शनिवार, 29 जनवरी 2022

Movie Essay

सृजन-संहार व इसके इर्द-गिर्द सब कुछ

- अंकित नवआशा
जीवन और मृत्यु। एक दर्शन है। सत्य है। अटल है। फिर भी कितना कुछ है इन दो घटनाओं के मध्य। जन्म है, पालन है और मृत्यु है। सृजन है, विध्वंस है और है इन दोनों के मध्य जीते जाना। जन्म मासूमियत है, जीते जाने का अर्थ है चालाकी, और मृत्यु है स्वयं पर विजय। इतनी गूढ़ दर्शन के साथ अगर कोई फिल्म बने तो सोचिए कितनी उबाऊ बन सकती है, लेकिन जब पहले 5 मिनट में पुलिस स्टेशन में हरि और शिवा एक दुर्घटना के बारे में बताते हैं जिसमें पुलिस वाले को किसी ने मारा है और जाते-जाते जब कैमरा स्लो मोशन में दरवाजे से बाहर जाकर सीढ़ी के पास अपनी लुंगी को कमर में बांधते शिवा के पांव पर जा कर रुकती है, जिसमें उसने पुलिस का ही जूता पहना है, तब समझ आता है यह कोई आम फिल्म नहीं बनी है। यह फिल्म अपने साथ एक नया जॉनर ले कर आई है, इस फिल्म ने फिर से गैंगस्टर थ्रिलर को परिभाषित किया है।
दो गैंगस्टर। एक हत्या के समय उन्माद के चरम पर होता है और हत्या के ठीक बाद क्रिकेट खेल रहा होता है। दूसरा अपने उन्माद तक पहुंचने में भी हत्या नहीं करता है, और अगर करता है तो फिर ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत हो स्वयम को पवित्र करता है। दोनों दोस्त हैं,दोस्त से बढ़ कर हैं और शायद एक दूसरे के प्रेमी भी। प्रेम शायद स्नेहरूपी। मित्रता शायद प्रेमरूपी। इसलिए कहानी के बढ़ते बढ़ते हम दोनों को अगाढ़ होते हुए भी देखते हैं तो धोखे पर दोनों के मध्य प्रेम के समाप्त होने जैसी प्रतिक्रिया ही निकलती है। शिवा और हरि। हरि की माँ है। शिव का कोई नहीं। उसकी उत्पत्ति स्वतः हुई, एक दिन अचानक वह हरि और उसकी माँ को कुएं में एक बोरे में मिला, गला कटा हुआ। मतलब उसकी उत्पत्ति स्वयं से हुई। हरि की माँ ने उसे अपना लिया। उसे बच्चे चिढ़ाते, मारते, बड़े उस पर ज़ुल्म करते। उस पर चोट का असर होता पर वह जवाब नहीं देता। किसी घोर तपस्या में लीन हो जैसे शिवा। स्वयं को ले कर उसे कोई चिंता न हो,लेकिन उससे जुड़े लोगों को लेकर भावुक। हरि कोई यदि कोई डराने की भी कोशिश करे तो शिव "तांडव" को आतुर है, उन्माद में विध्वंस की परिपाटी रच सकता है। दूसरी ओर हरि भी, शिव के उन्माद में अपना प्रेम ढूंढता है। आगे बढ़ने की लालसा है,चालाक है। शिव को वस्त्र और आभूषण से कोई लगाव नहीं, हरि आभूषण धारण किये हुए रहता है। तीसरा भी है। ब्रह्मैय्या। विवश। लाचार। ओहदा बड़ा लेकिन कमजोर। अकेला। पुलिस में सब इंस्पेक्टर। एक नए शहर में दिन भर मिल रही धमकियां। किसी के नज़र में कोई खास इज़्ज़त नहीं। और यहीं से शुरू होता है उसका अपना संघर्ष। सम्मान पाने का। फिल्म के अंत ने वह सम्मान अर्जित करता है, और उसी विधायक को चपत जड़ देता है जिसने कभी उसे डरपोक कहा था। यह था उसका स्वयं पर विजय। मृत्यु।
फिल्म में सबसे महत्वपूर्ण है, शहर। यह फिल्म शहर की आत्मा को जीवंत करने वाली कहानियों के कतार में खड़ी होती है। जैसे सत्या, गैंग्स ऑफ वासेपुर, आदुकालम, वाडा चेन्नई, अंगमालि डायरिज आदि। मंगलादेवी इस फिल्म में एक किरदार है। सबसे महत्वपूर्ण किरदार। गलियां, सड़कें, जंगल, समंदर, नदी। सब कुछ कहानी का हिस्सा है। यहां के त्यौहार, आयोजन, खेल, सब कुछ; एक किरदार। और इसी शहर में है हत्या के बाद लाश के चप्पल-जूते निकाल लेने वाला शिव, शिव के माध्यम से सीढ़ी चढ़ता हरि और अपनी नई पोस्टिंग पर अकेलेपन और लाचारी में रोता पुलिस वाला ब्रह्मैय्या। गैंगस्टर फिल्मों में पुलिस वालों का खास महत्व होता है। यहां भी है। कहानी का सूत्रधार तो पुलिस वाला ही है, लेकिन वह असहाय है, अपनी असहायता को छिपा कर नहीं रखता, वह व्यक्त करता है। वह विधायक से जा कर स्वयं को ट्रांसफर करने की बात करता है, उसके थप्पड़ खाता है, जलील हो कर नज़रें चुराता है, फूट फूट कर अकेली में रोता है। लेकिन लड़ता है। दो खूंखार गैंगस्टर का अंत लिखता है, सोचता है, करता है।
यह एके असाधारण फिल्म है। आम सी कहानी लेकिन हिन्दू मिथकों से निकले आयाम और कहानी के घटनाक्रम इसे अभूतपूर्व बनाते हैं। बड़ी बात यह कि फिल्म से ज्यादा फिल्म में प्रस्तुत किये गए मिथक से जन्मे समानताओं पर चर्चा की जाएगी, फॉर्मूला तोड़ने की बात की जाएगी, फिल्म में महिलाओं की अनुपस्थिति पर बात की जाएगी, एक उन्मादी हत्यारे से सहानुभूति की बात की जाएगी, अधूरे रह गए अंत और बीच बीच में रीढ़ कंपा देने वाले डर की बात की जाएगी। पिछले 10 सालों में लगभग भारत की सभी मुख्य भाषाओं में बननेवाली फिल्मों में एक अच्छी गैंगस्टर थ्रिलर फिल्म जुड़ गई है; हिंदी में गैंग्स ऑफ वासेपुर, तमिल में वाडा चेन्नई, मानग्रामम, मलयालम में अंगमालि डायरिज, तेलुगु में प्रस्थानम, मराठी में मुलशी पैटर्न, बांग्ला में बाईशे स्राबोन और अब कन्नड़ में गरुड़ गमन वृषभ वाहन। इस ऐतिहासिक फिल्म का लुत्फ जरूर लेना चाहिए।

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

परिवर्तन से परे

गेंदबाज़ कप्तान में क्या समस्या है? 

