बुधवार, 11 जून 2014


परिवर्तन से परे 

सांप्रदायिक समरसता के शत्रु कौन हैं?
                                                                                                         
                                                                                                               - अंकित झा 


समाज को समुदाय या संप्रदाय भ्रष्ट नहीं करती बल्कि इसे भ्रष्ट करती है इंसान की  वो सोंच जो इतिहास को अपने रिश्ते का हिस्सा बनती है. यह सत्य है कि जिस इतिहास में मानवीय संवेदनाओं का विध्वंश छिपा है, वो कभी नहीं मरती परन्तु क्या ये सत्य नहीं है कि इतिहास को कुरेदना भी इतिहास बनाने का ही हिस्सा है.

जिस दिन जलेगा चमन, झुलसेगा सारा समाज.
ना कोई हिन्दू बचेगा न कोई मुसलमां.
आग गीता देख कर अपने दिशा नहीं बदलेगी 
और ना ही कुरआन के सजदे में झुकेगी. 
                                                                                                - शाव्य्साची 

दृश्य कुछ इस तरह का था कि कमरे के बीचों बीच फैले मखमल के दरी पर एक बड़ी सी थाल सजी हुई थी, थाल में तरह तरह के पकवान पड़ोसे हुए हैं, मिठाई, किमामी, शाकाहारी बिरयानी, पकौड़े, और ना जाने कितने ही तरह के भजिये, मुन्गोड़े और पकौड़े. फ़हीम चाचा के बेटे का ये 12वें वर्षगांठ का जश्न चल रहा था. हर ओर ठहाके लग रहे थे, कभी किसी के कहकहे पर तो कभी किसी के. अब्दुल मियाँ अपने अरब के किस्से सुना रहे थें, तो अश्फ़ाक जो कि फ़हीम के बेटे का मास्टर भी है, अपने कॉलेज के किस्से सुना रहे थे, उसी ठहाकों में अनिल बाबु के ठहाके भी शामिल थें, अनिल व फ़हीम दोनों ने कामयाबी की सीढियाँ साथ ही चढ़ना शुरू की थीं, और आज दोनों अपने जगह पर सफल व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं. अनिल बाबु के साथ उनका भाई और एक अन्य मित्र भी बैठा हुआ है. इतने में नयी सरकार की बात छिड़ी, हकीम राज के नाम से मशहूर डॉ इलियास ने ऐसी बात कह दी कि माहौल एकदम से गंभीर हो गया. इस पर अनिल बाबु के मित्र ने टिप्पणी  कर दी कि हम तो हमेशा से ही मेहमानवाजी के लिए जाने जाते हैं, जो लुटेरे बन कर आए थे वे सोंचे कि किसको स्वीकार करना है और किसे नहीं. सारी आँखें अनिल बाबु के मित्र पर उठ गयीं ऐसा विवादास्पद टिप्पणी अन्हें शोभनीय नहीं थी, परन्तु उत्तर सदैव प्रश्न के टक्कर का या फिर उससे बेहतर होना चाहिए. दर असल डॉ इलियास ने कहा था कि हिन्दुस्तान की मेहमानवाजी का कोई जवाब नहीं है मियाँ गले काटने वालों को भी हार पहनाने में सोंचते नहीं हैं, किसे स्वीकार लिया देखिये ज़रा. बात तनिक बिगडती दिखी, डॉ इलियास कहने लगे, मियाँ रुवाब मत झाडिये अपने ऐसे होने पर, मेहमानवाजी की बात करते हैं, हमें लूटेरा कह रहे हैं आप, ...... बात बिगड़ते देख फ़हीम जी ने बीच बचाव किया परन्तु जो हालत बिगड़ गए थे वो अब न सुधरने थे, इतने में अशफ़ाक मियाँ भी अपने कमीज का बांह ऊपर करते हुए कहने लगे, देखिये भाईजान ना ये देश आपकी मिलकियत थी और ना ही कभी रही है. मिसालें हमने पेश की है, आप जैसों को सुधारकर, ज़माना जानता है, कैसे संभाला है इस मुल्क को हमने, बनाना ही आता है हमें, ढाहना नहीं. माहौल बिगड़ चूका था, अब बचाव से कुछ नहीं हो सकता था, अनिल बाबु उठे और अपने भई और मित्र को उठा कर ले जाने लगें, और जाते जाते कह गयें, दूसरो के छाती पर अपने बाल लगाने को निर्माण नहीं कब्ज़ा कहते हैं. डॉ इलियास तमतमा उठे परन्तु कोई चारा नहीं था, अनिल बाबु जा चुके थें. उनका जवाब या जवाबी कार्यवाई को देखने और झेलने हेतु कोई नहीं बचा था.

यही होता आया है इस देश में, ना जाने पल भर में कैसे सारी मित्रता भुला दी जाती है, अपने कुछ बात, खटास, मनमुटाव को इतिहास का नाम दे कर कैसे दो समुदायों में  फूट डाल दिया जाता है. समाज को समुदाय या संप्रदाय भ्रष्ट नहीं करती बल्कि इसे भ्रष्ट करती है इंसान की  वो सोंच जो इतिहास को अपने रिश्ते का हिस्सा बनाती है. यह सत्य है कि जिस इतिहास में मानवीय संवेदनाओं का विध्वंश छिपा है, वो कभी नहीं मरती परन्तु क्या ये सत्य नहीं है कि इतिहास को कुरेदना भी इतिहास बनाने का ही हिस्सा है और ये सामाजिक सौहार्द्य के लिए कितना विध्वंशकारी है. इस देश में हर रोज़ इतिहास के घाव कुरेदे जाते हैं और इस अग्रगमन में कितने घाव लगाये जाते हैं, किसी को इसका कोई ठिकाना नहीं होता. राष्ट्रिय एकीकरण किसी भी लोकतंत्र के लिए कितना आवश्यक है, ये किसी को बताने की आवश्यकता नहीं  है. तथा राष्ट्रिय एकीकरण के प्रमुख तत्वों में से एक है, सामाजिक व सांप्रदायिक समरसता. श्रीरामचरितमानस का एक वाक्य है, 'परहित सरीर धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई'. जिसका अर्थ ये है कि दूसरों की मदद करने से अत्यधिक बड़ा धर्म और विश्व में व्याप्त नहीं है. समाज की नींव ही यहाँ से पड़ती है कि समाज का हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में एक दुसरे पर निर्भर रहता है, जिसे समाजशास्त्र में पारस्परिक निर्भरता कहते हैं. यह सोंचने योग्य बात है कि यदि समाज में ऐसी निर्भरता न हो तो समाज कैसा दिखेगा? अलग अलग विश्व, जो एक दुसरे से बात नहीं करता है, एक दुसरे को देखता है परन्तु कोई ख़ास ध्यान नहीं देता. भयावह दृश्य नहीं होगा वह. ऐसे ही कई भयावह दृश्यों को समाप्त करने हेतु समाज की स्थापना की गयी. मनुष्य एक दुसरे से भिन्न हो सकता है, आकर, आकृति, चेतना, विवेक तथा कौशल में. परन्तु मनुष्य एक दुसरे से इस तरह तो भिन्न नहीं होते कि उनके नाम, उपनाम, जाती, प्रजाति, धर्म, वर्ण व लिंग के आधार पर अंतर निकाले जाए. यही तो अंतर है, प्रकृति व प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ कृति में कि ये अंतर के नए नए तरीके निकालने में सक्षम हैं. भेदभाव सामाजिक संरचना का हिस्सा सदा से ही रही है, परन्तु इस भेदभाव की दीवार को कभी भी मानवीय रिश्तों पर हावी नहीं होने दिया गया था, परन्तु वो कौन सी बुद्धि होगी जिसने धर्म के अंतर को कट्टरता का नाम दिया होगा. हिन्दुओं को ब्राह्मण, बनिया व यादव कहके भेद करवाया होगा जो अंततः विवाद का कारण बनी होगी, तथा इस्लाम में  मुसलमान व काफ़िर बनाये होंगे. आज कट्टरता सब पर हावी है, इतनी कि जिसका शब्दों में वर्णन करना कठिन है.

हाल ही में पुणे में हुए 28 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल शैख़ मोहसिन सादिक की निर्मम हत्या के बाद मेरे मन में कई प्रश्न नित्य ही खड़े हो जाते हैं. कहते हैं वो नमाज़ अदा करके आ रह था, सर पे टोपी लगाई हुई थी, कुछ विवाद भी था पहले का, बस मृत्यु के लिए पर्याप्त कारण हो गये थें क्या? इस हत्या को विभत्स्म्रित्यु की संज्ञा दी गयी है,  ऐसी मृत्यु जिसमें घृणा की वजह से हत्या की जाये तथा बाद में वो कृत्य मानवता का वीभत्स कृत्य बन जाये. जब कानून बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के बदले सजा ए मौत सुनाने में 25सों सुनवाई लेती है, तो कोई उन्मादी भीड़ कौन होती है किसी को मृत्युदंड देने वाली? ऐसे उन्माद ही समाज में घृणा के दीवार खड़ी  करती है और इसमें फंसती है लाखों मासूम जिंदगियां. कोई घटना को आने  वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से जोड़ के देख रहा है तो कोई लोकसभा चुनाव के नतीजो के पहले लगायी जाने वाली अटकलों का प्रारंभ. ये क्या है? कोई नहीं जानता सिर्फ इतना ही जानता है कि ये जो कुछ भी हुआ समाज के लिए अच्छा नहीं हुआ. युवा मन में जब कट्टरता के बीज बो दिए जाते हैं तो उनका अंत किसी तलवार से कट कर या किसी एनकाउंटर में पुलिस के बन्दूक से ही होती है. ऐसी हत्याओं के दोषी कभी सामने नहीं आते, बस उनकी परछाई सामने आती है, एक भीड़ के रूप में और छिन्न भिन्न कर देती हैं, मानवीय आशाओं को. ऐसे कृत्य कतई शोभनीय नहीं होते परन्तु ये घटित होते हैं, क्योंकि आज भी समाज एक नहीं हुआ है, आज भी कोई तलवार लेकर इस ताक़ में है कि कोई दाढ़ी वाला मंदिर के सामने सर ना झुकाए और उसका सर ईशनिंदा के ज़ुल्म में उड़ा दिया आये तो वहीँ कोई टोपी लगाये इस ताक़ में खड़ा है कि कोई चोटी वाला निकले बस दरगाह के सामने उसका सर ना झुके फिर देखो क्या अंजाम होता है. समाज में घृणा की नींव जिन्होंने रखी थी, अब वो ज़हेन्नुम में अपनी सजा भुगत रहे हैं और हम धरती पर अपने जन्नत को ज़हेन्नुम बनाने पर तुले  हुये हैं. 

मंगलवार, 3 जून 2014

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मियां ये 370 क्या होता है?
                                                                                       
                                                                                               - अंकित झा 

शहर से बाबू पढ़ कर आये हैं, खूब पूछ परख हो रही है, पूरे घर में हंगामा सा मचा हुआ है, काहे कि छोटे बाबु पढ़ कर आये हैं, दिल्ली से. गाँव के बड़े बूढ़े बार बार आ जा रहे हैं, आते जाते एकाध प्रश्न पूछ लेते हैं, जैसे ही उत्तर मिला गौरवान्वित हो कर लौट रहे हैं, और यदि उत्तर नहीं मिल रहा है, तो अफ़सोस भी ज़ाहिर कर रहे हैं कि पैसा बर्बाद कर दिए बाबु, कुच्छो न किया इ परदेस जा कर. 

