दील हो चुका है। ये दर्द है अपने ज़मीन से बिछरने का, ये दर्द है अपनों से बिछरने का, ये दर्द है राजनीतिक मोहरा बन जाने के डर का, ये दर्द है अपनों के खोने का, ये दर्द है निरंतर एकाकी में ज़िन्दगी बिताने का। चहुँ ओर दर्द ही दर्द। उनका भी जिनके अपने मारे गए, उनका भी जो मारे गए, उनका भी जिन्होंने मारा। जिन्होंने मरने दिया उनका कोई दर्द नहीं, बस डर है साख जाने का। सब समझ गए कि बात कहाँ की चल रही है, नाम ही ऐसा है, दर्द ही ऐसा है, मुज़फ्फरनगर। अगस्त महीने का वो आखिरी सप्ताह, सावन की फुहार के बाद उमसा सा वातावरण, ये उमस ये उदासीनता एक अनहोनी की सौगात थी, वो अनहोनी जो मुज़फ्फरनगर के कवाल गांव में घटने वाली थी। प्रकृति को सब पता है, कारण स्पष्ट न हो सका; ये रोड एक्सीडेंट से शुरू हुए नोकझोंक का परिणाम था या तथाकथित ज़िहाद लव का, कि एक मुस्लिम लड़के (शाहनवाज क़ुरैशी) ने पडोसी गांव की जाट लड़की से छेड़छाड़ की, जिसके बदले में, लड़की के भाइयों(सचिन व गौरव) ने शाहनवाज को जान से मार दिया और इसके विरोध में गांव के चौराहे पर एक संप्रदाय विशेष के लोगों ने दोनों भाइयों को समाप्त कर दिया? इस घटना ने तूल पकड़ी और बढ़ती राजनीतिक हस्तक्षेप के पश्चात महासमर में परिवर्तित हो गया। वो महासमर जिसने 43 ज़िंदगियों को अपने ग्रास में ले लिया। कारण सिर्फ एक, मतभेद, क्रोध, प्रतिशोध। जो नाम दे उस दीवानगी को, निर्भर करता है। 
वो एक जूनून था जो गुजर गया, पर अपने निशान छोड़ गया। दंगे के बड़े दुष्प्रभाव होते हैं, सबसे बड़ा तो ये कि छीने जा चुके हक़ को लूटने वाले बहुत होते हैं, हक़ बाँटने वाले बहुत कम समस्या बाँटने वाले बहुत होते हैं,परन्तु सुलझाने वाला कोई नहीं। कोई भी सांप्रदायिक तनाव नया इतिहास लिखती है, इस इतिहास के पन्ने या तो सुर्ख होते हैं या फिर काले। इस दंगे के भी यही कुछ परिणाम होते गए। धीरे-धीरे जान बचा के सभी लोग गांव छोड़ने पर मजबूर हो गये, विस्थापन का दंश मानव इतिहास के सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है, विस्थापन और एक दंगे के बाद अपनों से अलग होना, अपनों की सुरक्षा के लिए, उसका दर्द कौन बयां कर सकता है? आंकड़ों की माने तो 9000 परिवारों के 50,000 लोगों ने कैंप में शरण लिया। मुज़फ्फरनगर व शामली ज़िलों को मिला के कुछ ४० कैंप लगाये गए थे। हालत सुधरने के बाद कुछ लोगों ने लौटना चाहा परन्तु, फिर से छोटी मोटी हिंसा इलाके को दहलता रहा, जिससे ख़ौफ़ बढ़ता ही गया, और अब वो समय आ गया है, जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ठण्ड अपने चरम पर है, तथा राजनीतिक विवशताएं ऐसी कि न लौटने को कह सकते हैं न रुकने को। अब तक कोई 34 बच्चे ठण्ड से अपना दम तोड़ चुके हैं, इन कैम्पों में। सुध लेने वाला कोई नहीं, लकड़ी और दवाइयां पहुँच रही हैं पर पर्याप्त नहीं। गोद खुद कांप रहे है, वो ठण्ड से कैसे बचाये? कौन क्या करेगा और क्या कर लेगा? कुदरत को तुमने चुनौती दी तो कुदरत तुम्हारी आजमाइश क्यों न करे? ऊपर से अकर्मण्य प्रशासन, हालत काबू करने के बजाए गंद बयानों से मुद्दा भटकाने की भद्दी कोशिश। कोई कहे कि कैम्प में अब कोई पीड़ित नहीं, विपक्षी पार्टियों के लोग छुपे बैठे हैं। कोई कुछ तो कोई कुछ। रोटियां सेंकने वालों की भी कमी नही है। सब बारी-बारी पहुँच रहे हैं, मदद ले कर नहीं, आश्वासन लेकर। उन्हें आश्वासन दे कर क्या कर लेंगे? क्या शाज़िया को उसका बेटा लौटा देंगे आप नेताजी जिसकी पिछले दिनों ठिठुरते हुए मौत हो गयी या फिर इरफ़ान की बूढी खाला को लौटा देंगे, जो गांव से कैंप के रस्ते में ज़िंदगी से हार गयी। या फिर रमेश के दोस्त शाहिद को वापस ले आएंगे जिसे वो आज भी स्कूल जाते समय अनजाने ही बुलाने चला जाता है, तौफ़ीक़ का वो मासूम बचपन जो आज भी यही प्रार्थना गाता है, "ये अँधेरा घना छा रहा, तेरा इंसान घबरा रहा, हो रहा बेसबर कुछ न आता नज़र। सच का सूरज छिपा जा रहा
अब तो हे प्रभु तुमसे ही ये गुहार है कि है तेरी रौशनी में वो दम जो अमावस को कर दे पूनम। इंसान आखिर कब इंसान से लड़ना बंद करेगा? ये समर कब समाप्त होगा, जिससे सिर्फ नबफरत और दर्द ही उपजते हैं। कैसे कोई ये कह गुजरता है कि कूड़ेदान में 10 वोट आ गिरे हैं, उसे लूटने की तैयारी चल रही है। 
कब तक गर्मी की लपट में तबाह हुआ जीवन ठण्ड में ठिठुरता रहेगा? कब तक ठण्ड में भी राजनीती माहौल को गर्म बनाये रख्रगी? कब तक? कब तक? जवाब का इंतज़ार रहेगा 