- अंकित नवआशा

 रामचंद्र गुहा अपने किताब "A Corner of the Foreign Field" में लिखते हैं कि क्रिकेट का खेल गेंदबाजों के प्रति हमेशा से नाइंसाफी करता आया है। जब भारत अंतरराष्ट्रीय खेल नहीं खेलता था उस समय बॉम्बे में "Quadrangular series" काफी महत्वपूर्ण मन जाता था जिसमें "अंग्रेज़, हिन्दू, मुस्लिम व पारसी" टीम खेला करती थीं।

उस समय हिन्दू की टीम के सबसे जबरदस्त खिलाड़ी थे "पालवांकर बालू"। पालवांकर बालू का भारतीय सामाजिक आन्दोलनं में योगदान पर कभी बाद में। बालू दलित थे और स्पिन गेंदबाजी करते थे। अपने टीम के वो बेहतरीन खिलाड़ी थे और कहा जाता है कि यदि उस समय भारत अंतरराष्ट्रीय खेलता तो बालू भारत के पहले क्रिकेट सुपरस्टार होते। लेकिन बालू कभी हिन्दू टीम के कप्तान नहीं बन पाए। एक कारण था कि हिन्दू टीम की कप्तानी एक दलित नहीं कर सकता और दूसरा आधिकारिक कारण बताया गया कि वह एक गेंदबाज हैं और उन्हें गेंदबाजी पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। और अब 100 साल के बाद भी हम वहीं हैं। गेंदबाज कप्तान कैसे बने।
ऑस्ट्रेलिया ने जब विश्व के नम्बर एक गेंदबाज पैट कमिन्स को कप्तान बनाया तो यही सवाल उठे। अगर अनुभवी होना एक पैमाना है तो क्रिकेट में बल्लेबाज़ क्या और गेंदबाज क्या? लसिथ मलिंगा ने कप्तान रहते हुए श्रीलंका को T20 विश्व कप जितवाया लेकिन जब भी श्रीलंका के महान कप्तानों की सूची बनेगी तो मलिंगा का कितना नाम लिया जाएगा? स्टुअर्ट ब्रॉड ने इंग्लैंड के लिए बेहतरीब कप्तानी की। पाकिस्तान के सबसे सफल कप्तान उसके तीन तेज़ गेंदबाज रहे हैं। भारत के बेहतरीन कप्तान कपिल देव अपने दौर के सबसे सफल गेंदबाज रहे। अभी भी केशव महाराज दक्षिण अफ्रीका के लिए क्विन्टन डि कॉक व टेम्बा बावुमा से अच्छे कप्तान साबित हुए हैं, न्यूज़ीलैंड के लिए भी केन विलियमसन के ना होने पर टिम साउथी टॉम लैथम से बेहतर कप्तान होते हैं और पाकिस्तान में भी बाबर आज़म के बाद शादाब खान को ही कप्तान के रूप में देखा जाता है।
फिर ऐसा क्यों?
आज जब पहले रोहित शर्मा और फिर के एल राहुल को भारतीय टेस्ट टीम का उप कप्तान बनाया गया, मुझे आर अश्विन को दरकिनार किया जाना खलता है। आर अश्विन रोहित शर्मा और राहुल दोनों से ज्यादा अनुभवी हैं और इस समय सबसे चपल खिलाड़ियों में गिने जाते है । लेकिन गेंदबाज हैं। 2000 के बाद भारत ने सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, अनिल कुंबले, महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली के रूप में पूर्णकालिक कप्तान देखे। और इस बीच वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, सुरेश रैना, अजिंक्य रहाणे, और शिखर धवन स्टैंड इन कप्तान रहें। नतीजे भी अच्छे बुरे रहें। लेकिन इस दौरान हरभजन सिंह, ज़हीर खान, अश्विन, और भुवनेश्वर कुमार टीम में महत्वपूर्ण खिलाड़ी थे लेकिन उन्हें तरजीह नहीं मिली। ज़हीर खान आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स के कप्तान बने और उनकी बेहतरीन कप्तानी देखने को मिली और सबसे युवा टीम जिसमें श्रेयस अय्यर, ऋषभ पंत, करुण नायर जैसे खिलाड़ियों को उन्होंने जिस तरह संभाला शानदार था। वहीं हरभजन सिंह की कप्तानी में मुम्बई इंडियंस ने चैंपियंस लीग जीता। लेकिन देश के लिए कप्तान नहीं बन सके। क्यों? गेंदबाज थे। अनिल कुंबले जब कप्तान बने तो भारत ने ऑस्ट्रेलिया में पर्थ में इतिहास रचा, सिडनी में संभाला और बहुत कुछ हो सकता था।
ख़ैर, हवाला उम्र का दिया जाएगा, खिलाड़ी को खेल के आधार पर आंका जाए, उम्र के हिसाब से नहीं। अश्विन में अभी भी रोहित शर्मा से अधिक क्रिकेट बचा है।

सोमवार, 13 सितंबर 2021

परिवर्तन से परे

डायरी से 

- अंकित नवआशा 

यह मेरे परसो रात के नोट्स हैं जो मैंने अपने चचेरे भाई की मृत्यु हो जाने और अस्पताल द्वारा उनके शव को ना सौंपे जाने के बाद लिखा था। दो दिन से मन बेचैन था। आज समय मिला आपसे साझा करने का:

बहुत अजीब रात है। मैंने इससे पहले ऐसी रात नहीं काटी। अस्पताल में किसी के लाश की प्रतीक्षा में। किसी नहीं एक बड़े भाई की लाश। चचेरे बड़े भाई। जिनसे बचपन में पढ़े भी हैं, और जवानी में बहसें भी की हैं। लाश नहीं मृत शरीर। क्या शब्द दें, छोड़िए। वैचारिक रूप से इनसे बहुत मतभेद रहे, इतने कि एक समय उन्हें सोशल मीडिया से ब्लॉक और अनफ़्रेंड करना पड़ा। लेकिन मृत्यु सभी दायरे भर देती है, सभी वैचारिक मतभेद मिटा देती है। जिनकी मृत्यु हुई है वह तीन बच्चों के पिता थे: दो बेटियां और एक बेटा। तीनों ही अभी नाबालिग़। दो तो अभी हाई स्कूल भी नहीं पहुँचे हैं। दुखद क्षण है।
जब शाम को ख़बर मिली तो अस्पताल के लिए निकल पड़ा। यह सोचे बिना कि क्या होगा, कैसे होगा। क्या करना पड़ता है, कुछ खबर नहीं। कुछ महीनों पहले यह हालत ना जाने कितनों की हुई थी पूरे देश में। यह अस्पताल वाली हालत। मृत्यु करीब 3 बजे हुई, मैं अस्पताल 7 बजे करीब पहुँचा। ग़ाज़ियाबाद में यशोदा अस्पताल। भीगते, पानी से लबालब सड़कों से होते हुए। फिर जब अस्पताल आया तो मालूम हुआ कि मामला बहुत बुरी जगह आ कर फंस गया है। 5 दिन से भर्ती भैया के मृत्यु के बाद उनके शरीर को अस्पताल से वापस लेने के लिए बहुत बड़ी कीमत वाला बिल चुकाना पड़ेगा। शायद बहुत बड़े वर्ग को यह बहुत ज्यादा ना लगे पर हम जैसे निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह बहुत ज्यादा है। करीब 3 लाख रु का बिल। चुकाओ और शरीर ले जाओ। हमारे पास पैसे नहीं हैं। अस्पताल में भैया खुद भर्ती हुए थे, अपने सहकर्मियों के कहने और विश्वास पर। साथ ही ESIC के दम पर जिन पर उनका पूरा अधिकार था। और विश्वास कि जितना होगा पूरा खर्च उनके नियोक्ता व सहकर्मी उठाएंगे। लेकिन बिल की रकम सुनते ही बातें घूमने लगीं। अस्पताल में हमने चक्कर लगाने शुरू किए। मोबाइल में जिन दोस्तों का नम्बर था सब को फ़ोन किया। सब ने रास्ते सुझाये, कुछ ने सामने से बढ़कर प्रयास भी किये। प्रयास के छुटपुट नतीजे भी आएं लेकिन दिक्कत वही कि पैसे तो देने होंगे, उतने नहीं तो थोड़ी सी छूट के बाद जो बने वह। जो बहुत बड़ी रकमजुटाने की हम नहीं सोच पा रहे थे हम अब थोड़े छूट के बाद कि बड़ी रकम कैसे चुका पाएंगे भला। अस्पताल वाले कह रहे कि उनकी क्या गलती है। हम कह रहे तो क्या मरने वाले कि गलती है जिसे विश्वास पर इस अस्पताल भेजा गया? गलती। उफ़्फ़ मृत्यु के बाद यह तय करें कि गलती किसकी है। गलती से पहले गलत देखते हैं। शव "मुर्दा गृह" में है। वह शव जो कुछ घण्टों पहले तक पाँच लोगों के परिवार के इकलौते आस थे, वह मुर्दाघर में थे, निष्क्रिय व निश्चिन्त। मुर्दाघर के बाहर अस्पताल में उनकी पत्नी, उनकी बहन-बहनोई और मैं चचेरा भाई, यह सोच रहे अब क्या होगा। बहनोई की आँखें आँसू छुपा छुपा कर लाल हो चली हैं। पत्नी और बहन के आँसू सूख चुके हैं और सिसकियां बची हैं, रह रह कर वह फफक पड़ती है। अंधेरे में सना अस्पताल का रिसेप्शन क्षेत्र कराह उठता है, बाकी मरीज़ो के परिजन भी व्याकुल हो उठते हैं। क्या किया जाए। क्या यह सब गलत नहीं है? एक परिवार को उनके मृत सदस्य का शव ना सौंपना क्योंकि उनके पास पैसे नहीं है, गलत नहीं है? बच्चों से उनके पिता के शव को घंटों तक दूर रखना, गलत नहीं है? इतने पैसों की व्यवस्था सिर्फ लाश लेने के लिए फिर अंत्येष्टि, क्रियाकर्म, व श्राद्ध में होने वाले खर्चों का क्या। क्या सब गलत नहीं है? पैसा बहुत ज्यादा है। हम लोगों के लिए असंभव के करीब। हज़ारों हज़ार खर्च होते हैं दाह संस्कार और उसके बाद होने वाले क्रियाकर्म में। उसके पैसे कहाँ से आएंगे?
यह सब सोचते हुए लिखना भारी हो रहा है। यह मृत्यु का अनादर है। लोग कहते हैं, मरने के बाद का किसने देखा है? देखना चाहिए। मर जाने वालों को देखना चाहिए कि क्या होता है उनके बाद। एक-एक कर जब निजी अस्पताल पैसे गिनवाने में लगते हैं वह देखना चाहिए। बिल में 2.40 लाख करीब की फार्मेसी है, मतलब दवा और इंजेक्शन। कौन सी इतनी महंगी फार्मेसी थी जो एक गरीब की ज़िंदगी ना बचा पाई। अभाव में आत्महत्या कर लेने वाले, किसी अपराध में मार दिए जाने वाले, किसी छोटी सी घटना में भीड़ द्वारा मार दिए जाने वाले, मानसिक तनाव से खुद को मिटा देने वाले लोगों के बारे में सोचा जाना चाहिए कि उनके बाद क्या? अस्पताल में चल रहे इलाज़ के दौरान सोचा जाना चाहिए कि इसके बाद क्या? उन मित्रों को सोचना चाहिए कि उनसे मांगी गई मदद के बदले 'ये करते न' से कुछ नहीं सुधरेगा। इस मृत्यु ने मेरे कई मिथक ध्वस्त किये हैं। सबसे बड़ी तो यह कि ज़िन्दगी अनमोल हो सकती है लेकिन मृत्यु बहुत महंगी है। बाकी कल सुबह क्या होता है, देखा जाएगा।