शाम की बात थी, छुटकन बाबू जरा सैर पर निकले थे, गाँव के चौपाल पर उनकी मुलाक़ात हो गयी मुखिया और उनके कुछ मित्रों से, हमारे गाँव की यही तो संस्कृति है कि पढ़ के कोई भी आये, गाँव गौरवान्वित होता है, ख़ुशी और ग़म जो भी हो, गाँव हंस कर स्वीकार करता है. मुखिया जी ने पूछा, अरे भई आज कल इ 370 बहुत सुन रहे हैं, का है इ 370? तनिक बताओ तो. अब इसे परीक्षा कहिये या फिर कुछ जानने की जिज्ञासा, मुखिया के भाई ने भी पूछ ही दिया कि हां मिया ये 370 क्या होता है? कोई नया कानून है का? शहरी बाबु मुस्कुरा दिए और कहा कि जी कानून ही है, परन्तु नया नहीं है, बहुत पुराना है, हमसे और आपसे भी, यही मुखिया जी के उम्र की होगी. सभी हंस दिए, परन्तु हंसी की गूँज में मुद्दे की अहमियत कम नहीं हुई, बाबू बोलना शुरू हुए, कश्मीर तो आप जानते ही हैं, अपने भारत का सिरमौर जब हमारे पड़ोसी देश पकिस्तान हमसे अलग हुआ था, तो कश्मीर को लेकर खूब रागरघस मचा, भारत बोले कि कश्मीर हम लेंगे, पाकिस्तान भी अप्नेज़िद्द पर अड़ा रहा, बाद में कश्मीर को आजाद मुल्क बनाने का फैसला किया. इतने में रघुबीर चाचा बोल उठे, अरे! हमारी वैष्णो मैया बसती हैं वहां, गर्भ्गुफा है वहाँ , कैसे दे देंगे कश्मीर? बाबु उन्हें चुप करते हुए बोले, हाँ हाँ चाचा यही तो बात थी, फिर जा के घमासान युद्ध हुआ, भारत और पकिस्तान में, हमारे प्रधान मंत्री संयुक्त राष्ट्र पहुंचे सहायता के लिए इस मुद्दे पर. संयुक्त राष्ट्र ने श्वेत पृष्ठ जारी किया और कहा कि कश्मीर पर फैसला जनमत संग्रह से हो, जब प्रदेश में शांति बहाल हो जायेगी. कहते हैं गलती की उन्होंने, और गलती थी भी, यदि युद्ध से कोई फैसला आ सकता तो उचित होता क्योंकि आज 67 बरस होने को आये और न ही शांति बहाल हो पायी और न ही वो जनमत संग्रह. उसी के फलस्वरूप एक अलग दर्जा देने की बात की गयी, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के अनुसार जम्मू और कश्मीर को देश में विशेष दर्जा प्राप्त है, जिसके अनुसार राज्य के कुछ ही निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लिए जा सकते हैं, जिसके अलावा सभी फैसलों पर राज्य सरकार तथा विधान सभा का अधिकार है, इसी तरह से कई अलग आदिकार निहित है जम्मू और कश्मीर के पाले में जैसे वहाँ पर राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जा सकता, न ही देश में लगे आपातकाल को वहाँ लागू किया जा सकता है. यही सब कुछ है बस, और क्या. बाबु ने बोलना समाप्त किया. सभी के आँखों में गर्व महसूस किया जा सकता था, कि बाबु ने कितनी सुन्दरता से समझाया इस बात को. मुखिया जी ने अपनी मूंछों पर ऊँगली फेंरते हुए पूछा कि फिर आज कल काहे इ मुद्दा उठ रहा है, इ तो बहुत पुराना लग रहा है? 

अरे उ का है चाचा कि जो नया सरकार आया है न, उ कुछ प्रश्न उठाया है इस अनुच्छेद के सार्थकता पर. तो इसी वजह से पूरा बहस छिड़ा हुआ है. अब कोई चाहता है कि ये अनुच्छेद और इसका प्रभाव जस का तस बना रहे तो कोई इसके प्रभाव को कम कर इसे समाप्त करने का पक्षधारी है. किसी भी मुद्दे को प्रभावहीन बनाने से पूर्व उसके प्रभाव व दुष्प्रभाव को समझना अति आवश्यक होता है, जैसे देखिये, आतंकवाद एक समस्या है, परन्तु इससे लड़ने हेतु इसके सभी दुष्प्रभाव को जानना आवश्यक है, आर्थिक, सामाजिक, मानवीय, नैसर्गिक इत्यादि. किसी भी समस्या का समाधान उस के संरचना में ही छुपा होता है, 370 कोई समस्या है या नहीं, ये अभीतक तय नहीं हो पाया है. इसके अंतर्गत आने वाले विशेष प्रावधानों के नतीजतन जम्मू और कश्मीर के एक बड़े हिस्से को सदा ही इससे असंतोष रहा है. असंतोष कभी कभी विद्रोह का भी रूप धारण करती है परन्तु यह कभी जाहिर नहीं हो पता है. इस अनुच्छेद के करणवश हुए उपद्रवों तथा कश्मीरी पण्डितों के विस्थापन के बाद से ही दक्षिणपंथी विचारक इस अनुच्छेद के विघटन की बात कर रहे हैं. परन्तु, इस अनुच्छेद के कंधे पर अपनी राजनैतिक हथियार चलाने वाले राजनैतिक दल कदापि ऐसा नहीं चाहेंगे. भारत के सिरमौर में आये दिन जो घटनाएँ व दुर्घटनाएं होती हैं, उनको इस अनुच्छेद से जोड़कर अवश्य देखा जाना चाहिए, किसी कारणवश ही सूबे में सुरक्षातंत्र मजबूत नहीं हो पाया है. विशेष दर्जे के बावजूद जब तीसरे दर्जे सा हाल बना के रखा गया है तो निश्चित ही ये क्रियान्वयन में लाचारी तथा अकर्मण्यता के फलस्वरूप है. 

कश्मीर में एक समस्या था, अब कश्मीर स्वयं एक समस्या है. दोष किसका है, ज्ञात नहीं. पीड़ित कौन है, देख लीजिये, सिर्फ कश्मीर, कश्मीरी या पूरा देश? उत्तर निकाल पाना दुश्कर सा लगता है, उसपर से कश्मीर के प्रति लोगों की सहानुभूति तथा चिंता देखकर कुछ विशेष करने का सबका मन करता है. कुछ विशेष तो पहले से ही हो रहा है, वहाँ, साधारण ही क्यों नहीं छोड़ देते, जिस तरह बिहार प्रगति कर रहा है, वहाँ का गुंडाराज आज कल थोडा आराम कर रहा है, उसीप्रकार कश्मीर को साधारण क्यूँ नहीं छोड़ देते हैं? उसपर से लटका दी है, जनमत संग्रह की तलवार. अरे समस्या सुलझाए कौन? इस कश्मीर का आका है कौन? या फिर ये आज़ाद है? उच्चश्रिंखिल, बिना किसी अवलम्ब के. कश्मीर अवचेतन में डूबा एक अबोध बच्चे की तरह है, जिसके माथे से खून बह रहा है परन्तु उसे उस खून कि नहीं बल्कि उस चोट की फ़िक्र है जो उसे पीड़ा दे रही है. इस पीड़ा में आँखों से आंसू भी आ रहे हैं और माथे से खून भी. पहले क्या पोछा जाये? तय कर लें.     

शनिवार, 17 मई 2014

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चुनाव विशेष

ये इतिहास नहीं भविष्य है!!!

                               -    अंकित झा

नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मंद्र नव

नव, नवल, नवीन, हर ओर एक नयापन सा छाया हुआ है. उम्मीदें अब वास्तविकता में बदल चुकी हैं. चुनाव संपन्न, नतीजें प्रस्तुत हो चुके हैं और वो करिश्मा हो चुका है, जिसकी प्रतीक्षा सभी को थी. तथाकथित अच्छे दिन आ गये. 30 वर्षों बाद देश को एक ऐसी सरकार मिलेगी जो पूर्ण बहुमत से संसद में आएगी. कोई जोड़-तोड़ का गणित नहीं, गठबंधन के लालच नहीं, कोई राजनैतिक गुणा-भाग नहीं सिर्फ स्वप्न के पूर्ण होने का उल्लास. देश के हर क्षेत्र में कमल खिल चूका है, कश्मीर से कन्याकुमारी तथा नागालैंड से नवसारी हर जगह कमल ही कमल खिला हुआ दिखाई देता है. देश के सबसे पुरानी पार्टी की सबसे ऐतिहासिक तथा शर्मनाक हार. कहां प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न तथा स्थिति आज विपक्ष भी न बना पाने की. यह जीत ऐतिहासिक नहीं तो और क्या है? इस बार कोई सहानुभूति नही जीती, कोई भावनात्मक प्रबलता हावी नहीं हुई, कोई जातीय समीकरण नहीं चले, चला तो बस एक नाम, नरेन्द्र मोदी. मित्रों! की वो झंकार जहां जहां कानों में गूंजी उधर कमल खिला, वन्दे मातरम् की टंकार जिस दिशा में पहुंची वहाँ कमल खिला, जहां कभी नैराश्य बिखरा पड़ा था आज वहाँ उम्मीद के कमल खिल रहे हैं. हर ओर एक ही नाम, एक ही पार्टी, एक ही शोर, एक ही गर्जना, एक ही विजय गान. इतिहास क्या है? समय का ग़ुलाम. समय क्या है? मानवीय कर्मों के सिद्धि की अवधि. अवधि, जब समय भी एक क्षण थमकर मनुष्य को प्रणाम करने को रुकता है, उसी क्षण को ऐतिहासिक क्षण कहते हैं, आज वही है. समय एक बार रुक कर नरेन्द्र मोदी को प्रणाम कर लेना चाहता है. साहस, वीरता तथा पराक्रम के नए आयाम को गढ़ने के लिए. इस जीत के कई मायने हैं, कोई कहेगा ये कांग्रेस की हार है, तो कोई उसके नीतियों की हार, परन्तु ये कोई नहीं कहेगा कि ये जीत एक विश्वास की है, विश्वास कि अभी भी परिवर्तन संभव है.

गठबंधन के जोड़ तोड़ के परे एक स्थायी सरकार की अपेक्षा को पूर्ण बहुमत के साथ सहयोग मिला, 286 कमलों को भेंट स्वरुप दिया गया. इतने कमल आज तक नही मिले थे भेंट में, तीस वर्ष बाद किसी सरकार के पास गठजोड़ का बहाना नहीं होगा. ये हर्ष का समय है, तो इसे कतई जाने मत दीजिये, हिंदी के जयगान का समय है, भारतीय संस्कृति के विजयघोष का समय है, इस जश्न को चलने दिया जाये. ये इतिहास नहीं है, इतिहास तो अभी रचा जाना बाकी है. ये भविष्य की उम्मीद है, एक आकांक्षा है कि कल आज से बेहतर होगा. इस पूर्ण बहुमत के जश्न में डूब जाने दीजिये, निकालिए मत. ग्लास आधी खाली है या पूरी भरी, समय आ गया है जानने का. उम्मीद है कि भविष्य में इतिहास रचा जायेगा, जो अब तक न हुआ हो सकता है, अब हो. जय हे.  

मंगलवार, 13 मई 2014

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परिवर्तन से परे

शायद इसे ही महंगाई कहते हैं
-    अंकित झा

समाज में जिस तरह जीजिविषा की क्षति हो रही है, उतने ही तेजी से स्वप्न की मांग बढ़ रही है, इस मांग के बढ़ने से मनुष्य के स्वभाव का मूल्य कम हो रहा है. स्वभाव के इस अभाव से मानवीय प्रवृत्ति में अंतर आता है, ये समाज के लिए हानिकारक है. ऐसी स्थिति जब समाज में स्वप्न चरम पर होंगे तथा मानवीय चेतना का नित्य हास होता रहेगा, इसे महंगाई कहते हैं. वास्तविक महंगाई.

समाज के सामने मैं बेबस खड़ा हूँ,
नोंच खायेंगे आज मुझे या फिर कोई भून लेगा
अंत तय है, समाज के हाथों मेरे शरीर का,
समाज के दुविधा को
मैंने दरिद्रता का नाम जो दे दिया था... 