रविवार, 22 दिसंबर 2013

Movie Review

धूम 3 :प्रतिघात के महाकाव्य से परे
                                                                          - अंकित झा 

आमिर खान की फ़िल्म और उसका रोमांच। पता है कि कुछ तो अच्छा होगा पिक्चर में बस दिल कहता है कि सब ठीक ही हो। आखिर मिस्टर परफेक्शनिस्ट जो हैं आमिर। उम्मीदें रहती हैं उनसे, और हम जैसे उनके फेन को तो कुछ ज्यादा ही। और नए नए जन्मे ये  जो हर दूसरी भारतीय सिनेमा के दृश्यों को उनकी किसी फ़िल्म कि चोरी का कहतें हैं।  और जब ऐसी धूम धड़ाका वाली एक्शन फ़िल्म हो तो फिर क्या कहने। आमिर के नाम के साथ। आशाएं, आकांक्षाएं व अद्वितीय चीज़े स्वतः ही जुड़ जाती हैं। २० को उनकी ये फ़िल्म आयी, आयी तो फिर देखना है ही, कोई देखे उससे पहले, मतलब फर्स्ट डे- फर्स्ट शो। फिर क्या था एडवांस बुकिंग कि होड़। टिकट मिलने का मतलब ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली ख़ुशी। पिछले 10  वर्षों में सिर्फ 8 फिल्में और एक सामाजिक रियलिटी शो, इतनी बार ही आमिर खान ने काम किया है. 7 साल के लम्बे इंतज़ार के बाद यशराज बैनर की अतिमहत्वकांछी सीरीज धूम 3 आ ही गयी. साथ ही आमिर खान भी एक साल बाद परदे पर लौटें। यह आश्चर्य कि बात थी कि इतनी बड़ी फ़िल्म की जिम्मेदारी आदित्य चोपड़ा ने 'टशन' जैसी फ़िल्म बनाने वाले विजय कृष्ण आचार्य के हाथों में दी गयी। यह उनकी बतौर निर्देशक दूसरी फ़िल्म थी। ट्रेलर को देख के लगा मनो क्या होगा इस बार अलग, वही गाड़ियां तो दौड़ रही हैं, वही अभिषेक बच्चन पकड़ेगा। अंत में हार जायेगा। संगीत सुना, पिछले बार के मुक़ाबले, अधिक कर्णप्रिय। मलंग और बन्दे हैं हैम उसके तो दिल में बस गया है, धूम मचाले पुराना वाला अच्छा था, कमली कमली कुछ क्रेजी किया रे जैसा ही है। पर अच्छा है, एक और गीत है, तू ही जूनून; मोहित चौहान ने गाया है। इस गायक से तो दिन व दिन उम्मीद बढ़ती ही जा रही है। पहले पड़ाव में तो पास हो गयी मेरे लिए। संगीत पक्ष अच्छा रहा, साल के ४ महतवपूर्ण या कहें 4 बड़ी फ़िल्म का संगीत इतना अच्छा नहीं था; कृष3, चेन्नई एक्सप्रेस, बेशरम का संगीत बेजान था। 
फ़िल्म देखने पहुचे, बड़ी भीड़, जैसा कि उम्मीद था। फ़िल्म शुरू हुई, चौथे मिनट पे जॅकी श्रॉफ का वो दमदार संवाद और संदेशात्मक आवाज। मजा। और उसके बाद फ़िल्म पूर्णतः आमिर खान को समर्पित। पिछली बार की तरह इस बार भी क्रेडिट डांस के साथ ही होता है, आमिर की मेहनत  साफ़ नज़र आती  है, उनका थिरकना युवाओं को भी थिरकने पर विवश करता है, उत्तम। कोई ये न कहे कि आमिर ज्यादा अच्छे नाचे या ऋतिक? कोई मुक़ाबला नहीं। दोनों का दौर अलग है, और दरकार भी। धीरे धीरे फ़िल्म इतनी तेज़ी से आगे बढ़ती है कि उदय चोपड़ा के असहनीय संवाद भी तुरंत नेपथ्य में चले जाते हैं। एंट्री सीन काफी लम्बे हैं, छोटे हो सकते थे। पहला हाफ काफी चुस्त है, और उतनी ही तेज़ी से ये आगे बढ़ता है, पीछे क्या हुआ इसकी परवाह किये बिना। सभी एक्शन सीन शानदार तरीके से फिल्माए गए हैं, उतनी ही सुंदरता से शिकागो को फ्रेम में उतारा गया है, हां great Gatsby जितना सुंदर नहीं, पर उससे कम भी नहीं। कुछ स्टंट सांसे रोक देने वाली है, उनको आमिर खान सहजता से निभाते हैं।
कहानी अच्छी है, पर बहुत छोटी। आमिर का प्रभुत्व यहाँ साफ़ दिखता है, जब फ़िल्म की हीरोइन को महज चंद गानों में थिरकने के लिए रखा गया हो। अभिषेक को आमिर के बाद सबसे अधिक स्पेस मिला है, परन्तु युवा होने के बावजूद वो गानों से नदारद हैं। भूमिकाएं छोटी होने के बावजूद, किरदारो पर मेहनत की गयी है। पटकथा शानदार है, और पहले और दुसरे हाफ को पूर्णतः अलग करती है, परन्तु कथा का मूल है, प्रतिशोध। प्रतिशोध भारत की फिल्मों का ही मूल है, हर तीसरी फ़िल्म में बदला ही मकसद है। यहाँ पे कहानी इस तरह लिखी गयी है, कि  सहानुभूति खलनायक के लिए है। आमिर दूसरी बार खलनायक की भूमिका कर रहे हैं, और इस बार भी यश राज के