मंगलवार, 13 जुलाई 2021

आइए समझते हैं

जनसंख्या नियंत्रण क़ानून सिर्फ़ क़ानून नहीं बल्कि नफ़रत से जन्म हथियार है

- अंकित नवआशा 


आप में से बहुत लोगों ने यह खबर साझा होते हुए देखा होगा कि गोरखपुर से भाजपा सांसद रवि किशन जनसंख्या नियंत्रण पर एक प्राइवेट मेंबर बिल (विधेयक) पेश करने जा रहे हैं। अब बिल पेश करना एक सांसद का काम है और यह उन्हें जरूर करना चाहिए। जानकारी के बता दूं कि संसद के दोनों सदनों में कुल दो तरह से बिल पेश होते हैं एक सरकार द्वारा (सम्बंधित मंत्रालय द्वारा) और दूसरा सांसद द्वारा प्राइवेट मेंबर बिल। और यह सभी बिल जो चार प्रकार के हो सकते हैं: ऑर्डिनरी बिल, मनी बिल, फाइनेंस बिल व संविधान संशोधन बिल। हालांकि एक पांचवा प्रकार भी होता है वह है ऑर्डिनेन्स रिप्लेसमेंट बिल।
आज बात प्राइवेट मेम्बर बिल की। मुझे समझ नहीं आता कि रवि किशन का बिल पेश करना इतनी बड़ी खबर क्यों है? इसलिए कि वह एक राजनैतिक मुद्दे को बिल के रूप में लोकसभा में पेश करेंगे जिसकी एक झलक नीति के रूप में उत्तर प्रदेश में पहले ही पेश की जा चुकी है? क्योंकि प्राइवेट मेंबर बिल का जो ऐतिहासिक रूप से हश्र हुआ है वह दयनीय ही कह सकते हैं। चलिए आपको आँकड़ों से समझाता हूँ।
2014 से 2021 के बीच दोनों सदनों को मिलाकर कुल 1585 प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया गए हैं जिसमें लोकसभा में 1263 और राज्यसभा में 322 बिल शामिल हैं। सबसे ज्यादा सन 2016 में 343 बिल पेश हुए तो वहीं 2015 में 341 बिल। 2020 के दो सत्रों में सिर्फ 12 बिल पेश हो पाए। इन 1585 में से सिर्फ 1 बिल पारित हो पाया वह भी राज्यसभा में। ट्रासंजेंडर समुदाय के अधिकारों को सुरक्षित करने वाला विधेयक। लोकसभा में पेश किए जाने से पहले ही इसपर तत्कालीन सामाजिक न्याय मंत्रालय ने लोकसभा में एक सरकार की ओर से बिल पेश कर दिया। लोकसभा द्वारा इसे पारित भी किया गया लेकिन आगे चल कर इसका कुछ भी नहीं हुआ और यह लैप्स हो गया। इसके अलावा इन 7 सालों में 1584 विधेयकों का भी कुछ नहीं हुआ। इनमें से 15 तो सांसदों ने स्वयं ही वापस ले लिए, 82 अभी तक लंबित हैं, और 1284 खुद ही लैप्स कर गए।
यह भी समझने वाली बात है कि यूपीए के 10 वर्षों के कार्यकाल में 2004 से 2014 के बीच 1264 प्राइवेट मेंबर बिल पेश किए गए थे और उस में से भी एक भी बिल कानून नहीं बन पाया था। इसी तरह 1998 से 2003 के बीच 652 बिल पेश हुए लेकिन एक भी कानून बनना तो दूर सदन से पारित भी नहीं हुआ। मतलब पिछली पांच सदनों में 1998 से 2021 के बीच 3500 से अधिक प्राइवेट मेंबर बिल पेश हुए पर एक भी कानून नहीं बन पाए। इसके विपरीत इस दौरान सरकार ने दोनों सदनों में कुल 1436 बिल पेश किए और उसमें 984 विधेयक कानून बन चुके हैं। सीधा आँकड़ा कि सरकार द्वारा पेश किये गए विधेयकों में करीब 70% विधेयक कानून बन गए वहीं सांसदों द्वारा पेश किए गए 3500 से अधिक बिल्स में से सिर्फ 2 मतलब 0.01% पारित हुए और कानून तो एक भी नहीं।
फिर एक प्राइवेट मेंबर बिल पर इतना हो हल्ला क्यों? क्या प्राइवेट मेंबर बिल्स के प्रति सदन का रुख बदलने वाला है? या फिर सरकार नहीं चाहती कि यह जनसंख्या नियंत्रण विधेयक वह पेश करे, वह अपने सांसदों से ऐसे विधेयक पारित करवाना चाहती है। अगर इस प्राइवेट मेंबर बिल पर सदन कोई सक्रिय भूमिका निभाती है तो यह निष्कर्ष निकाला जाए कि यह सरकार का ही एक विधेयक है जिसे एक सांसद पेश कर रहा है, ख़ैर इस विधेयक के अंदर का विषयवस्तु देखना होगा कि चार बच्चों (3 बेटियां व एक बेटा) के पिता जनसंख्या नियंत्रण पर कहना क्या चाहते हैं।
एक प्राइवेट मेंबर बिल पर जब हो हल्ला होने लगे तो समझिए कि वह प्राइवेट मेंबर बिल मात्र नहीं है वरना इससे कई ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दों पर बिल्स पेश हुए हैं और उनका कुछ नहीं हुआ।