उस छोटे से घर की बड़ी समस्याओं को जानने वाला कौन अवतार लिया है? यह छोटा सा घर किसी का भी हो सकता है, किसी का भी. देखिये उस छोटे से घर के अन्दर क्या हो रहा है, माँ चूल्हे के पास बैठे रोटियां सेंक रही है, बीच बीच में अपना दुखड़ा सुना देती है, सामने बैठे अपने पति को जो अभी अभी सर में तेल लगा कर खाने को बैठा  है, तेल के गंध से पूरा घर महक रहा है और माँ की बात से घर में गर्मी बढ़ रही है. दो रोटी ही खा पाया था कि बात बढ़ गयी, वही रोज़ की खटपट. वही गली गलौज और वही बर्तनों का पटकना. तेल की गंध बाहर को जाते दिखी, काम की ओर जा रही है सवारी, वो घर में सिसक रही है, सामने बैठा उसका छोटा सा बेटा चीख रहा है, शायद भूख लगी होगी उसे, माँ के पास बस रोटी और सब्जी है, उसे कुछ भी नहीं भाता. बीते महीने नानाजी के घर गया था तो डॉ. ने बताया कुपोषित है, पेट बाहर को निकल रहा है और पैर छोटे हो रहे हैं, अर्थात देश के उस खुशकिस्मतों में इसका नाम भी आ गया है. एक बेटी और बेटा और हैं जो सवेरे ही स्कूल को जा चुके हैं, खाना खा कर ही आएंगे. अब डरते हैं खाने से, स्कूल में ही मिलता है, 3-4 महीने पहले की ही बात है, बेटे ने मध्याह्न भोजन किया, इतना बीमार पड़ा कि शहर तक जाना पड़ा सरकारी खर्चे पर इलाज़ के लिए. बेटा था और सरकारी खर्च था इसलिए इतना संभव भी हुआ, वरना कौन ताक़ देता है इतना इस वर्ग को? गाँव के मुखिया के पास बीपीएल कार्ड बन रखा है परन्तु इनके पास नहीं है. चोली-दामन का रिश्ता है, भ्रष्टाचार और गरीबी का इस देश में. नौकरी किस आधार पर मिले? ज्यादा मजदूरी हो नहीं पाती, पत्नी को काम करने से माना किया गया है, काम किया तो जान देनी पड़ेगी, हद से ज्यादा कमजोरी हो गयी है. इनके आंसुओं का स्वाद किसी के मुख को बेस्वाद कैसे नहीं करता है?  
बेटी अब बड़ी हो रही है, कभी उसकी शादी होगी, इसकी चिंता अभी से उस को खाए जा रही है, सरकार ने कोई योजना बनाई है, हम जैसे माँओं के लिए, हमारे बेटियों के पढाई का खर्च शायद सरकार उठाएगी अगर अव्वल आ गयी तो, पर अव्वल कैसे आये? भूखे पेट कब तक अव्वल करेगी? बाप के हाथ में पैसे टिकते ही नहीं. पैसे तो बीमारी और किराने में ही खर्च हो जाते हैं, शुक्र है सरकार है. कैसी सरकार है, गरीबी नहीं हटाती बल्कि गरीबी को संस्थागत कर देती है, ग़रीब हो? कोई बात नहीं हम हैं ना, ग़रीब ही तो हो कौन से विपक्षी दल के हो. ग़रीब होने का फ़र्ज़ निभाओ, तुम्हारी सहायता हम करेंगे. भूख की बारात में शामिल हो जाओ, गरीबी के जश्न में ठुमके लगाओ, रोटी की रैलियाँ होगी, सपनों की कव्वाली और मज़ाक उड़ेगा इंसानियत का, हास्यास्पद हो जाएगी ना ज़िन्दगी. इससे अच्छी भी कहाँ है? ग़रीब हो या अमीर या फिर दोनों के मध्य संघर्ष करता देश का माध्यम वर्ग, आर्थिक हालात के समक्ष सभी लाचार हैं, किसी के पास कोई उत्तर कोई प्रतिउत्तर नहीं है, है तो बस एक वाक्य विशेष- महंगाई काफी बढ़ गयी है. ध्यान देने वाली बात ये है कि महंगाई होता क्या है? बढ़ कैसे जाता है? कौन बढाता है?
अर्थशास्त्र में महंगाई उस स्थिति को कहते हैं जब किसी स्थान पर एक समय अंतराल में वस्तुओं के मांग की वजह से उसके मूल्य में वृद्धि होने लगे. महंगाई इसलिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह मनुष्य के औकात को ललकारती है, क्योंकि एक अवधी में मूल्य वृद्धि की वजह से मनुष्य के जेब पर असर पड़ता है उसके खरीदने की क्षमता कम हो जाती है. इससे पैसे की हैसियत पर भी असर पड़ता है. परन्तु ये सब शास्त्र व नीतियों की बातें हैं, समाज में महंगाई उस स्थिति को कहते हैं जो अंत होने का नाम ही नहीं ले रही, जितना कमाओ उतना खर्च, जितना जमा करो उतनी जरूरतें, उपभोगतावाद से आगे बढ़ गये हैं हमलोग. अब खरीदने की होड़ नहीं है, अब बेहतर खरीदने की होड़ लग गयी है. खरीदो, पसंद नहीं बेच डालो, कुछ नया प्रयास करो. अर्थशास्त्र का एक सूत्र कहता है कि बाज़ार अपना अंत स्वयं तय करता है, ऐसा ही हो रहा है. जिस तरह समाज पर बाज़ार तथा बाज़ार पर पूंजीवाद हावी हुआ है, यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए कि समाज अपने दरिद्रता को पीछे नहीं छोड़ रहा वरन उसे कब्र में छुपाने की कोशिश कर रहा है जब तब यह मुंह खोले बाहर आ जाता है. समाज के तीन वर्ग हैं, एक जो अच्छे स्कूल जाते हैं, एक जो खराब स्कूल जाते हैं तथा एक जो स्कूल ही नहीं जाते हैं. इसी तरह समाज के तीन धरें हैं, एक जिसे सपने देखने की आवश्यकता नहीं, एक जो केवल स्वप्न देख सकते हैं तथा एक वो जिन्हें स्वप्न देखने का अधिकार ही नहीं. स्वप्न पर कुछ इस तरह बंटा हुआ हैं समाज मानो लगता है, समाज अपने ही क्रूरता पर हंस रहा है. नींद तीनों ही को नसीब नहीं है, एक सो नहीं पाता कि काम इतना है, एक सो नहीं पाता कि महिना कैसे चलेगा और एक सो नहीं पाता क्योंकि आधे पेट नींद नहीं आ रही है, चिंता उसे भी है कि कल उसके परिवार के सभी सदस्य सूरज देखेंगे या नहीं. हर ओर चिंता है, अनिद्रा है समाज सो नहीं पा रहा है, परन्तु जाग भी कहाँ रहा है?
अर्थशास्त्र की सुने तो समाज में जिस तरह जीजिविषा की क्षति हो रही है, उतने ही तेजी से स्वप्न की मांग बढ़ रही है, इस मांग के बढ़ने से मनुष्य के स्वभाव का मूल्य कम हो रहा है. स्वभाव के इस अभाव से मानवीय प्रवृत्ति में अंतर आता है, ये समाज के लिए हानिकारक है. ऐसी स्थिति जब समाज में स्वप्न चरम पर होंगे तथा मानवीय चेतना का नित्य हास होता रहेगा, इसे महंगाई कहते हैं. वास्तविक महंगाई. मानवीय चेतना का मूल्य उसके बैंक में पड़े बचत से कई अधिक है, तीन हिस्सों के स्वपन को एक होने के असंभव प्रयास के कारण समाज में उत्पन्न होने वाले दुबिधा को महंगाई कहते हैं, माध्यम वर्ग के स्वप्न पूर्ती पर लगे ग्रहण को महंगाई कहते हैं, राजनेताओं के भाषण में प्रयोग होने वाले सर्वमुखी वचन को महंगाई कहते हैं, उच्च वर्ग के होटल के बहार खड़े भिखारी को भीख न दे पाने की स्थिति को महंगाई कहते हैं. फिर जो मेरे सामने एक घर में चल रहा है ये क्या है?

शाम हो चली है बेटा खेल के आया है, बेटी कोचिंग से आई है, घर में टीवी चल रहा है, कोई सीरियल आ रहा है, माँ सब्जी काट रही है, पिताजी का आगमन हुआ, बेटे ने देखा मुस्कुरा के कमरे में चला गया, बेटी ने रिचार्ज के बारे में पूछा जैसे ही ना में उत्तर मिला नाराज़ होकर अन्दर चली गयी. माँ-पापा दोनों एक दुसरे को देखते रहे, पापा सोफे पर बैठे, पानी लाने को कहा, मोबाइल निकाला, साइलेंट पर किया और रिमोट उठा के दूसरा चैनल लगाया, माँ की आवाज़ आई पैसे देना है केबल का, पिताजी ने टीवी बंद कर दिया, शायद इसे ही महंगाई कहते हैं.         

रविवार, 11 मई 2014

Movie Review

फिल्म समीक्षा

मानवीय विकारों का दर्पण है मस्तराम

                                               -    अंकित झा

साहित्य का नित्य हास हो रहा है आज के उपन्यासों से. और समाजिक गंद को सभी अपना हमदर्द बनाये बैठे हैं क्योंकि ये उनके विकारों को बल प्रदान करता है. मसाला मिलाने की जिद्द इस कदर जोर पकडती है, साहित्य में रूचि रखने वाला राजाराम अपने कृतियों में मसाला मिलाने को आतुर हो जाता है.

एक लेखक, नवविवाहित. साहित्य में स्थान बनाने का स्वप्न और साथ अपने अर्धांगिनी का. हिमाचल के एक छोटे से शहर में संघर्ष. एक दोस्त, कुछ हमदर्द और कुछ हमराही. यही ज़िन्दगी है राजाराम की. राजाराम के मस्तराम बनने की कथा रोचक है परन्तु उतनी ही विवादास्पद. साहित्य क्या है, समाज में होने वाली गतिविधियों का दर्पण. जो कुछ भी हो रहा है साहित्य का हिस्सा है, मानवीय संघर्ष से लेकर स्वप्न तक सभी कुछ. इसी बीच पलता है, मानवीय विकार. ये विकार हैं स्वभाव तथा उसके प्रभाव का. मानवीय चेतना के गर्त में उसकी कामेच्छा बस्ती है, रह रह कर ये मनाविय स्वाभाव पर हावी होता है, समाज ने इसे हवस का नाम दिया है, और फिल्म में इसे मसाला कह कर संबोधित करते हैं. जब भी कभी राजाराम अपने शुद्ध साहित्यिक कृतियों को छपवाने की जतन करता है, नाकामयाबी प्राप्त होती है. कोई उसे एग्जाम गाइड लिखने की सलाह देता है तो कोई चाचा चौधरी टाइप कॉमिक्स. उसके साहित्य का निरादर फिल्म का एक अहम् हिस्सा है, और हमारे समाज की विडंबना भी. साहित्य का नित्य हास हो रहा है आज के उपन्यासों से. और समाजिक गंद को सभी अपना हमदर्द बनाये बैठे हैं क्योंकि ये उनके विकारों को बल प्रदान करता है. मसाला मिलाने की जिद्द इस कदर जोर पकडती है, साहित्य में रूचि रखने वाला राजाराम अपने कृतियों में मसाला मिलाने को आतुर हो जाता है.