लिए, फना के बाद। आमिर ऐसे अभिनेता है जिनपर खलनायक का चरित्र अच्छा नहीं लगता। अर्थव्यवस्था के कमर माने जाने वाले बैंक व बैंकरों को फ़िल्म में खलनायक दिखाया गया है, सच भी है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था का वो बुरा दौर कही न कही बैंको के गलत नीतियों का ही नतीजा था। यहाँ पृष्ठभूमि अमेरिका ही है, और पठकथा की शुरुआत बैंक के क़र्ज़ वसूली से है, जहाँ पर कि अपने जीवन के सबसे बेहतरीन करतब दिखाने के बावजूद इक़बाल(जॅकी) बैंक वालो को मना नहीं पाटा और नतीजतन उसे आत्महत्या का कदम उठाना पड़ता है। यहीं से शुरू होता है, बैंक को बर्बाद करने कि शाहिर(आमिर) कि ज़िद्द। उसे रोकने के लिए भारत से पुलिस अफसर जय दीक्षित(अभिषेक) व अली (उदय) को शिकागो बुलाया जाता है, क्योंकि मरते वक़्त जॅकी के शब्द 'बैंक वालो तुम्हारी ऐसी कि तैसी' को हर बार शाहिर बैंक लूटने के बाद लिख के जाता है, और एक जोकर का मुखौटा भी छोड़ जाता है। उनका साथ देने के लिए टैब्रेट बेथेल एक संक्षिप्त सी  भूमिका में हैं। वहीँ आमिर के साथ थिरकने के लिए कैटरीना को रखा गया है, वो बहुत अच्छा थिरकती भी हैं। चोर पुलिस का ये खेल दुसरे हाफ में चरम पर पहुँचता है, जब शाहिर के सबसे बड़े राज़ के बारे में कि उसका एक जुड़वाँ भाई है, जय को पता चल जाता है। कहानी के साथ आँख मिचौली चलती ही रहती है, और हम एक पहले से तय अंत की ओर बढ़ जाते हैं, कोई बताये कि इतने मुश्किल से बच के निकले दो चोर सुबह में क्यों भागने की कोशिश करेंगे? ये कुछ हजम नहीं होता।
फ़िल्म की जान आमिर और उनकी शानदार अदायगी है, वो हर सीन में जान डालते हैं, फिर वो गुसैल और शातिर शाहिर हो या चुलबुला और बचपने से भरा समर। अभिषेक भी अच्छा करते हैं, पिछले दो बार से ज्यादा अच्छा। इस बार हालाँकि रोल कम है, फिर भी। आमिर के साथ उनकी केमेस्ट्री शानदार है, भले ही वो चोर पुलिस कि दुश्मनी हो या मासूम समर से उनकी दोस्ती। उदय चोपड़ा ठीक हैं, उनकी ये अपनी फ़िल्म है, गाड़ियां अच्छा दौड़ा लेते हैं। कटरीना ने ये फ़िल्म चुनकर निराश किया है, वो महज गानों में थिरकने के लिए और अंग प्रदर्शन के लिए हैं, कोई दो राय नहीं कि पिछले संस्करण में विपाशा कि इससे लम्बी भूमिका थी।  बेथेल ठीक हैं, और जॅकी प्रभावित करते हैं, फ़िल्म में और कोई नहीं है जिसकी आभने को सराहा जाये। फ़िल्म के असली नायक इसके क्रू मेंबर हैं, कहानी, संवाद और पटकथा तीनो को निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य ने लिख है और सभी काफी अच्छे हैं, आमिर के संवाद बहुत अच्छे हैं, खासकर नरेशन में चलते उनके संवाद। सुदीप चट्टर्जी जो कि इक़बाल, चक दे इंडिया जैसी फिल्मो में अपने सिनेमेटोग्राफी का लोहा मनवा चुके हैं, शानदार तरीके से हर फ्रेम को रचते हैं, वो शानदार रहे हैं। संपादन रितेश सोनी के जिम्मे रही और उनका काम सराहनीय है, परन्तु अभिषेक के एंट्री सीन को छोटा कर सकते थे। संगीत व नृत्य फ़िल्म के मजबूत पक्ष हैं, और इसके लिए फ़िल्म को जरूर देखा जा सकता है। प्रीतम हमेशा से ही अच्छे संगीतकार रहे हैं, और यहाँ वो खुल के निखरे हैं। फ़िल्म अंततः थोडा निराश करती है, इसलिए नहीं कि ये एक ख़राब फ़िल्म है, नहीं, यह एक सुगठित व सुनिर्मित महाकाव्य है,. परन्तु आमिर से लोग इससे बेहतर कि उम्मीद करते हैं, अब आमिर महज एक अभिनेता नहीं हैं, वो मार्गदर्शक हैं, धूम 3 उनके मार्गदर्शन का एक चरण है। इसे अवश्य देखा जाये, और किसी अफवाहों पर ध्यान न दे कि ये किसी हॉलीवुड की चोरी है, होगी, परन्तु हॉलीवुड में कोई आमिर नहीं है, कोई बीटा नहीं है जो अपने पिता के प्रति अपनी भावनायें इस तरह व्यक्त करे, वहाँ कोई भाई नहीं जो कहता हो बाबा ने कहा था हाथ नहीं छोड़ना, वहाँ कोई पुलिस नहीं जो कहता हो मैं तुम्हे बचाना चाहता हु। ये भारत के आत्मा कि अंग्रेजी लिबास वाली फ़िल्म है। जरुर देखा जाये। 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