रविवार, 20 जून 2021

Movie Essay

"शब्द, शब्द के अर्थ, व अर्थ की परतों में छिपी है शेरनी की ताकत"

- अंकित नवआशा


"अगर 10 में से 6 लोग ये मानते हैं कि हत्या टाइगर ने की है तो हत्या टाइगर ने की है, लोगों की भावनाओं से बढ़कर आपके सबूत नहीं हैं"।
फ़िल्म शेरनी में यह संवाद तब आता है जब जंगल में एक शेरनी को ढूंढ़ने की जद्दोजहद है, क्योंकि वह मवेशियों के साथ अब इंसानों को भी मारने लगी है। वन मंडल अधिकारी विद्या विंसेंट व उनके दल कहते हैं कि अंतिम हत्या शेरनी ने नहीं बल्कि भालू ने की है, और जंगल में भालू भी है हम यह फ़िल्म के पहले 10 मिनट में ही देख लेते हैं। लेकिन अधिकांश लोगों को लगता है कि हत्या शेरनी ने की है, जबकि सच है कि हत्या भालू ने की है।
हम आज कल इसी "लगता है" और "सच ये है" की दौर से गुजर रहे हैं। अधिकांश को लगने वाले को ही सच बना कर परोसा जा रहा है ताकि हम दूसरे मामलों में न उलझ कर अपना एक दुश्मन एक लक्ष्य बना कर चलते रहे। फिर नतीजा जो भी हो। आप इस पर कई उदाहरण देख सकते हैं कि लोगों को क्या लगता है और सबूत क्या है में किसी तवज्जो मिली है। शेरनी भी यही है। सबूत है कि यह एक बेहतरीन फ़िल्म है, कहानी-पटकथा-संवाद-पार्श्व संगीत-अभिनय-निर्देशन-छायाचित्र सब कुछ बेहतरीन है लेकिन लोगों को लगता है कि यह फ़िल्म नहीं डॉक्यूमेंट्री है। तो लोग इसे निरा बकवास, उबाऊ डॉक्यूमेंट्री मानेंगे, लेकिन सच यह है कि यह फ़िल्म धीरे-धीरे चढ़ने वाले नशे की तरह है। जब आप पहली बार देखेंगे तो कहानी समझेंगे, दूसरी बार में संवाद और तीसरी बार मे मूल। अब नशे के लिए तीन बार देखना तो बनता है।
निर्देशक हैं अमित मसूरकर। इससे पहले सुलेमानी कीड़ा और न्यूटन बना चुके हैं। दोनों कमाल। न्यूटन कमाल से आगे की श्रेणी में है। न्यूटन व शेरनी में कई चीज़े समान हैं। जंगल, एक सरकारी अधिकारी, जंगल के लोग, चुनाव, सरकारी प्रक्रिया, और कुछ अनुभवी धुरंधर। लेकिन इन्हीं समानताओं में कूट कूट कर असमानताएं भी छिपी हैं जैसे न्यूटन में जंगल में रह रहे लोग अन्य युग के लोग थे, इस बार उनके पास मोबाइल है, कॉलेज जाने के सपने हैं, गाड़ी है और सबसे जरूरी सरकारी अधिकारियों के प्रति आक्रोश है। समान लेकिन असमान। मतलब जंगल में भी कई कहानियां हैं; जंगल में फंसने, भूत व डकैतों के परे। शेरनी जंगल के अंतस में छिपी सबसे जरूरी कहानी है। क्योंकि यह कहानी दो प्रजातियों के द्वंद्व के बारे में हैं। इंसान व जानवर।
इंसान को लगता जंगल उसका। जंगल को लगे जानवर उसके। जानवर को क्या लगे हम कैसे बताएं। यही मामला है पूरा। हम अपने हिस्से का भी सोच लेते हैं और जानवरों के हिस्से का भी। जैसे अमीर लोग गरीब के हिस्से का भी सोच लेते हैं, आदमी लोग औरत के हिस्से का भी और बड़े लोग बच्चो के हिस्से का भी। यह किसी और के हिस्से जा सोचना भी बड़ी दिक्कत वाली बात है, सब दिक्कत यहीं से आती है। मुझे शेरनी अद्भुत फ़िल्म लगी। कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि फ़िल्म का नाम शेरनी क्यों है जबकि हिंदी में बाघिन होता है। मेरे ख्याल से शेरनी से आशय भारतीय वन सेवा से निकली वन मंडल अधिकारी विद्या विंसेंट से है। क्योंकि शेरनी जंगल मे शेरों के बीच भी अपना वजूद बना कर रखती है। शेर के लिए भी शिकार वह खुद करती है जैसे फ़िल्म में अपने पति पवन की मंडी की मारी बिजनेस के बावजूद विद्या घर के लिये रोटी कमाती है। "यह मुझे लगता है, सच पता नहीं"।
जरूरी यह भी कि फ़िल्म का इस समय आना बहुत जरूरी था। बक्सवाहा में 2 लाख पेड़ काटने वाले हैं हीरे के लिए, मुम्बई में मैंग्रोव काट रहे कोस्टल रोड के लिए, नियमगिरि तो खत्म कर दी, उत्तराखंड में हिमालय काट रहे चार धाम यात्रा वाले एक्सप्रेस वे के लिए, गोआ में कोयला खदान के लिए पेड़ काटने को तैयार थे, मुम्बई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन में 50000 से अधिक पेड़ काटे जाने हैं और ना जाने कितनी ही जगह शेर, बाघ, हाथी, घड़ियाल, पक्षियों के पर्यावास के जंगल काट कर वहां तीर्थ स्थल, घूमने की जगह, आश्रम, कार्यालय, खदान, कारखाने, व बाँध इत्यादि बना दिये गए। और बदले में सी एस आर का लॉलीपॉप दे कर वहां के कुछ लोगों के लिये स्कूल खोल दिये, उनका संसाधन छीन कर उन्हें स्वयम पर आश्रित कर खाना खिला दिया और शौचालय के दीवार रंग दिए। हो गयी महानता। शेरनी में जंगल के बीच कॉपर के लिए खुदे खदान को देख कर सवाल जरूर पूछियेगा कि अगर शेरनी उस खदान में गिर गयी तो किसकी गलती होगी, रास्ते मे अगर वह किसी मनुष्य से टकराई तो किसकी गलती होगी।
फ़िल्म की तकनीक के बारे में बार बार बात की जा सकती है और अभिनय के तो क्या कहने। विद्या बालन पिछले दो दशक की हिंदी फिल्मों की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री हैं और इसमें कोई किंतु परन्तु की गुंजाइश नहीं। और बाकी कलाकार भी कमाल के हैं। उस पर बड़े बड़े धुरंधर लिख चुके हैं। लेकिन मैं फिल्मों के टेक्स्ट को पढ़ता हूँ, उसके लेखन को। वह भी जो वह कहना चाहती है, वह भी जो कह नहीं रही लेकिन कह दिया गया। 2018 में आई स्त्री के बाद यह दूसरी ऐसी फिल्म है जिसमें एक संवाद के कई मतलब है। सब अपने अपने हिस्से से उसका वर्णन करें। और इसीलिए मुझे फ़िल्म की लेखन जबरदस्त लगी। जब एक संवाद के कई मतलब होते हैं तब लेखक पात्र से अपने हिस्से की बात भी कहलवाता है।
चलिए, इस वाले में इतना ही। आप भी फ़िल्म देखिए। प्राइम पर है। थोड़ा खर्च कीजिये।
और जाते जाते फ़िल्म का यह गीत जरूर सुनियेगा जिसे लिखा है हुसैन हैदरी ने व संगीत है बैंडिश प्रोजेक्ट का। इस गीत के बोल (आप अपना मतलब जरूर निकाले इसका) ये हैं:
खिंची जो रोटी बीच बाज़ार
लड़ी दो बिल्लियां पंजे मार
तो आया बन्दर एक होशियार
वो बोला क्यो लड़ते हो यार
ये झगड़ा मैं सुलझाऊंगा
हल सुझाऊंगा
रोटी बांट करके
उठा तराजू
वो रोटियां बन्दर मज़े से कहा गया
बिल्लियां देखती ही रह गयीं
और वह दिनदहाड़े छल गयीं
बात यह चुटकुला ही बन गयी
कि खा गया रोटी उनकी बन्दर।
ईंट किसी की
माटी किसी की
और किसी का रोड़ा
भानुमति ने नाम से अपने
आकर कुनबा अपना जोड़ा
बंदरबांट का खेला
खेले में हैं झमेले बड़े।
हूक निकल जाए सारी
लेने के फिर देने पड़े,
नींद में होवे हजामत
उठे तो फिर तोते उड़े।
छली गयी बिल्लियां बीच बाज़ार तो
बोली हुआ है अत्याचार
लगाई जंगल मे गुहार
तो सबके अलग अलग उपचार
भेड़ बोले ये तो होत है
भोलेभाले को खा ही जात हैं सब,
भालू बोला कोई बात नहीं,
पेड़ पे चढ़ कर शहद खा लो अब,
सियार ने कथा सुनी और
हुआ हुआ करके ही रह गया
साँप ने फ़न उठाएं और
दोष बिल्लियों के ऊपर ही मढ़ दिया।
बिल्लियां देख के जान गई
बात मान गयी रे
कथा का सार हो न हो
बात तय रही कि
खा गया रोटी उनकी बन्दर
खा गया रोटी उनकी बन्दर।
बातें हवाई बनके बवंडर
धूल जो जग में उड़ावे
सच्ची कथा और झूठी कथा में
फर्क नहीं रह जावे।
बंदरबांट का खेला
खेले में हैं झमेले बड़े।।