A poster of Mastram 2014
फिर जन्म लेती है, भारतीय साहित्य इतिहास का वो पन्ना जिसपर सिर्फ जनता का हाथ था, प्रेमचंद और प्रसाद को पढने वाली जनता अब बुक स्टाल पर कुछ और खरीदने जाया करती थी, नाम था मस्तराम. समाज के गतिविधियों का ही वर्णन परन्तु, ये उन रिश्तों की गाथा थी जिसे समाज लुकेछुपे निभाती है. नर्स, बनिया, दोस्त, पत्नी, पड़ोसन, कोई उसके ख्याली गंद से बच नहीं पाते हैं. वो हर रिश्ते में अब कहानी ढूंढता है. पहले कुछ और था, रिश्तों पर कहानी हावी होने लगा. समाज तो जैसे मुंह फाड़े खडा था ऐसा कुछ पढने को, हॉस्टल के छात्रों से लेकर दफ्तर में काम करने वाले युवा या मंदिर की ओट में बैठे बूढ़े सभी हाथ में मस्तराम की भक्ति में लीन रहने लगे. सामाजिक मसाला इस तरह स्वादिष्ट लगने लगा कि समाज की सिसकियाँ अंगराई लेने लगी. यह कोई नई कथा नहीं है ये आज के समाज का परिदृश्य है, सामाजिक हवस का प्रतिबिम्ब है. वो सत्य है जिसे मनुष्य कबूल नहीं करना चाहता है, जिसे वो सिर्फ अंजाम देना चाहता है. फिल्म अपने हिसाब से काफी लचर है, कुछ दृश्य अच्छे हैं परन्तु राजाराम के चरित्र को मजबूती नहीं दी गयी, इसीलिए जब सभी रिश्ते उसे ठुकरा देते हैं तब भी हमारी सहानुभूति उसके साथ नहीं जुड़ पाती. पत्नी के साथ भी कुछ ऐसा ही है, पात्रों को बाँध के रखा गया है, लेखन में भी कमियाँ है. परन्तु यह फिल्म एक उदहारण है कि समाज अभी बहुत कुछ देखने को तैयार है. मस्तराम कतई प्रफुल्लित नहीं करती, कुछ सीटियाँ लूटती है परन्तु प्रभावहीन. संवाद काफी अच्छे हैं, परन्तु चरित्रों का असरहीन अभिनय संवाद को दबा देते हैं. अखिलेश जैसवाल इससे पहले गैंग्स ऑफ़ वास्सेय्पुर लिख चुके थे, उम्मीदें कुछ ज्यादा थी, निराश होना पडा. फिल्म एक भी ऐसा कारण नहीं देती जिस हेतु इस फिल्म को देखा जाए, हां किस तरह सेक्स कहानियों को रेडियो फीचर की तरह सुना जाए ये दिखाती है. सुनना हो तो जा सकते हैं. अथवा न जाना ही बेहतर. यह फिल्म मानवीय विकारों को उस दृश्य में दर्शाती है जब राजाराम का दोस्त जो कुछ क्षण पहले उसे ऐसी कहानी लिखने के लिए कोसता है, मस्तराम खरीदते दिखता है. ये सोंच पर एक स्पर्श मात्र है, जोर नहीं. कुछ और चाहिए जोर डालने के लिए. हम अपने हवस का इलज़ाम किसी और के सर नहीं डाल सकते हैं, कैसे डाल दें. अपने ज़मीर को क्या जवाब दे पाएंगे? क्या पढ़ के आये हैं, क्या देख के आये हैं, क्या करने की इच्छा है? कुछ भी व्यक्त नहीं कर सकते. इसे ही खामोशी कहते हैं और ख़ामोशी को गंद का नाम और कहें तो मसाला का नाम देती है मस्तराम.  

शनिवार, 3 मई 2014

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परिवर्तन के परे

मेरे भूख का मतलब क्या है?

                                              -    अंकित झा

फिर से एक कच्चा घर होगा, घर में एक औरत होगी, जो शायद माँ होगी, खाली बर्तनों की ओर निहार रही होगी, मजबूर बाप आएगा, कांपता हुआ, कि आज फिर कुछ नहीं कमा के ला पाया, एक बेटी होगी जो भूखी होगी परन्तु पिता को हौसला देगी, एक छोटा बेटा होगा जो भूख से तड़प कर रो रहा होगा, उससे छोटा एक और बेटा होगा जिसे भूख का अर्थ नहीं पता, वो माँ के दूध पर जिंदा है, माँ का तो कलेजा सूख चूका है, माँ उसे कैसे बताये कि भूख का मतलब क्या होता है, और न ही वो बच्चा पूछ पाता है कि मेरे भूख का मतलब क्या है?

‘गर उजड़ना है तुम्हें तो क्यों न देशहित में ही उजड़ो’ याद है किसके किसके अनमोल वचन हैं ये? देश के प्रथम प्रधानमंत्री के, हीराकुड बाँध बंधने जा रहा था, सभी ओर नाराज़गी, हम अपनी ज़मीन खाली क्यों करें? वो भी इस मानवीय विध्वंश के लिए, उड़ीसा में पहले क्या कम भूखमरी है, जो ये दीवार और बांधा जा रहा है, नदी और हमारे बीच. किसकी कौन सुनता है, बंध गया, महानदी की महाशोभा. पश्चिमी ओडिशा उजाड़ दिया गया, 60 मी के इस भौकाल के लिए. 22000 परिवार विस्थापित हुए, कहने को करोड़ों बांटे गये, क्षतिपूर्ति के रूप में, वास्तविकता ये थी कि मिला भी तो सिर्फ 33 मिलियन, वो भी पूर्ण सत्य नहीं है.
इस देश में मानवीय दंगल के फेरें सभी ने लगाये कहाँ हैं, लम्बी फेहरिश्त है; टेहरी बाँध बड़ा उदाहरण है, फिर वेदांता का बंगाल प्लांट, सरदार सरोवर की अठखेलियाँ और पूर्णतः विफल रहा टाटा नैनो का मिशन बंगाल. विस्थापन एक ज़ख्म है, मनुष्य के अस्तित्व पर, मनुष्य के स्वभाव पर, उसके स्वपनों पर, उसके अपनों पर, सहचरी पर, उसके विरासतों पर. सरकार के लिए वो साईट है, ज़मीन का टुकड़ा है, लोगों के लिए वो पिता के पहली कमाई से खरीदी गयी ज़मीन है, बंजर हो जाती है, तो क्या हुआ, पसीना देकर सींचेंगे, एक दिन तो फसल उगेगी ही. सरकार क्षतिपूर्ति ज़मीन का देगी, पिता के ख्वाबों का नहीं, उसकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा? मानवीय स्वाभाव कहता है, जो वस्तु हम लौटा नहीं सकते वो कभी छीनना भी नहीं चाहिए. फिर सपनों पर कब्ज़ा करने का हक किसने दिया है, किसी को. परन्तु क्या करें सरकारें गरीब के सपनों से नहीं, रईसों के नोटों से चलता है, कुछ गलत कह दिया मैंने क्या? उस थाली की फ़िक्र किसे है, जिसमे तीन रातों से रोटी नहीं गिरी है, बस मक्खी कभी कभी आकर बैठती है और जल्दी से उड़ भी जाती है क्योंकि कुछ है ही नहीं उसमे, अब तो गंध भी नहीं बचा है. फ़िक्र तो शेयर बाज़ार के लुढ़कने का है, क्योंकि एक का दो होने को जो रखा गया है पैसा उसमें. गरीब के घर के बहार पल रहे बैल की चिंता किसी को नहीं, दलाल पथ पर खड़े उस पत्थर के बैल की सभी चिंता किये जा रहे हैं. घंटो बहस होते हैं, निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता. बस एक बात सामने आती है कि गरीबी नियंत्रण आवश्यक है. यह कैसा आर्थिक विकास हो रहा है? उन आँखों की फ़िक्र किसे हैं, जिससे आंसू रुकने का नाम नहीं लेती क्योंकि उसके 3 साल के बेटे ने सुबह से कुछ नहीं खाया और पति पैर तुड़वाकर फूटपाथ के किनारे लेटा है, इस इंतज़ार में कि किसी का ज़मीर जागे और सिक्का फेंक दे उसकी तरफ, बेटी तो हनुमान और देवी बनकर सुबह से मोटरों के सामने जा के करतब दिखा के मांग रही है, कुछ ख़ास मिला नहीं है अब तक. मांग में भी तो दम होनी चाहिए, फिर कुछ दरियादिलों के दिल के ज़ख्म कुरेदे जायेंगे और करुणा में आँख बंद कर लेंगे और सोंचने लगेंगे ऐसी दुर्दशा क्यों है इस देश की. इन नज़रों की ओस कब मिटेगी, इनके बदन पर लगी मिट्टी कब साफ़ की जाएगी, कब तक आंसू पीकर ही प्यास बुझेगी, कब तक ये छोटे छोटे मासूम सड़कों पर करतब दिखाएँगे, मजबूरी कब तक इनको बचपन से दूर रखेगी, कब तक ये छोटे हाथ अपनी माँ के आंसू पोंछते रहेंगे, कब तक भाग्य इनके जिस्म पर मेहरबान रहेगा, साथ कब तक बना रहेगा मुक़द्दर का इनके सर पर, विकास के आधार फ्लाईओवर के नीचे पलती ये जिंदगियां वापस कब बसेंगी? क्या कोई उत्तर है किसी के पास? गरीबी मापी नहीं जाती, यह महसूस की जाती है, कोई समिति गरीबी का मूल्यांकन नहीं कर सकती, भला वातानुकूलित कमरों में बैठकर ये सरकार के बंधुआ मजदूर देश की ग़रीबी का मूल्यांकन करेंगे, कि 30 रु. कमाने और खर्च करने वाला ग़रीब है या 100 रु. कमाने वाला. ग़रीब कौन है? हर वो इंसान ग़रीब है, जिसके माँ बाप वृद्धाश्रम में पलते हैं या वृन्दावन, द्वारका और पुरी में भिक्षा की आस रखते हैं, रिक्शों पर रात बिताने वाला ग़रीब है, जिनके कान पर इनके प्रति करुणा की जूं नहीं रेंगती वो इंसान ग़रीब है. बड़े बड़े बिल्डिंग में दो दरवाजे और, उन दरवाजों में 4 कुण्डियाँ लगा कर सोने वाले देश के लोगों को उनकी कभी फ़िक्र होती है कि लोग फूटपाथ पर कैसे सो लेते हैं, क्या उन्हें कोई डर नहीं होता? ‘क्या उन्हें कोई डर नहीं होता, जिनका अपना कोई घर नहीं होता?’ शब्द की नहीं भावना की गहराई को मापिये, चकाचौंध में आँखें चिल्मिला जाया करती हैं, सत्य विलीन हो जाता है, चौंधियाए आँखों से बस आंकडें ही दिखते हैं. इन बद्किस्मतों की किस्मत हमारे हाथों में हैं, हाँ, बद्किस्मतों के भी किस्मत हुआ करते हैं, तभी तो भूखे ही पर ये आँखें हंस दिया करती है बचपन की अठखेलियों में और कुछ फोटो खींच लिए जाते हैं, जिंदादिली दिखाने के लिए. इन्हें पता है भूख क्या होती है, परन्तु ये नहीं पता कि इनके भूख का मतलब क्या होता है? शून्य प्रभाव. कुछ करुणा, मात्र. असहाय धर्म के अधिकारीयों के लिए, अल्लाह के बन्दे कहने भर का समय, और नम आँखों से उन्हें बिदाई देने की तैयारी. बचपन को, ग़रीबी को, भूख को, मजबूरी को, इनके बेजान मुक़द्दर को, सड़क पर गाड़ी के सामने करतब दिखाती उस मासूम के बचपन को, मुंबई के लोकल ट्रेन में पुलिस के आने पर खिड़की से कूदकर भागते मासूम की ज़िन्दगी को, सब को अलविदा कहने का समय हो रहा है. सुना है, गरीबी पर कोई प्रोग्राम आने वाला है, देखते हैं आज कौन सी नई ग़रीबी देखने को मिलता है. शायद फिर से एक कच्चा घर होगा, घर में एक औरत होगी, जो शायद माँ होगी, खाली बर्तनों की ओर निहार रही होगी, मजबूर बाप आएगा, कांपता हुआ, कि आज फिर कुछ नहीं कमा के ला पाया, एक बेटी होगी जो भूखी होगी परन्तु पिता को हौसला देगी, एक छोटा बेटा होगा जो भूख से तड़प कर रो रहा होगा, उससे छोटा एक और बेटा होगा जिसे भूख का अर्थ नहीं पता, वो माँ के दूध पर जिंदा है, माँ का तो कलेजा सूख चूका है, माँ उसे कैसे बताये कि भूख का मतलब क्या होता है, और न ही वो बच्चा पूछ पाता है कि मेरे भूख का मतलब क्या है?    