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"अनुभूतिवश": संस्मरण के संग संग


 सपेरा 
                               - अंकित झा 
कहाँ आज  वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल
भूतियों का दिगंत छविजाल 
ज्योति चुम्बित जगती का भाल 
राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन विस्तार?
                                                                   - सुमित्रा नंदन पंत (परिवर्तन) 

बात इसी गर्मी की है, सेमेस्टर के अंतिम कुछ क्लास लेने कॉलेज जा रहा था, सुबह का समय था. कड़ी धूप होने की तैयारी थी,  फिर जेठ की दुपहरी कौन नहीं जानता? पसीना सुबह से ही आना शुरू हो गया था. घर से पैदल दूरी पर कॉलेज है, पर बस पास की रईसी ने कम्बख्त पैरों में जंग लगा दिए थे. अब ऊंट पहाड़ के नीचे था, अपनी वाली पे. 11 का रेड लाइट पार करके सेक्टर 8 के बस स्टॉप के करीब था. तभी सामना हो गया एक सपेरे से. सपेरा क्या कहिये खौफ से. बचपन से यदि किसी भी चीज़ से डरा हूँ तो वो है साँप। गन्ने के रस के स्टाल से थोड़ा आगे बढ़ा और सपेरे के करीब। दान पुण्य का कोई ख़ास शौक नहीं रहा और सवेरे-सवेरे वो भी किसी मजबूर व त्रस्त भिखारी को नहीं वरन एक साधुनुमा भगवा वस्त्र व जटाधारी सपेरे को? कदापि नहीं। बिना ध्यान दिए आगे बढ़ गया. हाथ फैलाये वो पास आ रहा था, बिना ध्यान दिए आगे बढ़ रहा था. पिटारे से साँप निकल दिया उसने, फ़न काढ़े साँप मेरे बाईं ओर पिटारे में कुण्डली मारे बैठा था, जेब से एक सिक्का निकाल आगे बढ़ते हुए असहजता में पिटारे पिटारे कि और फेंक दिया, सिक्का साँप के फ़न से जा टकराया। साँप बौखला उठा, जटाधारी उससे ज्यादा। मेरी और बढ़ा। मैं बुरी तरह घबराया और आगे बढ़ गया। बढ़ा क्या भागा। ऐसी हालातों में हाथ अपने आप प्रार्थना में जुड़ जाते हैं और प्रार्थनायें समूचे हृदय में गूंजने लगता है। मैं घबरा के भागने लगा, सड़क के दायीं ओर भारी भीड़ जा रही थी  और मैं इधर अकेला घबराया सा भागा जा रहा था। श्रद्धा और भय में बड़ा ग़जब का रिश्ता है, उस दिन यकीन सा हो गया। कुछ ही दूर पे सेक्टर 20 कि कोतवाली, जान में जान आयी। कोतवाली के सामने जाकर खड़ा हो गया, एक ग़ज़ब सा यक़ीन कि यहाँ तो मुझे कुछ नहीं हो सकता। कुछ देर बाद जब फिर से पीछे मुड़ के देखा तो वह घूम गया था। वह आगे बढ़ गया, मैं कुछ देर खड़ा रहा, फिर से एक बार मुड़ के देखा। देखा कि एक और लड़का मेरी ही तरह मेरी ही ओर भगा आ रहा है। पता नहीं क्यों पर हंसी छूट गयी इस बार, ये सब देख के, डर मिट चूका था।

यह घटना कतई उतना खतरनाक नहीं है, परन्तु श्रद्धा के नाम पर डर दिखा के ऐसी लूट वर्षीं से चली आ रही है। सीता भी तो दान-पुण्य के चक्कर में ही रावण द्वारा हरी गयी थी। भारत में यदि सबसे आसान तरीकों से लुटना है तो श्रद्धा-भक्ति व दान-पुण्य के चक्कर में पड़ जाइये।।   

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

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मिथिला में मॉल???!!!!!!
                                                          - अंकित झा 

उस राह पर चलते गए जिस राह पर राहगीर न मिले,
शहर की भीड़ में मुझे शायर तो मिले, पर कबीर न मिले।।।