बुधवार, 2 जून 2021

व्यंग्य में उमंग

चमगादड़

- अंकित नवआशा
मैंने टीवी में किसी चैनल पर
सिर के बल खड़े चमगादड़ को भी देखा है
बिल्कुल उल्टा।
वह रह रह कर
नई नई तरंगे छोड़ देता है,
उसको देख, उसके ही जैसे
हज़ारों इंसान भी चमगादड़ बने खड़े हैं
सिर के बल, उल्टा।
जैसे चमगादड़ों को दिखता-सुनता नहीं
सिर्फ तरंगे पकड़ते हैं
वैसे ही ये भीड़ सामने हो या
टीवी के इस पार
तरंगों को ही पकड़ती है,
देखने और सुनने की
ज़हमत नहीं उठाती।।

रविवार, 23 मई 2021

व्यंग्य में उमंग

बंदर हँसते हैं 

- अंकित नवआशा 

बरसात आयी,
गरीब कौवे का घोसला उड़ गया,
बन्दर हंसते रहे,
उड़ते घोसलों की ताल पर,
मोर थिरकते रहे
बन्दर हंसते रहे
मुर्गे सुबह आके
बांग की जगह
गाली बकते
बंदर हंसते रहे,
बिल्ले दूध पीने में
मुंह जला बैठे
बन्दर हंसते रहे,
बिल्ले के मुंह जलने पर
चूहे नाचने लगे
बन्दर हंसते रहे,
शेर आया,
शेर फिसल गया,
फिसल के सर फुड़वा बैठा,
लोमड़ी ने ताली पीट कहा
पहले राजा हैं
जिन्होंने सर फुड़वाई देशहित में
बन्दर हंसते रहे
वहां से निकलते ही,
लोमड़ी के चिथड़े हो गए
बन्दर हंसते रहे।
चिथड़े के पास
आकर शेर बोला
बहुत दुख है पर
देशहित में करना पड़ा,
बन्दर हंसते रहे।।

सोमवार, 15 जून 2020

परिवर्तन से परे

 सिर्फ़ अभिनेता नहीं था, सपनों के सच होने की आशा था सुशांत

- अंकित नवआशा

#सुशांत की मृत्यु हो गयी। कैसे हुई, ये उन्हें पता लगाने दीजिए जिनका काम है। अब ये हुआ है कि सारे अभिनेता, अभिनेत्री, निर्माता, निर्देशक, क्रिकेटर उनसे जुड़ी अपनी अपनी यादें तस्वीरों के जरिये साझा कर रहे हैं। लेकिन हम प्रशंसकों के हिस्से तो ऐसी कोई यादें नहीं होती। इसलिए हमारे जिससे प्रशंसा होती है, निराशा होती है और होती है बहुत सारी अधूरे छूट चुके अरमान। सुशांत मेरे लिए आगे बढ़ने की आशा थी, उसकी फिल्में हो सकता है फ़िल्म जगत की सर्वश्रेष्ठ ना हो, हो सकता है वो सर्वश्रेष्ठ अभिनेता ना हो लेकिन उसकी प्रतिभा, लगन और विश्वास के तो सब कायल थे। वर्तमान में सक्रिय जितने भी अभिनेता हैं उनमें कितनों की AIEEE की रैंकिंग 7 रही होगी, कितने लोग खगोल विज्ञान, भौतिक विज्ञान की बातें करते हैं, कितने हैं जो संघर्ष करके सीरियल, डांस कम्पनी, और फिर फिल्मों में आये? होंगे लेकिन कितने?