शुक्रवार, 2 मई 2014

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चुनाव विशेष

विवशता और विश्वास की कसौटी
                                                                                            -    अंकित झा

यहाँ जीतने का मोह नहीं हराने की जिद्द है, इसे हराओ, उसे हराओ, जैसे हो सके वैसे परन्तु हराओ. गढ़ में सेंध लगाओ, साम्राज्य स्वतः ध्वस्त हो जायेगा. जीतने के लिए विश्वास जीतना पड़ता है, परन्तु हारने के लिए सामने वाले की विवशता का मुखौल उड़ाया जाता है,

बरस बीतने को आया है, असंख्य रैलियाँ, अनगिनत सभाएं, और विज्ञापन की भरमार. एक से बढ़कर एक नारे, संकल्प, विचार, विरोध तथा दीवानगी. सबके मन में एक ही विचार, अब की बार मोदी सरकार. 2014 का चुनाव अब चुनाव नहीं रहा है, ये अब महासमर का रूप धारण कर चुकी है, कहाँ कहाँ से संज्ञा उठाये जा रहे हैं, कितने चालाकी से सर्वनामित किया जा रहा है. चुनाव प्रचार का ऐसा खेल शायद ही पहले ही कभी खेला गया हो, मुद्दों को फिर से सम्प्रदाय की भेंट चढ़ा दिया गया है. इस बार विजय जितनी निश्चित लग रही है, उतनी ही अनिश्चित. कौन कह सकता था आज से 5 वर्ष पूर्व कि जिस राहुल गाँधी के यूपी के चुनाव प्रचार को आदर्श प्रचार बताया गया था, आज उसी का मुखौल उड़ेगा. समाज की उदासीनता को कितनी खूबसूरती से अपना ढाल बनाया गया है चुनाव प्रचार मैं. कोई उदासीनता तो कोई वही पुरानी भावनात्मक प्रपंच रच रहा है, कोई अपने पिता के नाम पर वोट मांग रहा है तो कोई किसी शहीद के माता के नाम पर तो कोई किसी के लिए. सम्प्रदाय, जाती, वर्ग फिर से फन काढ़े खड़े हैं, देश का चुनाव बिना इन्हें शामिल किये संपन्न कैसे हो सकता है. यह चुनाव विपक्ष और निष्पक्ष के मध्य है, फिर भी पक्ष की सहभागिता नकारी नहीं जा सकती. पक्ष के पास मुद्दे है कहाँ, उनके पास तो रोने को आपबीती है, उसपर से एक मूक प्रधानमंत्री का वो असहाय साया. जाए भी तो कैसे और कहाँ? नया कोई जगह मिलने से रहा, जो गढ़ हैं, उन्हें बचाया जाये, कुछ भी किया जाए परन्तु लहर को शांत किया जाए, इसके लिए, कहीं भी जाना पड़े, मस्जिद, गुरूद्वारे, कहीं भी. घाव कुरेदे जाएँ, दर्द को वापस बुलाया जाये, मॉडल की बात करते हैं, मॉडल की असलियत दिखाई जाये, हो सकता है, चमत्कार हो जाये. नहीं तो सबसे आसान काम किया जाए, डराया जाए, आसानी से वोट बाँट जायेगा, हमें तो मिलने से रहा, नए खिलाडी ही लूट ले जाएँ, इन्हें तो नुकसान पहुंचे. जितनी बर्बादी हो रही है, उसे रोकने से अच्छा है, इनके माथे मढ़ दिया जाए. कोई भी यहाँ पर इतना साफ़ नहीं है. कुछ विवश हैं तो कुछ अविश्वसनीय. चुनावों में विश्वास का टूटना तो आम बात है, कोई नयी गाथा तो है नहीं. यहाँ जीतने का मोह नहीं हराने की जिद्द है, इसे हराओ, उसे हराओ, जैसे हो सके वैसे परन्तु हराओ. गढ़ में सेंध लगाओ, साम्राज्य स्वतः ध्वस्त हो जायेगा. जीतने के लिए विश्वास जीतना पड़ता है, परन्तु हारने के लिए सामने वाले की विवशता का मुखौल उड़ाया जाता है, नतीजा सामने है.


चुनाव होते ही किसलिए हैं? ताकि देश में पैसों की आंधी को नग्न आँखों से देखा जा सके? चुनाव में प्रतिभागिता किसी युद्ध की तैयारी से कम नहीं, उसपर से जनता के आंसुओं का ख्याल. इस देश में आज तक मुद्दा चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं बन पाया समझ में नहीं आता. 65 वर्ष के लोकतंत्र में 65 मुद्दे भी ऐसे नहीं रहे होंगे जिन्हें हथियार बना कर चुनाव लड़ा गया हो. और जिस बार कुछ परिवर्तन के आसार दिखाई देते हैं, उस वर्ष ही बर्बादी की नींव रखी जाती है. इसे क्या कहें कि जिस कुर्सी के लिए इतनी मेहनत की जा रही है, उसी की गरिमा का इतना मुखौल उड़ाया जा चुका है कि आश्चर्य होगा जब नए आने वाले इस पद की गरिमा बचा पाएंगे या नहीं. चुनाव को लेकर कुछ मौलिक प्रश्न उठने तय रहते हैं, कि एक चुनाव क्षेत्र से कितने प्रत्याशी अपना नामांकन दाखिल कर सकते हैं? क्या इनके लिए कोई शैक्षणिक योग्यता आवश्यक नहीं? जब सरकारी नौकरी के लिए पुलिस वेरिफिकेशन आवश्यक है तो सरकार का हिस्सा बनने के लिए आवश्यक नहीं? कितने प्रतिशत मत पर विजय सुनिश्चित की जाए यह तय क्यों नहीं है? चुनाव में कितना खर्च हो रहा है इसकी देखरेख कौन कर रहा है?” ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो हर मन में उठते हैं परन्तु उत्तर प्राप्त करने की चेष्टा अब बच नहीं गयी है. क्या यह बात कोई नहीं जानता कि ये राजनेता जो भगवान को भी धोखा देते हैं, वो मनुष्यों के कैसे हो जायेंगे? भूल जाते हैं कि अंततः कोई अपना ही हमारी चिता को मुख्ग्नी देता है, तैयार रहना चैये ऐसे कुछ कटु सत्य को स्वीकार करने के लिए. कोई नहीं खड़ा है इस चुनाव के बाद इन प्रश्नों के कंकाल को उठाने के लिए. प्रणाली से इतने तंग आ चुके हैं हम कि अब हममें इतनी क्षमता नहीं की ऐसे प्रश्न से स्वयम्भुओं को परेशान कर सके. अब निर्मोही कहे या कुछ और परन्तु लोकतंत्र हमारे हाथ से निकल चुका है. बहुत दूर, इतना कि वापस ला पाने में समय लग जायेगा, 16 मई से पहले तो आने से रहा, कोशिश करनी होगी यदि आ सके.


शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

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विवेक और विश्वास के मध्य छिपा चिंतन
                                 -    अंकित झा

उस राह पर चलते रहे जिस पर राहगीर न मिलें,
शायर तो कई मिले पर कबीर न मिलें..

मुझे ज्ञात नहीं कि भारतीय समाज की उदासीनता कब समाप्त होगी? यह उदासीनता विवेक के विवेचना बन जाने का है तथा यह विश्वसनीयता की सबसे बड़ी विडंबना है. अक्सर इस देश के विवेकशील व्यक्तित्व के प्राणी समाज में तर्क-वितर्क के खेल को कुतर्क में बदल देते हैं तथा यह समाज के लिए उदासीनता का एक बड़ा कारण बनती है. विवेक का अर्थ क्या है? विचार-विचारधारा-विश्वास तथा विद्रोह का समागम, विद्रोह समाज में नयी लौ के आरोहन के विरुद्ध. हां, यही कुछ चले आ रहे परम्परावादी घटकों के ऐसे आदि हो चुके हैं कि कब समाज दो धारों में बंट जाता है किसी को पता ही नहीं चलता. महाभारत में पांडवों के विजय को धर्म का पराजय मानने वाले भी बहुत हैं तथा विजय मानने वाले भी, यह निर्भर करता है, विवेक पर, जो हर नयी प्रत्युषा को अपनी पाली बदलता है, हर चाय की चुस्की पर नए तर्क को जन्म देता है, तथा कभी वीभत्स योजनायें बनाता है तो कभी विचारशील चिंतन को जन्म देता है.
कहते हैं समाज व इसकी राजनीती व्यवहार से चलती है, ये व्यवहार कुछ और नहीं बल्कि मनुष्य का मनुष्य पर विश्वास है, मनुष्य का मनुष्यता पर विश्वास है. दिल्ली में परिवर्तन अपने वत्सिमा से उठकर आगे की ओर बढ़ने जा रहा है, गोयाकि यह निर्णय पूर्ण रूप से जनता के द्वारा पारदर्शिता से लिया गया. फिर भी आम आदमी पार्टी का दिल्ली में विजयघोष कसी समाज के व्यावहारिक हार की साक्षी बनी सभी ने देखा. एक नयी धरा को कैसे शातिर राजनीतिक प्रपंचों में घेर कर इसकी साँसें निकलने की कोशिश की जा रही है, सभी देख रहे हैं, कुछ पन्नो के पन्ने खर्च किये जा रहे हैं तो कुछ मौन हैं. मौन रहने वाले ये वही विवेकशील व्यक्ति हैं जो अपने आप को सर्श्रेष्ठ ज्ञाता समझते हैं, इनकी नज़र में देश के सूत्रधार बनने की अद्भुत क्षमता जो इनमे है वो किसी और में नहीं. राजनीतिक समझ जो इनको है वो तो कौटिल्य की भी न थी और न ही वृहस्पति की  है. क्या होगा ऐसे समाज का जहां विरोध विवेक का आश्रय है तथा, विश्वास एक नाज़ुक सी डोर जिस पर उम्मीदें लचक रही हैं, ज्ञात नहीं कब छिटक जाये. भारत में वोट किसके नम्म पर पड़ते हैं व्यक्ति, विवेक या विश्वास? कोई निश्चित उत्तर नहीं है इसका. परन्तु विवेक के नाम पर तो नहीं, एंटी-एस्टाब्लिश्मेंट की बात करने वाले विवेकशील व्यक्ति कभी एस्टाब्लिश्मेंट की खामियों पर नज़र क्यों नहीं दौड़ाते? हमारा देश दो खेलों में सदा से पारंगत रहा है; खो-खो व कबड्डी, एक खेल में जहां अपनी ज़िम्मेदारी दुसरे पर धकेलना पड़ता है वही दुसरे में सामने वाले की टांग खींचना है. इस काम में भरतीय सबसे आगे है, किसी की प्रगति को गले उतारना हमारे खीर की शक्कर नहीं, तथा स्वयं ज़िम्मेदारी उठाना भी. ये वही लोग हैं जो अंग्रेजियत को अंग्रेजी में ही गलियाते हैं, तथा सबवे में बैठकर भारत का अमेरिका के गुलाम होने की बात करते हैं. करबद्ध निवेदन है, जनेऊ पहनकर कर इन हड्डी चूसने वाले विद्वानों से कि विवेक की सार्थकता को कायम रखना है तो विश्वास की नीति का सहारा लेना ही उचित है, जहाँ अहंकार हो जाता है वहाँ धर्म नही बस सकता और जहां धर्म के लिए जगह नही वहाँ प्रगति के असार नहीं होते.   



सोमवार, 31 मार्च 2014

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चुनाव विशेष 

व्यक्ति विशेष तथा आम से आदमी का संघर्ष 
                                         - अंकित झा 

अमन बिक रहा है, चमन बिक रहा है,
गरीबों के नसीब का कफ़न बिक रहा है.
कोई शर्म नहीं है कहने में कि,
इन रहनीतिक दलालों के हाथों,
ये हमारा वतन बिक रहा है.”
-    एक आम राजनीतिक कार्यकर्त्ता.