3 सालों कि खबासी और सूद अब तक चूका रहे हैं, कुछ नया हुआ नहीं कि अपनी मनहूस यादें लेकर बैठ जाते हैं मिथिला की बात करने के लिए. सब सोचेंगे अब नया क्या हो गया? फिर लड़ाई हो गयी क्या मेरी मिथिला के नए आशिकों से?(http://mraindian.blogspot.in/2013_06_01_archive.html) नहीं फिर से नहीं। इस बार कुछ ज्यादा बड़ा घटा है. सुना है मिथिला में मॉल खुला है, जी हाँ मिथिला में मॉल खुला है. सीतामढ़ी, अरे वहीँ जहाँ माता सीता प्रगट हुई थीं, लिच्छिवियों कि भूमि व बिज्जीका भाषियों का गढ़. सीतामढ़ी। मेरे गाओं के करीब ही है, ज्यादा दूर नहीं। सुनने में आया था कि वहाँ कि बहनें आज भी अपने भाइयों के लिए 'सामा-चकेबा' के गीत गाती हैं कार्तिक में. सच कह रहा हु बस सुनने में आया है. जितना मैं उस भूमि के बारे में बताना चाहता हु उतना ही पीछे हटने का मन करता है, न जाने क्यों, पर करता है. सबसे बड़ी बात कि वो मेरे पिता सहित हमारे पूरे परिवार कि जन्मभूमि है, उसपे से आने जीवन के अहम् ४ वर्ष वहां बिताये हैं तो फिर कैसे न वो यादें सताएं मुझे। मध्य प्रदेश का भूत तो मुआ अब जवानी में जा के चढ़ा है, वर्ण बचपना तो आज भी बिहार कि उस गंगा कि चिकनी सफ़ेद मिट्टी में लोट लगा रही है. बासोपट्टी का वो बभिन्दयी पुल, जो ना  जाने  कब से बन रहा है, अब भी पूरा नहीं हुआ है. उस तालाब  के बारे में किवदंतियां, जिसे 12 राक्षसों ने एक रात में बनाया था, या फिर धत्ता पर का वो भूतहा आम की गाछी, जहां पर जा के ठहरने की वीरगाथाएं सभी युवा झूठा ही सही पर सुनाते हैं. उसी माटी कि सौ ख़ुशी नहीं हुई मॉल के बारे में सुनकर बिलकुल भी. मिथिला को मॉल कि क्या जरुरत आन पड़ी, वो भी मुजफ्फरपुर या समस्तीपुर या दरभंगा में नहीं बल्कि सीतामढ़ी में? कमाई या खर्च का नया रास्ता। अच्छा रास्ता तो है। परन्तु कितना समृद्ध होगा कौन बतायेगा? 
फ़ोटो :the indian express
मिथिला के लोगों कि एक बड़ी ख़राब आदत है, तुलना करने की. इतनी खराब कि उन्हें लंदन घुमा दीजिये, कहेंगे कि पटना से खली जगह में बड़ा है, नहीं तो कंकरबाग का मार्किट छोटा है का? नहीं तो गांधी मैदान क्या लॉर्ड्स से छोटा भी है. इसीलिए कभी कभी चिढ जाता हु पर यही तो उसे खास बनती है. अब मुझे ही देखिये तुलना ही तो करने जा रहा हूँ. मॉल का खुलना कटाई कोई नयी घटना नहीं है, मार्केट हुआ करते थे अब ऊपर से छत लगा के वो मॉल कहलायेंगे पर वो ऊपर कि छत सिर्फ एक बार ही सुकून दे