वर्तमान में सक्रिय सभी कलाकारों की कहानियां हैं, संघर्ष की। लम्बा, बहुत कुछ सहते हुए भी। लेकिन "काई पो चे" जब आयी तो राजकुमार राव और मानव कॉल जैसे अभिनेताओं के होते हुये भी सुशांत ने वाहवाही लुटी, अपने अभिनय से, अपनी उपस्थिति से। फ़िल्म के लिए उसने अवार्ड भी जीते। जिस दौर में आज का छोटे शहर के किरदार जीवंत कर देने वाला आयुष्मान खुराना फिल्मों में चरित्र से अधिक मॉडल लगता था उस वक़्त काइ पो चे में सुशांत राजकुमार और अमित ने छोटे शहर के लड़कों को जीवंत कर दिया था। उनके हाव भाव, उनका पहनावा, और उस पर से उनके किरदार की गहराई ने पर्दे पर छोटे शहर को अलग किरदार बना दिया था।
शुद्ध देसी रोमांस थोड़ी कमजोर थी लेकिन फिर छोटे शहर के लड़के के रोल में सुशांत ने जान डाल दी थी। लेकिन सुशांत कुछ भी लगातार नहीं करते रहना चाहते थे, वो पीके में पकिस्तान के सरफ़राज़ बने, फिर वो बने जासूस ब्योमकेश बक्शी। वो फ़िल्म जिसने मेरे लिए सुशांत को लेकर सारी अटकलें शांत कर दी, सिद्ध कर दिया ये सिर्फ अगला शाहरुख नहीं है, ये उसके आगे का कोई है। आप फ़िल्म देखिए फिर समझ आएगा इसने क्या मेहनत की, क्या किरदार निभाया है। 28 की उम्र में धोती, मूँछ लगाकर क्या चुनौती कबूल की। फ़िल्म ज्यादा चली नहीं। लेकिन सुशांत ने सिद्ध किया कि वो अवसर मिलने पर क्या कर सकता है। अब तक फिल्मों के लिए तैयारी, मेहनत करना इतना पॉपुलर नहीं था। आमिर खान करते। बाकी ज्यादा कोई नहीं, अजय देवगन एक ही मूँछ में 5 फिल्में कर लेते तो अक्षय कुमार एक ही फ़िल्म में 4 हेयर स्टाइल के साथ काम चला लेते। फिर आयी फ़िल्म धोनी द अनटोल्ड स्टोरी। हालांकि उस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं था जो अनटोल्ड हो लेकिन सुशांत ने अपने दम पर वो फ़िल्म देखने लायक बना दी थी। उसने जिस स्तर की मेहनत की वो सच मे अद्भुत था। फ़िल्म में चौके छक्के के अतिरिक्त जितना कुछ था वो सुशांत थे। वो सुशांत का धोनी बनना ही था कि रणवीर सिंह आज कल कपिल देव बने घूम रहे हैं, वरना अज़हरुद्दीन तो इमरान हाशमी भी बने ही थे। लेकिन एक फ़िल्म जिसने मुझे सुशांत का मुरीद बना दिया वो थी "सोनचिड़िया"। मनोज बाजपेयी, रणवीर शौर और आशुतोष राणा जैसे कलाकारों के होते जो सुशांत ने फ़िल्म में अपनी जगह बनाई, किरदार निभाया वो अद्भुत था। उनकी ये फिल्में साबित करती हैं कि सुशांत एक काबिल अभिनेता, बेहतरीन डांसर, विचारवान व्यक्ति और सजग व संजीदा कलाकार भी थे। लेकिन फिर क्या हुआ?
ये कि यह इंडस्ट्री बहुत देर से अवसर देती है, अवसर दे भी दिया तो स्वीकृति बहुत देर से देरी है, स्वीकृति हो भी गयी, एक हिस्से में ना सही तो समावेश नहीं हो पाता। यही है वो इंडस्ट्री। अवसर,अनुमति, स्वीकृति और समावेश। जब भी इसकी लड़ाई लड़ी गयी व्यक्ति को बहुत कुछ सहना पड़ा। केदारनाथ फ़िल्म में सुशांत का काम बड़े अभिनेता की बेटी सारा अली खान से कई बेहतर थी लेकिन पूरी तारीफ गयी अभिनेता की बेटी के हिस्से जैसे हाइवे के समय हुआ था। आलिया की वाहवाही खूब हुई लेकिन रणदीप के बेहतरीन काम का ज़िक्र तक नहीं। सरबजीत में ऐश्वर्या के बकवास अभिनय की खूब चर्चा हुई लेकिन ऋचा चड्ढा के अभिनय का ज़िक्र तक नहीं। 2013 में जिस साल सुशांत की पहली फ़िल्म आयी उस साल बेस्ट मेल डेब्यू का अवार्ड धनुष को मिला। धनुष बेहतरीन अभिनेता हैं और रांझणा में काम लाजवाब भी था लेकिन उससे पहले वो तमिल में खूब नाम कमा चुके थे ,राष्ट्रीय पुरस्कार तक जीत चुके थे, तो क्या ऐसे में सुशांत जैसे पदार्पण कर रहे कलाकारों को अवार्ड देना वाज़िब नहीं था? मुझे आज तक लगता है कि "पानीपत" में यदु अर्जुन कपूर की जगह सुशांत होते तो लाजवाब अभिनय करते, और आगामी पृथ्वीराज को लेकर भी यही लगता है। लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री घरानों की इंडस्ट्री है। यहां जो बड़े निर्माता हैं सो सब कुछ नियंत्रित करते हैं। आदित्य चोपड़ा का सुशांत को नापसंद करना जगजाहिर है। इसीलिए शेखर कपूर की फ़िल्म "पानी" के निर्माम को हमेशा के लिए रोक दिया गया। करण जौहर ने कभी सुशांत को मौका नहीं दिया। जबकि सब जानते हैं वरुण धवन, सिद्धार्थ मल्होत्र के मुकाबले ज्यादा सक्षम अभिनेता थे। सूरज पंचोली और अर्जुन कपूर जैसे बिना किसी सिर पांव के अभिनेताओं को मौके लगातार मिल रहे हैं। कई बार बड़े अभिनेताओं को बिना किसी घराने के आये अभिनेताओं के फ़िल्म में रोल को लेकर काफी चिंता रहती है, जैसे धर्मपुत्र सन्नी देओल को शाहरुख के किरदार को लेकर हो गयी थी। और ये सब कुछ यूं ही चलता रहेगा, हमें इरफान खान के साथ की गई नाइंसाफी याद नहीं रहेगी तो ये तो सुशांत था। छोटे शहर से आया लड़का जिसने बड़े घरानों के लड़कों को उन्हीं के गढ़े परिभाषाओं में जवाब दिया था। लेकिन वो सब एक आशा के साथ फंदे के सहारे लटकी मिली।

यही है, हमने सुधीर कुमार, सुशील कुमार के गायब होने के किस्से सुने, दिव्या भारती की मृत्यु के किस्से सुने, अब सुशांत के सुनेंगे।
शुक्रिया सुशांत यह बताने के लिए कि छोटे शहरों में सपने देखना गुनाह नहीं है। तुम बने रहते तो बात और भी अच्छी होती।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

परिवर्तन से परे

PM CARES: सब कुछ ठीक है क्या? 
- अंकित झा 


प्रक्रिया परिणाम से अधिक आवश्यक होती हैं। परिणाम कितना भी न्यायोचित हो परंतु यदि उसकी प्रक्रिया पर प्रश्न उठ जाएँ तो निश्चित ही परिणाम पूर्ण रूप से न्यायोचित नहीं है। प्रधान मंत्री राहत कोष बनाम PM CARES का मामला वही है। अरबों रूपये के दान के साथ इस समय यह ट्रस्ट सबसे अधिक फ़ंडिंग वाले ट्रस्टों में से एक है।
- प्रश्न यह है कि इस पर प्रश्न करना कितना उचित या अनुचित है।
पहली बात तो ये कि देश में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष तथा राष्ट्रीय संचित निधि के होते हुए यह नया ट्रस्ट के गठन की क्या आवश्यकता थी?
सरकार की ओर से इसका एक उत्तर यह है कि राष्ट्रीय राहत कोष प्राकृतिक आपदा के लिए होता है जो कि कोविड-19 नहीं है और संचित निधि के उपयोग हेतु संसद की सहमति लगती है। जो कि इस समय पर नहीं मिल सकती थी। पी एम cares का अधिकारिक स्टेट्मेंट 28 मार्च को आया जबकि जब देश कोविड-19 के चपेट में काफ़ी हद तक था तब संसद का सत्र चल रहा था। अंतिम सत्र 23 मार्च को हुआ जिसमें बिना किसी चर्चा के दो बिल पास हुए और दो बिल सदन में बिना किसी पूर्व सूचना के पेश भी कर दिए गये। क्या इस समय संचित निधि उपयोग करने के लिए प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता था? यदि हाँ, तो क्यों नहीं लाया गया? और राष्ट्रीय राहत कोष में ही एक बदलाव क्यों नहीं लाया गया जिसमें राष्ट्रीय आपदा के अतिरिक्त दुर्घटना व दंगा पीड़ितों को भी राहत दी जाती है? यदि इसके साथ मुख्य स्वास्थ्य आपदा क्यों शामिल नहीं किया गया?
ऐसे कई क्यों हैं जो इससे जुड़ा हुआ है।
- दूसरी बात ये है कि पी एम CARES एक पब्लिक चेरिटबल ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत बताई जा रही है। यदि यह एक चेरिटबल ट्रस्ट है तो निश्चित ही यह "इंडीयन ट्रस्ट ऐक्ट, 1882" के अंतर्गत पंजीकृत होगी। 'चैरिटी' संविधान के 'समवर्ती सूची" का एक विषय है अतः इसको लेकर केंद्रीय व राज्य क़ानून लागू होते हैं। परंतु प्रश्न यह है कि "ITA 1882" के हिसाब से इस फ़ंड का ढाँचा थोड़ा अलग है। ढाँचा के साथ साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह "सूचना का अधिकार" के अंतर्गत आता है? मेरे हिसाब से नहीं। शायद थोड़ा और छानबीन कर के और बेहतर उत्तर खोज पाऊँ लेकिन अभी के हिसाब से तो नहीं। क्यों? क्योंकि ये ट्रस्ट संसद द्वारा पास नहीं किया गया, इसमें सरकारी पैसे नहीं लग रहे, इसमें सरकारी की भागेदारी सिर्फ़ इतनी है कि इसके अध्यक्ष प्रदान मंत्री हैं और सदस्य कुछ अन्य मंत्री। जब सरकारी पैसा शामिल नहीं है मतलब सरकारी जवाबदेही कम होती है।
- तीसरा यह कि माइक्रो फ़ंडिंग के लिए किया गया है। इस तर्क से सहमत है लेकिन बात वही कि राष्ट्रीय राहत कोष की सीमा भी तो कम की जा सकती थी। शायद इसलिए ना किया हो क्योंकि उसकी स्थापना नेहरु ने की थी। इसके साथ एक यह भी तर्क है कि लोग राष्ट्रीय राहत कोष में ज़्यादा दान नहीं देते क्योंकि प्राकृतिक आपदा देश के एक हिस्से में आती है और उससे दूसरे हिस्से के लोगों को ज़्यादा असर नहीं पड़ता फिर बिहार, केरल, महाराष्ट्र के बाढ़ के समय जगह दान लेने वाले paytm और अन्य इकाइयों को कैसे अनुमति दे दी गयी थी। लोगों ने ख़ूब दान किया था। 2019 तक इस कोष में क़रीब 3800 करोड़ उपाए थे जो 2014-15 में क़रीब 1500 करोड़ था। PM CARES जितनी पब्लिसिटी अगर इसे मिलती तो इसे भी ख़ूब दान मिलता।
और तर्क नहीं, हाँ एक आय कर छूट वाला भी तर्क है। लेकिन थोड़ा ज़्यादा हो जाएगा। वो छोड़ देते हैं।
जहाँ तक बात है प्रक्रिया की तो ये भी इतिहास में याद रखा जाएगा कि वैश्विक महामारी के समय प्रधानमंत्री ने तीन सम्बोधन किए एक मन की बात की और उसमें क्रमशः "जनता कर्फ़्यू", "धन्यवाद देने के लिए ताली", "21 दिन का लॉकडाउन", और "9 बजे का दीप प्रज्ज्वलन कार्यक्रम" की घोषणा कर के निकल लिए। स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई टिप्पणी नहीं, हाल ही में हुए G-20 बैठक में लिए फ़ैसलों पर कोई बात नहीं, मज़दूरों को हुई असुविधा व उनके जीविका व जीवन के ख़तरे पर कोई बात नहीं, और यहाँ तक कि आगे के क़दम पर कोई बात नहीं। बस बोल के निकल जाना और उनके पीछे छूटे भूसे पर सब डंडे पीटते रहें। कमज़ोर व्यक्ति प्रश्नों से डरता है, उससे भी कमज़ोर प्रश्न के नाम से और सबसे कमज़ोर अपने पसंद के प्रश्न ही पूछवाना चाहता है। जो भी श्रेणी हो 56 इंच छाती वाले को वहाँ डालें। जनता कर्फ़्यू, ताली थाली, दीप प्रज्ज्वलन, लॉकडाउन सिर्फ़ इन्होंने ही नहीं करवाए, सभी देशों ने करवाए हैं लेकिन उसके साथ साथ जिस तरह की अन्य सुविधाएँ और कार्यक्रम चलाए गये हैं वो भी देखे जाएँ। जिस rतह की फूर्ति, समर्पण और तत्परता मुख्यमंत्रियो ने दिखायी है उसके दसवाँ हिस्सा भी अगर ये दिखाएँ तो लोगों में विश्वास बने। लेकिन नहीं परिणाम प्रक्रियाओं को छिपा लेगा। इस बार मुझे नहीं लगता क्योंकि इस बार का परिणाम पूरी तरह प्रक्रिया पर निर्भर है।