12 वर्ष बीत गये उस त्रासदी को, लपट आज तक बरकरार है, इतिहास कितना महत्वपूर्ण हिस्सा है हमारी ज़िन्दगी का अब पता चल रहा है. चुनावी सरगर्मियां अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच चुकी है, हर और तीखे बयान, आरोप-प्रत्यारोप, अपनी शेखी, बड़ी बड़ी डींगे, तो वही घिसे पिटे चुनावी वादे. यही यही दिख रहे हैं, आपके अपने उम्मीदवार, आपके बीच से, आपकी सेवा के लिए, आपके समर्थन हेतु उपलब्ध है, बस मतदान तो कीजिये और छोड़ दीजिये देश अगले कुछ समय के लिए इनके हवाले. आप अगले 5 साल इन्हें अपने मत की गरिमा का मुखौल उड़ाते देखिये. कभी संसद में, कभी प्रेस वार्ता में, कभी अलग अलग सभाओं में तो कभी टीवी साक्षात्कार में. कहीं प्रयोग है, कहीं कुर्सी का सुयोग है, कहीं कुर्सी जाने का वियोग है, कहीं अपने शक्ति का विलक्षण उपयोग है. हर ओर एक अजीब सा दावानल है, धधकती आशाएं और आकांक्षाएं, नित्य अंकुरित होते स्वप्न और धराशायी होती साख.
यह चुनाव एक चुनाव मात्र नहीं है, यह एक आइना है, अपनी औकात दिखाने हेतु, अपना चेहरा दिखने हेतु, आगे का मार्ग प्रशस्त करने हेतु, ग़ालिब का शेर है, “तू न देख कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे, तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे”, अबकी चुनावी मौसम में सटीक बैठता है. जनता के आगे अपना रंग देख लें नेता जि, आपकी यही औकात है, ये बिगड़ गयी तो कुर्सी के पाए तोड़ देगी. उदहारण देख लीजिये कभी जिस सीट से रिकॉर्ड जीत हासिल कि थी, उसी सीट से हार का सामना करना पीडीए था केन्द्रीय मंत्री रहे राम विलास जी पासवान को. ये जनता है, कुछ भी कर सकती है, कमोबेश अपने मन में हो, और अपने मन का करना चाहती हो. जनता मुद्दा नहीं देखती, यदि ऐसा होता तो ६५ साल से, 4 मुद्दे देश के चुनाव तय नहीं करते, बिजली, पानी, सड़क और आरक्षण. इस बार रोटी, भ्रष्टाचार से मुक्ति, रोजगार, कुछ नये सपने और बहुत कुछ नया नया आ गया है. सच तो ये है कि इस बार नया पुराना समागम है. हाँ, ये चुनाव अलग है, ऐतिहासिक है, अलौकिक है, ऐसा चुनाव पहले कभी नहीं हुआ. इस चुनाव में मुद्दा नहीं है, मॉडल है, मोदी है, कोई मोदी के समर्थन में है तो कोई उसके विरुद्ध. परन्तु हर जगह मोदी है, हर हर मोदी घर घर मोदी. कोई अराजक कहे, कोई बडबोला परन्तु सुनने को सब तैयार हैं. ये चुनाव आम चुनाव नहीं है, ये मोदी चुनाव है, आम चुनाव में आम बात नहीं होती, यहाँ तो समूचा माहौल ही आम है, मोदी कि आम बातें तथा मोदी के आम समर्थक. मोदी पर लगने वाले आम आरोप, आम से प्रत्यंच तथा आम से प्रलोभन. हर चीज़ आम है, सिर्फ एक व्यक्ति को छोड़कर. वो विशेष हैं, मोदी. ये चुनाव मोदी विशेष हैं. अतः ये विशेष चुनाव है.  
मानव इतिहास इस बात कि साक्षी रही है कि जब जब ऐसा कुछ हुआ है, किस तरह परिवर्तन होते होते रह गया है, आगे क्या होने वाला है कोई नहीं जानता, सिर्फ इतना पता है, कुछ अलग होगा, इतनी उम्मीदें एक साथ गलत नहीं हो सकती, नहीं कतई नहीं. दिल्ली में क्या हुआ? क्या हुआ? उम्मीदें टूटी न? कैसे धराशायी हुई इतनी उम्मीदें, इतने उम्मीद के साथ नवाज़ा था सत्ता, एक आम से आदमी को. कितने सपने दिखाए थे, इन आँखों ने अच्छे समाज पर विश्वास करना प्रारंभ कर दिया था फिर कैसे अगले डेढ़ महीने हमारे उम्मीदों से खिलवाड़ किया गया. वसुंधरा के कुछ लड़कों ने वसुधा को लूटने की कोशिश तो नहीं की परन्तु हमारी उम्मीद लूट के ले गये. अब विश्वास करने का मन नहीं करता किसी पे, सब बहकावा ही लगता है, सब खोखले वादें लगते हैं. ये सबका कहना है. परन्तु जो सब कहें आवश्यक नहीं कि वो सच ही हो, राजनीती और शतरंज में यही तो समानता है कि पहले प्यादों को मरने का मौका दिया जाता है, बड़े नेता के विरुद्ध छोटा उम्मीदवार. ताकि नेता भी न हारे, और हम पर ये इलज़ाम भी न आये कि हमने कोशिश नहीं की. परन्तु ये पार्टी अलग है, बड़े नेता के विरुद्ध बड़ा नेता उतरना जानती है, अर्थात राजनीती से इत्तेफाक नहीं रखती. जीत कि मोह नहीं, हार की चेष्टा नहीं. कजरी दिल्ली से, गाजियाबाद से, हिसार से, राजस्थान से, किसी भी बड़े शहर से लड़ सकते हैं, जीतने की उम्मीद कर सकते हैं, वाराणसी ही क्यों? ताकि उन्माद कम हो, विशेष आदमी का प्रचार भी विशेष हो. मुघालते में न रहे, जैसे शीला दीक्षित रह गयी थी. वो दौर थोडा अलग था, झाड़ू तब नई थी, अब थोड़ी पुराणी है, और सफाई करते करते थोड़ी गन्दी भी हो गयी है, और कुछ मैले होने का इल्ज़ाम भी लग गया है. फिर भी राजनीती में दाग़ अच्छे हैं. राहुल गाँधी के विरुद्ध कविवर का खड़ा होना. राजनीती में दर पर जीत ही, असली जीत है. शत्रुघ्न सिन्हा के सामने शेखर सुमन की क्या बिसात, फिर भी १५००० से भी कम वोट से हारे, क्योंकि घबराये नहीं. ऐसा ही होता है और ऐसा ही होना चाहिए. देश को जितनी आवश्यकता मोदी की है, उतनी ही आम से आदमी की भी. आलोचक कुछ भी कहे, दिल पे हाथ रख के नहीं कहेंगे कि मोदी पूरे साफ़ हैं और आम से आदमी पूरे गंदे. यही साख है, अपने चरित्र पर दाग़ लग जाए परन्तु आत्मा पर दाग़ न लगने पाए. उम्मीद है, देश आम से आदमी को मौका देगा, सरकार बनाने की न सही परन्तु संसद में अपनी बात रखने की, सत्ता का मोह तो वैसे भी इन्हें नहीं है, होता तो दिल्ली की कुर्स क्यों जाने देते, लोकसभा में प्रचार के लिए. नहीं, ऐसा सोंचते हैं तो राजनीतिक समझ बढाइये. कजरी कतई गलत नहीं हैं ये कहने में कि एक सरपंच या एक पार्षद भी ये हिम्मत कर सकता है कि वो हाथ आये सत्ता को इस तरह छोड़ दे. मुख्यमंत्री तो बहुत बड़ी बात है, प्रधानमंत्री को देखिये, इतिहास बनाने और मिसाल बनने के कई मौके गवांये. १०० दिन में महंगाई कम तथा अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने का वादा, विफल हुए, कोयले का दाग़ लगा, डटे रहे, विफल हुए, भ्रष्टाचार के आरोप सरकार पर लगते रहे, चुप रहे, विफल हुए. एक बार भी अगर दिल पे हाथ रख के, इस्तीफा देने की बात भी कर देते मिसाल बन जाते कि वो दुखी थे, सरकार पर लगने वाले दागों से, परन्तु विफल रहे. ऐसी दुखद विदाई की कल्पना किसने की होगी, इतने होनहार व्यक्ति की.  

अब की बार जिसे भी वोट दें परन्तु वोट अवश्य दें. कोई भी जीते, लोकतंत्र की जीत आवश्यक है. कब तक वोट की अहमियत ख़त्म होती रहेगी, इस बार स्वयाम्भुओं को दिखा ही दें कि वोट की कीमत क्या होती है. और इससे खिलवाड़ की कीमत क्या होती है, अपने सपनों को कवाब और साड़ी पे बिकने मत दीजिएगा, यदि ऐसा हुआ तो कोई नेता विशेष या आम सा आदमी देश नहीं बचा पायेगा. तीसरे को तो उल्लेखित ही नहीं करना चाहुंगा, इतिहास उन्हें सजा देगी, 10 वर्षों तक किये गये पापों की सजा. फिर जब समय आएगा तब उन्हें भी मौका दिया जायेगा. इस बार तो इन दोनों में ही विकल्प ढूंढा जाए. कुछ और भी हैं जो अपनी आदर्शवादिता के स्वयं ही शत्रु बन बैठे हैं, कुछ समाजवादी, कुछ साम्यवादी, तो कुछ सिर्फ अवसरवादी. देश इनके साथ साथ अपने ओर भी देख रहा है, अब परिवर्तन आएगा शायद.  

रविवार, 30 मार्च 2014

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असहिष्णु अस्तित्व के अवतारी
-          अंकित झा