पायेगा। मीना बाज़ार कि तरह बार बार नहीं या फिर गोगिया सर्कार के जादू कि तरह बार नहीं। आइयेगा एक बार, याद करियेगा बार बार. दरी पे बैठना है 15 रुपैया, कुर्सी पर बैठना है 25 रुपैया और किसी न किसी औरत का दरी को महत्व्पूर्ण समझकर उसका दोहन करना। मिथिला का रास है. मॉल खुल गया अर्थात, मेले अब मर जाएंगे, जो सिर्फ हुकुर हुकुर सांसे भर रहे थे वो साँसे भी अब छीन ली. अभी नवम्बर के पहले ही हफ्ते में अर्थात दीवाली पर ही तो मिथिला को अपना ये मॉल मिला है, राजनीतिक ईंट, कांच और सीमेंट से निर्मित। भाजपा विधायक सुनील कुमार पिंटू ने ही टी इसका अनावरण किया, राजनीती के बिसात पर. काफी दुःख और खेद के साथ कहना पद रहा है कि सीतामढ़ी जैसा ज़िला जो अपने मिथिलेश नंदिनी के जन्म के लिए जाना जाता है, अब तीन मंज़िले बाज़ार कलकत्ता के बाहर अपने युवाओं का हुरदंग देखेगी। होता आया है होता रहेगा। इंद्र पूजा और गणेश पूजा के मेले अब बस यादों का हिस्सा बन जायेंगे, हो सकता है मेरी बातें कुछ कुछ रूढ़िवादी लग रही हो पर सत्य कई बार ऐसा ही होता है. आगे बढ़ने का मतलब अपने रिवाजों को पीछे छोड़ना कब से हो गया? शादी में अब पनीर और फ्राइड चावल परोसे जाने लगे हैं परन्तु गौना के दिन का बपफर कौन भुला सकता है? कोई नहीं मैं तो कतई नहीं। मॉल तो आवश्यक हैं, आधारभूत संरचना के इए भी व अर्थव्यवस्था के लिए भी. पर रिवाज़, परम्पराएं व संस्कृति का क्या? ऐरावत हाथी पर बैठे देवराज का क्या? एकदंत गणेश का क्या? जनकनंदिनी का क्या? कुछ तो सोंचो मिथिलावासियों कि मॉल में जब साम कार्नर होगा तो कितना मज़ा आएगा। दुसरे मंज़िले पर जब आल्हा गया जाएगा और पिज़्ज़ा व बर्गर कि जगह बघिया व स्पंज मिठाई अलोंग विथ मालपुआ खिलाया जाएगा। 
तब तक मॉल का मज़ा लो, जब तक कुछ नया नहीं होता या फिर मुझे मिथिला के लीचियों कि याद नहीं आती, सिनुरिया आम के बाद।।

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

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मोह भंग, तत्पश्चात् ??
                                                               - अंकित झा
स्वर्णिम प्रभात की आभा, तत्पश्चात? सर पर नाचती आदित्य की किरण, तत्पश्चात्? अरुण दिवाकर की लालिमा, तत्पश्चात्? खनखन करती आती संध्या का मुस्कुराता राकेश, तत्पश्चात्? रजनी में पसरता मोह का अभिसार, तत्पश्चात्? पुनः स्वर्णिम प्रभात व मोह भंग. मोह भंग, तत्पश्चात?