रविवार, 29 मार्च 2020

चलते-चलते

जहाँ कोई वापसी नहीं

- अंकित झा 

आनंद विहार और कौशाम्बी के बीच जो भीड़ थी, वो भीड़ बरसों से है, बस कल वो भीड़ एकत्रित हुई थी, वापस जाने को। वापस जाने को उन शहरों से जहाँ उनसे लिए तो ख़ूब गया पर बदले में आश्रय, भोजन, सुरक्षा और स्वास्थ की गैरंटी तक नहीं दे पाएँ।
आज जो सब मज़दूर के मुद्दों पर विशेषज्ञ बन रहे हैं उन सब को जानना चाहिए कि वर्षों से मज़दूरों के आय सुरक्षा व सामाजिक सुरक्षा को लेकर लोग संघर्षरत हैं, उनमें से ये माँगे ज़रूरी रही हैं कि उनके आय की सुरक्षा हो किसी भी हाल में। आपदा, विपदा व विषाणु संक्रमण किसी भी समय आ सकते हैं। चलिए इस बार ये इतना दिख गया कि सब हरकत में आ गये वरना बाढ़ में, भूकम्प में, अभी हुए दंगों में, और हाँ आतंकवाद-कालेधन पे हुए वार ने भी मज़दूरों को इतना ही डराया था परंतु एक सुकून था कि काम तो चल रहे हैं कुछ नहीं होगा आज नहीं तो कल काम मिलेगा ही, पैसा आएगा ही। लेकिन जब 21 दिनों का पूर्णबंद हो, उस पर से अलग अलग अफ़वाहों द्वारा 3 महीने के बंद की बात की जा रही हो तो मज़दूर डरे नहीं तो क्या करे? कौन खिलाएगा? कितने दिन? किस तरह? वादों और वादों को निभाना और वादों को सही तरह से न्यायोचित ढंग से निभाने में बहुत अंतर है। हम ताली पीट सकते हैं कि दिल्ली सरकार ने प्रबंध किए हैं लेकिन ये प्रबंध सिर्फ़ आपदा प्रबंधन है मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा नहीं। जिन मज़दूरों का वोट पाकर वो सत्ता में आए उन मज़दूरों के लिए आवश्यक क़ानूनों को पालन तक नहीं करवा पाए अभी तक। अगर पथ विक्रेताओं का सर्वे हो गया होता तो उनके योजना अनुसार उनके आय की सुरक्षा हो जाती, अगर असंगठित मज़दूरों का 2008 क़ानून के हिसाब से पंजीकरण हो जाता तो आज उनके सामाजिक सुरक्षा जैसे स्वास्थ्य, व भोजन की व्यवस्था हो जाती और घरेलू कामगार, निर्माण कार्य मज़दूर, व अन्य डिहादी मज़दूरों की तो बात छोड़ ही दीजिए।
हमारे सामने जो हो रहा है वो सिर्फ़ इस सरकार की असफलता नहीं है, हमारे देश के सभी सरकारों की है। श्रम क़ानून, स्वास्थ्य सुविधाएँ, और सूचना प्रबंधन। ये तीनों इस तरह से लाचार हो गयी कि सामने कुछ दिख ही नहीं रहा। अंदर बंद रह के एक वर्ग को बचाया जा सकता है लेकिन इतने बड़े वर्ग को क्या बोला जाए? मज़दूर भी वो, मजबूर भी वो और दोषी भी वो ही?
जब बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग मोबाइल पे अफ़वाहों को सच मान के बैठ जाते हैं तो उनसे क्या उम्मीद करें जिनके लिए "फ़ैक्ट-चेक" जैसा कॉन्सेप्ट उतना प्रबल नहीं है? उनके डर के ऊपर ये अफ़वाह के मसाले को पसरने से कौन रोक पाएगा? सरकार? जिसे इस समय भी शब्दों से खेलने में मज़ा आ रहा है। या फिर मीडिया जो अंताक्षरी खेल रहा है? कोई नहीं। हम भी नहीं। ग़रीब इस देश में ऐसे ही परेशान रहे हैं। रहेंगे। कुछ दिनों में मीडिया की कहानी बदल जाएगी, और भक्तों के नैरटिव भी जो आज ये कह रहे हैं कि दिल्ली में सारे परदेसी लोग निकल गये हैं बस रोहिंग्या और बांग्लादेशी बचे हुए हैं और दिल्ली सरकार उन्हें ही खिला रही है बस। आप इन अफ़वाहों के दलदल में जीते रहिए, हम अपने कमरों में जीते हैं, ये ग़रीब भी एक दिन पहुँच ही जाएँगे या तो अपने गाँव, जेल या फिर वहाँ जहाँ से कोई वापसी नहीं।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