पूज्यनीय कौन है? जो कभी पूजे जाने की चाह न रखता हो. आदरणीय कौन है? जिसके लिए आदर स्वतः ही निकल जाये, कभी यूँ भी होता है कि आदरणीय बनाने की श्रृंखला सी लग जाती है, आदर उसे मिले जिसे इसकी इच्छा व अपेक्षा न हो. बीते दिनों अहमदाबाद जाना हुआ, (वृत्तान्त अलग से उपस्थित है) साबरमती आश्रम में गाँधी संग्रहालय के बाहर लगे गाँधी के प्रतिमा पर तरह तरह से तसवीरें खिंचवाने की होड़ लग गयी. किसे फुर्सत थी कि जरा ध्यान देकर एक बार को ये सोंच ले कि क्या कर रहे थे. मेरी एक काल्पनिक मित्र है जो दिल्ली के ही नामी कॉलेज में अध्ययनरत है, उसके कॉलेज की ही कुछ लड़कियां हमारे हत्थे चढ़ी थी, एक ने तो हमारे कैमरे पर इतना जोरदार प्रहार किया था कि टूटते टूटते बचा. कोई गाँधी के सर पे हाथ फेर रहा है, कोई कंधे पे हाथ डाले बैठा है, कोई चश्मा पहना रहा है, कोई माला खींच रहा है, तो कोई गोद में बैठने को आतुर है. यह नए समाज की नयी नस्ल है, ये गाँधी विरोधी हैं या नही ज्ञात नहीं परन्तु ये नयी अंकुरण ज्ञान के शून्य हैं ये तय है. 
इसी बात पर मेरी उस मित्र से बात हुई, उसने कहा हाँ लड़कियों ने गलत किया परन्तु गाँधी इतने भी कोई सम्मान के हक़दार नहीं थे. सम्मान, सहिष्णुता व समझदारी एक बात नहीं होती. परन्तु न मानने का अर्थ अपमान करना तो नहीं होता. हां मैं कोई गाँधी समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस नयी पिशी के गाँधी-विरोधी होते जाने के क्या कारण हैं. ये पीढ़ी उनके विचारों से लेकर उनके कृत्य तक हर विषय पर उनके विरोध में खड़ी है. ये पीढ़ी गाँधी से बड़ा आदर्श उनकी हत्या करने वाले हिन्दू राष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे को मानने लगी है. यह घृणा है, या फिर सिर्फ समर्थकों कि कमी या फिर समय की करवट मात्र? भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस तथा बाबा साहब आंबेडकर समेत सरदार पटेल को आज की पीढ़ी नायक के रूप में देखती है तो वहीँ गाँधी, नेहरु को दरकिनार करने का एक मौका नहीं गंवाती. क्या आज की पीढ़ी के लिए पकिस्तान का बंटना गलत था या फिर नेहरु का प्रधानमंत्री बनना, या फिर गाँधी का पकिस्तान को 55 करोड़ देने के पक्ष में भूख हड़ताल पर बैठने के फैसले से नाराज़ है? नहीं ऐसा कुछ नहीं लगता, कुछ तो खिलाफत आन्दोलन के समर्थन को गलत मानते हैं, तो कुछ उनके असहयोग आन्दोलन को वापस लेने के फैसले से आहात होते हैं आज तक. कुछ उनके मुस्लिमों के पक्षधर होने के कारण उनसे नाराज़ होते हैं तो कुछ उनके इरविन पैक्ट पर हस्ताक्षर करने के फैसले पर. सिद्धांत व सत्य में एक अंतर निहित है, ये अंतर ये है कि सिद्धांत को सिद्धि की आवश्यकता होती है तथा सत्य को स्वीकृति की. अतः सिद्धि व स्वीकृति के मध्य गाँधी की दार्शनिकता अटक के रह जाती है, गाँधी की दार्शनिकता सिद्धांत है, जिसे सिद्ध करने की आवश्यकता है, ये सत्य नहीं हैं जैसा कि अब तक दर्शाया जाता रहा है, यहाँ पे इतिहास विफल हो जाता है. इतिहास आज किसी के लाठी, धोती और यिनक की ग़ुलाम बन बैठी है, गाँधी परम सत्य कतई नहीं हैं. ऐसी कतई व्यसनें हैं जो गाँधी को गाँधी अर्थात परम इतिहास बनने से रोकती है, कई कारण विश्व को ज्ञात हैं तो कतई अब तक कहीं छुपी हुई या कहें छुपाई हुई. उस मित्र से मेरी बहस का अधर ये था कि उसका कहना था गाँधी को लेकर देश अपनी आँखें मूंदें हुए है, गाँधी को आवश्यकता से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुका है, जैसा कि नहीं होना चाहिए था. कहा जाता है कि गाँधी अनुभूति पर विश्वास नहीं करते थे, वो अनुभव में विश्वास करते थे, इस अनुभव के लिए वो प्रयोग किया करते थे. किवदंतियों के अनुसार ब्रम्हचर्य में स्खलन के बचाव हेतु वो कई बार पर स्त्रियों के साथ हमबिस्तर होते थें, यहाँ तक कहा जाता है कि उनकी पौत्री मनु को भी कई बार उनके साथ एक ही बिस्तर पर, नग्न अवस्था में सोते देखा गया था. गाँधी त्याग में विश्वास रखते थे, वे स्वाबलंबी थे, कस्तूरबा को उन्होंने कुलीन रिवाज़ छोड़कर स्वयं पखाना साफ़ करने के लिए प्रेरित किया था. परन्तु एक सत्य यह भी है कि वो कई बार आश्रम की स्त्रियों के सामने नग्न घुमा व स्नान किया करते थे, स्त्रियों के कंधे थाम कर चला करते थे. महाराष्ट्र से आये उनके एक शिष्य के चिट्ठी से ये खुलासा होता है. साथ ही साथ गाँधी वध के दोषी नाथू राम गोडसे द्वारा दिए गये अदालत को कारण जिसे कि एक पुस्तक के रूप में संकलित किया गया, (जो कई वर्षों तक प्रतिबंधित भी रहा था) के अनुसार भी गाँधी को मारने के 6 प्रयास हुए थे, खिलाफत के बाद से उनके संहार तक. हालाँकि गोडसे के कुछ कारण उनके मंशा को कमजोर कर देते हैं परन्तु अधिकांश कारण चीख चीख कर यह कहते हैं कि गाँधी परम सत्य नहीं थे, ग़ुलाम देश में उन्हें इतनी आजादी कहाँ से प्राप्त हो गयी थी कि वो जो चाहें प्रयोग कर सकते थे. सबसे बड़ा दोष है आश्रम से नित्य आने वाली करुण रुदन की दयनीय आवाज़. गाँधी आश्रम स्वच्छ नही था, ये दूषित था, यहाँ सिद्धांत के साथ साथ दुर्व्यसन भी पलता था, इसे जो नाम दे दिया जाये वो सही. गाँधी अपने अहिंसा के कारण प्रसिद्द थे, आश्रम में किसी भी तरह का हिंसा वर्जित था, यहाँ तक कि यौन सम्बन्ध बनाने पर भी रोक थी, क्योंकि ये भी एक तरह का हिंसा है परन्तु बा के साथ हुए हिंसा का क्या? गाँधी के प्रयोग के दौरान होने वाले हिंसा का क्या? गाँधी ने भगत सिंह के बम काण्ड को दमनकारी तथा पागलपन कहा था, उसी भगत सिंह ने 63 दिवस ताज हक़ के लिए भूख हड़ताल किया था तथा अंग्रेजी हुकूमत कि जडें काँप गयी थी, २३ वर्षीय भगत सिंह के समाजवादी सिद्धांत 70 वर्षीय गाँधी के सिद्धांतो को आसानी से टक्कर देते थे, गाँधी सकारात्मक सोंच वाले, आस्तिक तथा कौमी एकता को मानने वाले थे, उनपर अध्यात्म की छाप उनकी माता पुतली बाई के समय से ही था. आश्रम में सुबह शाम भजन गूंजा करते थे, सारे विषों-विपदाओं को काटने वाले भजन. “वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पेड परे जाने रे”, परन्तु गाँधी से यूँ भगत के माता-पिता व देश के युवाओं का दर्द क्यों नहीं देखा गया, यह रहस्य है. पर्दा उठाना नामुमकिन सा है. सिर्फ गाँधी, उस फांसी को रोक सकते थे. परन्तु ऐसा नहीं हुआ. देश के सपूत हंसते हंसते फांसी को चूम गये, गाँधी मौन रहे. सदा की तरह उनमे बौखलाहट नहीं दिखी. गीता में लिखा है कि जिस समय सारे तर्क विफल हो जाते हैं, उस समय शस्त्र उठाना ही पड़ता है, परन्तु गाँधी के शस्त्र ना उठाने की जिद्द देश को कई वर्ष पीछे ले गयी. न देश तब तैयार था और न वास्तविक आजादी के समय. और देश को ऐसे प्रधानमंत्री का तौफा दिया कि देश के मुकूट को ही विश्व समस्या बना कर रख दिया.  

कारण कईं हैं, परन्तु गाँधी कौन है ये कोई नहीं जान पाया. और न जान पायेगा य इतिहास उसे जानने नहीं देगा. क्योंकि कलम सिर्फ उनकी जय बोलता है जिनकी स्याही किसी के सजदे झुक गया होता है और इतिहास सिर्फ उनकी गवाही देता है जो अपने नाम को बेचना जानते हो. कभी फिर बहस छेड़ेंगे, अनशन पर बैठकर गाँधी के लिए न सही तो गाँधी के विचारों ही के लिए सही पर एक बार को आँखें जरुर मूँद लेंगे और कहेंगे “आज फिर से किसी माँ की कोख में हलचल सी मची है, शायद ये नए क्रांति के अंकुरण का समय है.”     

सोमवार, 10 मार्च 2014

Movie Review

आधुनिकता व यथार्थ के रस से बनी है 'क्वीन' 
                                          - अंकित झा 