बड़ी अजीब शुरुआत थी. बहुत दिनों बाद लौटा हु न इसलिए। दैनिक अखबारों में हमसफ़र व हमदर्द कि कुछ बातें चल रही हैं. उच्चतम न्यायलय ने अपने एक निर्देश में स्पष्ट कर दिया कि  'लिव-इन रिलेशनशिप' कतई जुर्म या अमान्य नहीं है. अब प्रश्न यह कि ये 'लिव-इन रिलेशनशिप' क्या? भारत कि प्रगति के कई सूचक हैं, उनमें से ये नए फसल की भाषाएं भी हैं. हिंदी की नयी नस्ल। अपभ्रंशीय नस्ल। सांकेतिक व विचारोत्तेजक नस्ल। कुछ शब्दों कि तो ऐसी बहुलता हो गयी है कि पता लगाना मुश्किल है ये हिंदी है या अंग्रेज़ी? तारीफ़ है या तौहीन? बड़ी विडम्बना है. इन्ही शब्दों में से एक है- 'लिव-इन रिलेशनशिप। इसे अंग्रेजी में आप 'प्री-मेरिटल रिलेशनशिप' भी शौक से कह सकते हैं. उसी का अव्यय मात्र है. अंतर बस फ्रीक्वेंसी का है व ट्रांसमिटिंग का. इस अंतर में एक यथार्थ निहित है, यह अंतर बदलते समय व नए वर्ग कि परिपक्वता का है. परिणय अब कोई आवश्यक रस्म रह ही नहीं गया, पूर्व-परिणय सहचरी भी रहने लगे हैं अब. ये ही तो नयी नस्ल है. ज़रा याद कीजिये, सिद्धार्थ आनंद निर्देशित 'प्रीती ज़िंटा- सैफ अली खान' अभिनीत फ़िल्म "सलाम-नमस्ते". मुद्दा कुछ याद आया? नहीं, फिर ज़रा स्मरण कीजिये यश चोपड़ा निर्देशित 'अमिताभ-शशि-निरूपा' की "दीवार" के 'अमिताभ-परवीन' का रिश्ता? अब याद आया कुछ।  जी. परिणय के परे एक सम्बन्ध। प्रेम की नयी पहचान। प्रगति-प्रेम-परिणय व प्रफुल्लता का नया नाम -'लिव-इन रिलेशनशिप। भारत में ये सब कब से होने लगा? यहाँ तो परिणय का निर्णय भी अभिभावक करते हैं फिर ये सहचरी का, दो नवयुगल कैसे? भारत में? विदेशी गांड है क्या? नहीं बस नाम विदेशी है. काम व इतिहास देशी है. सम्बन्ध देशी है. प्रेम तो भारतीय इतिहास का प्रतीक रहा है. आज से नही आदिकाल से. सतयुग से अब तक. सहधर्म, सहचर, सहकर्म सभी. इस प्रेम में त्याग निहित है, सम्मान निहित है व निहित है भावना। कलयुगी प्रेम में मिलता है ये सब? मोबाइल फ़ोन के नंबर से शुरू होने वाला प्रेम व नॉट वर्किंग एनीमोर पर समाप्त होने वाला प्रेम क्या सच में वही भारतीय प्रेम है? राधा-कृष्ण व दुष्यंत-शकुंतला वाला? त्याग व समर्पण वाला? परिभाषाएं व मानक तो बदलते ही रहते हैं, प्रेम के साथ भी ऐसा ही हुआ है. तरीकें बदल गए हैं. त्याग नहीं रहा, पाने कि ज़िद्द आ गयी है. सम्मान नहीं रहा, समर्पण नहीं रहा; ख़ुशी कि चाह आ गयी है. अतः प्रेम अब प्रेम ही नहीं रह गया, जरुरत है सभी की. सभी की का अर्थ यहाँ सभ से है.
फिर आयी ये परिणय। छोड़िये कोई अनुभव नहीं है. और अनुभूति को क्या व्यक्त करूँ? आते हैं 'लिव-इन रिलेशनशिप' पर. प्रेम की कोई वैद्यता नहीं होती, धोखे तो होते ही रहते हैं. पहले ये त्याग कहलाते थे. परन्तु परिणय की वैद्यता आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है प्रेम व परिणय के बीच की कड़ी कि वैद्यता। सबसे आवश्यक। उच्चतम न्यायलय का ये अहम फैसला है।  ऐसे हज़ारों उदहारण देखने, सुनने व पढ़ने को मिल जायेंगे जिसमे २ से लेकर २० वर्षों तक के रिश्तों के पश्चात एक दम से सभी नाते तोड़ दिए गए व सहचरी को कानून का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा. इन्साफ मिला, मुआवज़ा मिला परन्तु हक़ नहीं। रिश्ता नहीं। प्रेम नहीं। फिर ऐसे बीच में लटके ऐसे रिश्ते का क्या मतलब? जहाँ पर मजबूरी के इतने अधिक आशाएं हैं. प्रेम में बच्चे गलतियां करते हैं. न्यायपालिका कब से करने लगी? नहीं, ये कोई गलती नही, क्रन्तिकारी बदलाव के प्रति प्रथम कदम है. कईं सारे उदहारण है, पढ़ियेगा अवश्य। 
सब कहते हैं कि 'लिव-इन रिलेशनशिप' पाश्चात्य सभ्यता कि देन है, गलत. कतई नहीं। भारत से अधिक  कानूनी करामातें हैं विदेशों में. कनाडा, अमेरिका, जर्मनी जैसे देशों में या पूर्णतः विधि के अंतर्गत आता है व कानूनी प्रक्रिया पूर्ण करने के बाद प्रारम्भ होता है. समस्या ये है कि 'लिव-इन रिलेशनशिप' अधिकांशतः दुखांत ही हुए हैं. सफलता के ज्यादा उदहारण नहीं है. जहाँ पर अपना अधिकार माँगा जा सका है न बच्चे के लिए पिता का नाम. फिर ये तो होना ही था. सपनो कि नगरी को ध्वस्त होने में समय ही कितना लगता है? सिर्फ नींद खुलने तक का. प्रेम को किसी नाम कि अपेक्षा नहीं , आवश्यकता नहीं। बेनाम ही अच्छा, बदनाम होने से तो. यौवन कि विषमताएं बहुत हैं. बुद्धि व समझ को टाक पर रख कर लिया गया फैसला अंततः घटक ही सिद्ध होता है. इसका कटाई ये मतलब नहीं कि 'लिव-इन रिलेशनशिप' बुरा है. वैवाहिक औपचारिकताओं कि न सोंच यदि कानूनी रूप से प्रेम सम्बन्धों को नया नाम व आयाम दिया जा रहा है तो क्या गलत है? विचार कीजिये।
सोंचने का कोई कर नहीं लगता।।।।।।।

बुधवार, 27 नवंबर 2013

Analysis

The MANGO Revolution-I
                                - Ankit Jha

If I need to elect a thief, I would prefer a new one to the traditional, ask any intellectual in the capital these days, whom are they voting to, and you will get the same answer. One answer that simply indicates that circumstances are on the verge to conversion. It has been hardly a year and few months for the formation of this revolution turned Political Party and its effect in coming election is estimable. Unveiling its first and so called, well researched Manifesto of Arvind Kejriwal led Aam Aadmi Party for the upcoming Delhi Legislative Election, and Party has redefined the socialist and populist issues that always attracts the common men of India.
On the contrary of Greater Delhi dream of Congress and Well-structured Delhi of BJP, AAP has emphasised on the well-mannered, democratised and well organised Delhi. In its box of promises, AAP didn’t promise of any Tablet-Laptop or romanticised subsidy. It talked of its origin the same, Delhi Jan Lokpal Bill, Mohalla sabha and Citizen Force. Attending any political rally of AAP seems like attending the agitation of Anna Hazare or the Kavi sammelan or a debate competition. Wherever Kumar Vishwas, the poet turned politicians, he is asked to recite his famous lines ‘Koi Deewana Kehta Hai…’ remember the Jeet ki Goonj, the music concert organised by AAP at Jantar Mantar, this Saturday. They continuously claim other parties and politicians of being corrupt, thief and even con.

Their agenda is well defined but Kejriwal (Bhrashtachar ka ek hi kaal, Kejriwal Kejriwal.) wherever he goes, his anti-corruption slogans follows. He needs to come out and get forward of these all, he must talk of Security, inflation and sanitation in Capital but he doesn’t. Cast doesn’t play a big role in Delhi but community plays, his biggest challenge is not to bring new voters but to save his voters before they choose other wing. It doesn’t cross all classes, especially he is the hero of those migrated voters who have settled in Delhi, the unorganised business class and above all Lower middle class. Yes, it is new flow of politicians in the Indian politics but one thing that AAP needs to remember that who their antagonisms are? They are the king of the empire where they are trying to triumph. Till then remember a slogan “Paise pe Na Daaru pe, Mohar lage bas Jhaadu Pe.”