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दो फिल्में रिलीज़ हुईं, दोनों ही महिला केन्द्रित तथा दोनों ही छोटी बजट की बड़ी अपेक्षाओं वाली फिल्में. आज के दौर में जब हर ओर स्त्री विमर्श का बोलबाला है, उस समय ऐसे मौके पर फिल्म के रिलीज़ होने का अर्थ है, मुनाफा. मैं भी किसी एक फिल्म को देखना चाहता था, एक ओर समकालीन शीर्ष अभिनेत्री रह चुकी दो महाभिनेत्रियाँ(माधुरी दीक्षित तथा जूही चावला) थी तो दूसरी ओर नित्य संघर्षरत नई त्रासदी साम्राज्ञी बनने जा रही अभिनेत्री (कंगना रानौत). एक ओर शीर्ष कलाकारों से अलंकृत फूहड़ संवादों वाली यथार्थ के करीब वाली काल्पनिक कहानी थी तो दूसरी ओर निम्न ही सही परन्तु अध्ययनरत कलाकार के परिश्रम का परिणाम. एक ओर वो फिल्म थी जिसके मुख्य कलाकार की पिछली फिल्म मेरे सर्वकालीन पसंदीदा फिल्मों में शुमार है तो दूसरी ओर के फिल्म के कलाकार की पिछली फिल्म को मैं जल्द से जल्द भूल जाना चाहता हूँ, रज्जो तथा कृष3. फिर ऐसा क्या था जो मुझे गुलाब गैंग की जगह क्वीन देखने को जी चाहा? उत्तर तय है, फिल्म का ट्रेलर, संगीत तथा निर्माण से जुड़े लोग; अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवाने, अन्वित्ता दत्त, अमित त्रिवेदी तथा विकास बहल जैसे लोगों का नाम जिस फिल्म से जुड़ा हो उसे यूँ ही तो नहीं जाने देना चाहिए. उस पर से कंगना रानौत की विलक्षण प्रतिभा को दर्शाता मनमोहक ट्रेलर.
अमित त्रिवेदी का संगीत तथा लभ जुनेजा की आवाज से अलंकृत गीत से फिल्म की शुरुआत तथा गीत के ठीक बाद आने वाले मोड़ और कहानी का नित्य बढ़ते रहना. फिल्म एक अद्भुत यात्रा है, मनुष्य का स्वयं में विश्वास तथा स्वयं के साथ सहवास का. साथ ही साथ यह एक कटाक्ष है, हमारे समाज पर जहां आज भी कहीं न कहीं मायेके की गुडिया बनाकर ही बेटियों को खुश कर दिया जाता है, जो कि फिल्म के एक गीत की पंक्तियाँ ज़ाहिर करती हैं, “बाबुल के अंगना में, अमवा के तले, मैहर की दुलारी नाजों से पले”. फिल्म की मुख्य पात्र ‘रानी’(कंगना) एक छोटे से कॉलेज से गृह विज्ञान पढ़ रही है, कॉलेज किस क्षेत्र में है यह भी वो ठीक ठीक नहीं जानती, पूछने पर वह पूरा पता बता देती है, परन्तु जगह नहीं बता पाती. किसी के इज़हार-ए-इश्क का उत्तर देना भी नहीं जानती, i love you का उत्तर वो धन्यवाद कह कर देती है. विदेश जाने पर अपना पता वो दिल्ली नहीं राजौरी बताती है. राजौरी गार्डन से उठकर पेरिस व अम्स्तेर्द्रेम का सफ़र मनमोहक व संघर्षपूर्ण है. एक लड़की जिसे शादी के २ दिन पहले लड़का केहता है, वो उससे शादी नहीं कर सकता, कारण नहीं बताता. कारण साफ़ है कि लड़की उसके ओहदे से मेल नहीं खाती. समाज भी तो दुष्ट है, भोलेपन को बेवकूफी समझ लेता है. विजय(राजकुमार) के संग अपने सपने सजा चुकी रानी, ये सुनते ही बिखर सी जाती है. परन्तु बहुत जल्द वो खुद को संभालती है व फिर शुरू होती है एक अद्भुत यात्रा. रानी परिवार से अनुमति लेकर निकल जाती है, अपने सपनों के शहर पेरिस के लिए, अपने हनीमून पर, अकेले.
अजनबी शहर, नए लोग, अनजान भाषा, अलग संस्कृति तथा चिंता व कुंठा. रानी परेशान हो जाती है. एक-एक सपनों को वो अपने सामने टूटते हुए देखती है. परन्तु परदेस में उसे किसी अपने की तलाश समाप्त होती है, जब उसकी मुलाकात होती है, विजय लक्ष्मी(लिसा) से. लक्ष्मी के साथ रानी की मित्रता उसे नए राह पर ले जाती है, जहां वो अपने लज्जा से मुक्त होती है, खुलने को दिल करता है, तो hindi गानों पर थिरकने को विवश हो जाती है, और फिर पूरे क्लब को नचा देती है. कभी शराब पीकर अपने दिल की व्यथा लोगों से कहती है. फिर उसका ये कहना कि हमारे यहाँ तो लड़कियों को डकार करना अलाव ही नहीं है, वहाँ पर तो बहुत कुछ अलाव नहीं है. यहाँ पर तो सब कुछ कर सकती हैं, झकझोरता है. और स्त्रिविमार्षकों के दिल में चिंगारी लगता है. कभी घर से अकेले भी नहीं निकलने वाली परदेस में 3 अजनबी विदेशी लड़कों के साथ एक ही कमरे में रहती है. एक जापान से है, एक रूस से तो एक फ्रांस से. चारों अम्स्तेर्द्रेम की गलियों को नापते हैं व अपने जिंदगी को खुशियों से भर लेना चाहते हैं. सभी की अपनी व्यथाएं हैं जो कहानी को बल प्रदान करता है, जापानी लड़के के हंसी के पीछे छुपी है, २०१२ में आये सुनामी में अपने मात-पिता को खोने का दर्द, तो ओलेक्जंदर की ख़ामोशी व गुमनाम कलाकारी के पीछे किसी क्रांति के निमंत्रण की चेष्टा है. सभी एक दुसरे की ख़ुशी में हँसते हैं, सभी छिपकली से डरते हैं, सभी एक दुसरे के लिए रोते हैं, भावनाओं की इस उतार चढाव के बीच हम अपने आप को उनके बीच पाते है. फिल्म को इतनी सुन्दरता से नियंत्रित किया गया है कि यह कागिन भी बनावटी नहीं लगती. गोलगप्पा खा कर मुंह जलना हो या मछली के आँख निकलने पर डरना और इफेल टावर से घबरा कर भागना, हर चीज यथार्थ के करीब ही लगती है. मानवीय मुस्कान के पीछे छुपे दर्द को ज़ाहिर करती दो लड़कियां जो रानी की जिंदगी में स्वतः ही आती हैं व उसके जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं. लक्ष्मी का खुलापन रानी को अटपटा अवश्य लगता है परन्तु वो उसे स्वीकार करती है, वहीँ हॉलैंड में रुखसार का एक सेक्सवर्कर के रूप में कार्य करना उसे पसंद नहीं हैं परन्तु उससे भी अपनापन जता जाती है. ये सब किरदार हमें सोंचने पर मजबूर करती हैं तो कुछ दृश्य हमें खिलखिलाने के लिए विवश कर देते हैं.
यह एक लाजवाब फिल्म है, भावनाओं के उतार चढाव को काफी कुशलता से निर्देशक ने सजाया है, जिससे ये फिल्म याद रखने लायक बन जाती है, साथ साथ चलने वाला अमित त्रिवेदी के संगीत का जादू. नज़र व कान दोनों ही हटाने को जी नहीं करता. कहानी, संगीत व निर्देशन से भी अधिक यदि यह फिल्म याद रखी जायेगी तो वो है, कंगना रानौत के शानदार अभिनय के लिए. कंगना ने रानी को परदे पर जीवंत कर दिया. कुछ कुछ दृश्यों में उनके चेहरे के भाव को इतनी सुन्दरता से बदलते देखा कि लगा मनो यह फिल्म कोई और नहीं कर सकता. चोर से भिड़ने का दृश्य हो या hindi गाने पर आँखों में आंसू आने के बावजूद झूम उठने को तैयार होना, इतनी ख़ूबसूरत अदायगी है कि शब्द नहीं है बयां कर पाने को. लिसा व राजकुमार भी अपने चरित्र को बखूबी निभाते हैं तथा विदेशी कलाकार भी अपने चरित्र के साथ इन्साफ करते हैं.
यह एक और इंग्लिश विन्ग्लिश है, शायद उससे अधिक सार्थक तथा नवीन. कुछ आधुनिकता से भरी व कुछ युवापन से जुडी. यहाँ अंतर्वस्त्र से खेल है, तो वहीँ विजयलक्ष्मी पर रानी के पिता व भाई की नज़र. कुछ दृश्य गुदगुदाते हैं, कुछ भावुक कर देते हैं, कुछ आँखें चुराने को भी मजबूर करते हैं खासकर पेरिस में लक्ष्मी व रानी के बीच के कुछ दृश्य. परन्तु यह सब कतई अश्लील नहीं लगता, फिल्म है फिल्म के प्रभाव में यह बहते चले जाते हैं. ऐसी और भी फिल्में बनेंगी और बनी भी है परन्तु इसे कतई भी किसी के साथ तुलना न किया जाये वरना इसकी मार्मिकता मर जाएगी और इसका दोष भी समाज पर ही आयेगा.
क्वीन आपके दिलों पे राज कर लेगी, देखने जरुर जाएँ.  

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

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इंसानियत के कंकाल तले
              
                                 -    अंकित झा

ज़िन्दगी महान बनने के कईं मौके देती है परन्तु मिसाल बनने के लिए सिर्फ एक. और ये मौका छीनना पड़ता है. मनुष्य अब केवल महान बनने की होड़ में लग गया है, मिसाल बनने की जिद्द अब कहीं पीछे छूट गयी है, जिसके पार जाना असंभव सा लगता है. खेल, मानव ज़िन्दगु का हिस्सा है. खेल परिश्रम से लेकर प्रतिज्ञा तथा मनोरथ से मुखरता सब कुछ सिखाता है. दिमागी कसरत हो या शारीरिक चपलता खेल के कुछ अभिन्न अंग हैं, साथ ही साथ खेल से जुड़ा होता है, सहनशीलता. सबसे महत्वपूर्ण व सबसे नाजुक. इसका दामन छूटने पर खिलाडी जीवन का दमन भी संभव है. परन्तु कईं बार ऐसे वाकये हो जाया करते हैं जब खेल भावना पर किस्सागोई भावना प्रबल हो जाती हैं व कब मनुष्य अपने कंकाल को पूजने लगता है पता ही नहीं चलता. खेल से देश की समृद्धि भले ही न जुडी हो परन्तु साख जुडी होती है, दुसरे देश के सामने घुटने टेकने का अर्थ क्या उस देश के समक्ष सर्वस्व समर्पण होता है, समझ में नहीं आता. खेल में नतीजे आते हैं, नतीजे या तो सुखद हो सकते हैं या दुखद परन्तु विध्वंशक तो कतई नहीं होते. फिर ऐसा क्या घट गया कि मेरठ के एक निजी विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों के जश्न पर इतनी बड़ी साहसिक पटकथा लिख दी गयी व नया वाद-विवाद शुरू हो गया. यह कतई नयी बात नहीं है कि भारत में क्रिकेट मैच का अर्थ क्या है व जब मुकाबला भारत व पाकिस्तान के मध्य हो तो उसका अर्थ क्या होता है. क्या ये शत्रुता खेल व खेल भावना से ऊपर हो जाती है. कैसी शत्रुता? ये कोई शत्रुता तो नही कि हम उनके मसाले खाते हैं, हमारे हर गोर चेहरे पर मुल्तानी मिटटी का प्रभाव है तो हर पाकिस्तानी चिकन मसाला में भारतीय प्याज. ये कैसा बैर है? ये सिर्फ वहम है कोई बैर नहीं. परन्तु कैसे खेल आर ये बैर भारी पड़ा इसका ताज़ा उदाहरण है, 2 मार्च को संपन्न हुए एशिया कप के भारत-पाकिस्तान मुकाबले के बाद का. मैच का अंतिम ओवर, जीत और हार के मध्य खड़े शाहिद अफरीदी. 2 लगातार छक्के और जीत भारत की झोली से फिसलकर पकिस्तान के आँचल में जा लिपटा. 27 वर्ष पुराना वाकया सबके ज़ेहन में उतर आया जब मियांदाद ने चेतन शर्मा को अंतिम गेंद पर छक्का जड़ा था. इस जीत के साथ ही भारत ख़िताब के दौर में पिछड़ गया. परन्तु एक ऐसी घटना घटी कि भारत मनुष्यता की कसौटी पर भी फिसल गया.
भारत की हार के पश्चात जहां देश भर में निराशा थी वहीँ कुछ कश्मीरी छात्र कथित तौर पर जश्न मनाने लगे. ये जश्न किस लिए मनाया गया, इसे जानने की चेष्टा किये बगैर ही सजा सुना दी गयी. यह जश्न भारत की हार पर था या पकिस्तान की जीत पर या फिर किसी तीसरे कारण से. प्रतिद्वंदिता में कोई न कोई पिछड़ता ही है, यह जग जाहिर है, इस पर जश्न कसा और मातम कैसी. परन्तु जब उल्लास उन्माद का रूप धारण कर ले, तो हालात बिगड़ना तय है. हुआ भी ऐसा ही. कुछ 65 कश्मीरी छात्रों को निलंबित कर दिया गया. हालात इतने बिगड़ गये कि यह राष्ट्री मुद्दा बन गया व अगले ही दिन कश्मीर के विधान सभा सत्र में इस पर विरोध प्रदर्शन भी हुए. हालात और बिगड़े तथा उन छात्रों के विरुद्ध एफ़आईआर दर्ज करवाई गयी तथा उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की गुहार की गयी है. यह मुद्दा कहाँ से कहाँ बढ़ता जा रहा है, इसे देख कर नयी बहस छिड़ रही है, एक गुट उनके समर्थन में आ खड़ा हुआ है तो कुछ लोग विश्वविद्यालय के कदम को सही बता रहे हैं.

मैं इस पर मौन रहना चाहता हूँ, कुछ भी कहना नहीं चाहता हूँ, इस नुद्दे पर कुछ कहने का अर्थ है कि या तो मैं समर्थन में हूँ या फिर विरोध में. ना ही मैं पाकिस्तान के विरोध में हूँ और न ही इस कृत्य के समर्थन में. कुछ भी कहने के लिए बाध्य नहीं होना चाहता हु. बस इतना पूछना चाहता हूँ कि पाकिस्तान से ही बैर क्यों, श्रीलंका और चीन हमारे लिए बड़ी समस्याएं पैदा करते रहे हैं. पाकिस्तान से ये सौतेला व्यवहार क्यों? अचरज की बात है कि इतने बड़े देश की ऊँगली एक ओर जा के थम जाती है. आफरीदी के छक्को का कोई मोल नहीं रह जाता, यदि भारतीय गेंदबाज को मारे गये हो परन्तु कैलिस का बिदाई शतक प्रशंसनीय लगता है, कारण समझ में नहीं आता. जब भारतीय खिलाडी ही फिक्सिंग में पकडे गये हो तो पाकिस्तानी खिलाडियों से परहेज क्यों? यह हमें रोग लग गया है नफरत और भेदभाव का. यह कुछ और नही बल्कि राष्ट्रिय भेदभाव है. सभी लफ्ज़ खामोश हो जाते हैं जब बात पाकिस्तान पर हो, ऐसा क्यों है. किसी अमन की आशा कि वकालत नही करता हूँ परन्तु ये भेदभाव पसंद नहीं है. ये बैर नहीं मनोरोग है, जो की लाइलाज़ है. कितनी ही मासूम जिंदगियां बेखता होने के बावजूद इस मनोरोग का शिकार हुई हैं. सरबजीत याद नहीं, इसी मनोरोग की भेंट चढ़ गया था. सत्य से सभी अनभिग्य हैं, व सत्य को मानव अपने कंकाल में छुपा के रखने लगा है. नग्न आंखों से इस सत्य को देख पाना असंभव है, इंसानियत का कंकाल ढूंढने की आवश्यकता है जिसके नीचे ये सत्य छिपा हुआ है कि गुनाह क्या था उन छात्रों का जो वो पढाई छोड़कर अपने घर लौट गये हैं व अपने सुरक्षा की भीख मांग रहे हैं.