परिवर्तन से परे

लॉकडाउन से पहले कुछ आवश्यक प्रश्न 

- अंकित झा 

लॉक डाउन शुरू होने के तीन दिन के अंदर स्थिति साफ हो गयी कि ये सब कैसे चलना है। बात साफ है कि हम लोग कभी ऐसी महामारी से जूझने के लिये तैयार ही नहीं थे। क्या ये तैयारी होती है? विषाणु (वायरस) पर्यावास का हिस्सा हैं, कई बार उन्हें वाहक मिलता है और फैलना शुरू कर देते हैं। क्या इतनी सी पांचवी क्लास का विज्ञान हमारे सरकारों ने नहीं पढ़ा? तो विषाणु के प्रकोप व संक्रमण के समय क्या करना चाहिए, कैसे सुरक्षित रहा जाए, इलाज कैसे हो और समाज के सबसे वंचित समूह के लिये क्या व्यवस्था की जाए, ये सब कौन और कब तय किया जाना चाहिए था। क्या लगातार बढ़ते संक्रमण के आंकड़े, सडकों चलते मज़दूर, रैन बसेरों में खाने के लिए लम्बी कतार, दुकानों में भारी भीड़, नेताओं बेतुके बयान, लोगो का बाहर निकलना, पुलिस की लाठी आपको प्रश्न करने पर विवश नहीं करती?
इस समय हमारे सामने दस मुख्य प्रश्न खड़े हैं:
1. सबसे बड़ा प्रश्न, क्या इतने वर्षों के स्वायत्त स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद हम केंद्र और राज्य स्तर पर विषाणु संक्रमण से निपटने, उसके विस्तार को रोकने, उसके इलाज के किये इकाई बनाने में असमर्थ हैं? सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे देश में जांच की साधन ही नहीं है। साधन नहीं हैं इसलिए नतीजे नहीं आ रहे हैं। हम अभी भी मलेरिया, डेंगू और बुखार से मरने वाले देश हैं वहाँ विषाणु संक्रमण अवश्य ही एक बड़ा खतरा है। फिर स्वास्थ्य बजट में हर साल मामूली बढ़त इसमें सहायता तो नहीं करती।
2. हमारी चिकित्सा अनुसंधान इतनी कमजोर क्यों है? एक वैश्विक महामारी के इतने करीब होने के बावजूद पिछले तीन महीनों से पर्याप्त तैयारी नहीं की गई, ना लोगों के जागरूकता पर, स्वास्थकर्मियों के प्रशिक्षण पर और सबसे जरूरी रोकथाम व इलाज के लिए वैक्सीन पर?
3. क्या हमारे स्वास्थ्य कर्मी, पराचिकित्साकर्मी, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस और नागरिक सेवा अधिकारी ऐसे संक्रमण, महामारी व रोगों से बचाव के उपायों को लेकर पूर्णतया प्रशिक्षित हैं? क्या इनके पास इससे निपटने के किये आवश्यक वस्तुओं की मौजूदगी है? उसे इस्तेमाल करना आता है? क्या ये समाज में उचित जागरूकता फैला सकते हैं? क्या ये न्यायोचित व बिना भेदभाव के इस पर कार्य कर सकते हैं? क्या इनकी सामाजिक ट्रेनिंग की गई है? क्या इनकी संवेदनशीलता पर कोई प्रशिक्षण लिया गया है? ज्ञान, समझ, संसाधन, जागरूकता व संवेदनशीलता सबसे आवश्यक हैं। क्या इस पर इतने वर्षों में कार्य किया गया है?
4. प्रशासनिक व सरकारी निर्णयों के अपने प्रभाव व दुष्प्रभाव होते हैं। अतः प्रधानमंत्री के निर्णय के भी हैं। प्रभावों की प्रतीक्षा रहेगी लेकिन दुष्प्रभाव सामने हैं, और ये ऐसे दुष्प्रभाव हैं जिस पर कार्य किया जाना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ। ऐसा क्यों है कि प्रधानमंत्री को अपने हर देश के नाम संदेश के बाद सैकड़ों ट्वीट, आदेश और आग्रह करना पड़ता है? क्या हमारा प्रधानमंत्री कार्यालय इतनी खराब तैयारी करता है? क्या यह सोंच पाना इतना मुश्किल कार्य था कि लॉकडाउन के कारण मज़दूरों के आय के साधन रुक जाएंगे, उनका आवास छीन लिया जाएगा, उनपर संक्रमण के समय जांच के पैसे कहां से आएंगे? उनके पास साबुन व पानी कैसे पहुंचाया जाएगा? और कितने ही प्रश्न। हमारे वर्षो पुराने भेदभावपूर्ण मानसिकता के उजागर होने का ये चरम है, जब स्वास्थ्यकर्मी व हवाई सेवा से जुड़े लोगों को शोषित किया जा रहा है। अभी तक सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा व सामने खड़े आर्थिक नाकाबंदी से उपजे संकटों के लिए कुछ भी तय नहीं किया गया है।
5. करीब 5 वर्ष पहले शुरू हुए श्रमेव जयते कार्यक्रम के अंतर्गत मज़दूरों और खासकर दिहाड़ी व अन्य असंगठित मज़दूरों की आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए थे। मज़दूरों की क्षमता विकास जरूरी कदम था लेकिन उनके स्वास्थ्य बीमा, कार्य सुरक्षा, आर्थिक स्वायत्तता, और आवासीय सुरक्षा के लिए क्या किया गया था? ऐसा क्यों है कि महीने भर की आर्थिक बंदी की वजह से मज़दूरों को अपनी शारीरिक सुरक्षा की परवाह किये बिना ट्रेन में ठुस के या पैदल ही अपने राज्य वापस जाना पड़ रहा है जहां न कार्य की गारंटी है ना स्वास्थ्य की?
6. आवश्यक्ता से अधिक संग्रहण व बचत भारतीय मध्यम वर्ग व उच्च वर्ग की पहचान है। लेकिन यह संग्रहण जब पैनिक संग्रहण का रूप लेती है तो उनके लिए ही काल बनती है। ये डर क्या है? इस डर के ऊपर इतने वर्षों में कार्य क्यों नहीं किया गया? अभी खराब समय नहीं आया है, क्या इससे भी खराब समय जे लिए हमारा समाज तैयार है? क्या संसाधनों के उचित व न्यायोचित बंटवारे के लिए हमारा समाज तैयार है?
7. जिस समय चीन, दक्षिण कोरिया, व इटली जैसे देश कोविड-19 से निपटने के लिए कार्यरत थे और भारत में कई लोग लगातार इसपर कार्य करने की सलाह दे रहे थे उस समय हमारे देश के सरकार के लोग अपनी बेहूदगी, बीमारी के प्रति अपनी असंवेदनशीलता और अज्ञानता को नए आयाम दे रहे थे। कहीं कोई धूप में बैठने को बोल रहा था, तो कोई गौमूत्र पार्टी कर रहे थे, कोई गो कोरोना का पाठ कर रहे थे तो कोई हवन और नमस्ते का महत्व समझा रहे थे। ये असंजीदगी आज हम सब पे भारी पड़ रही है। क्या उन नेताओं को सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगनी चाहिए? और इस सब की पराकाष्ठा 22 मार्च को सामने आई। शाम 5 बजे जो हमारे बेहूदगी और विषाणु के प्रति हमारी सामूहिक अज्ञानता का जो हमने परिचय दिया वो ऐतिहासिक है। ऐसी अज्ञानता पहले आडंबरों और अफवाहों में दिखती थी बस, उसे एक देश की सामूहिक मूर्खता का नाम उस दिन दिया।
8. इस समय सबसे आवश्यक है हमारे प्रशासन का रवैया। हम इस बात पर सहमत व असहमत हो सकते हैं कि पुलिस व प्रशासन को किस तरह इसे संचालित करना है। लेकिन जिस तरह के वीडियो सामने आ रहे हैं हम पूर्णतः असमंजस में हैं कि कौन सही, कौन गलत। लोग जो बाहर निकल रहे हैं या पुलिस जो बर्बरता से लाठी भांज रही है। लोगों के अपने कारण हैं, सही भी और गलत भी। पुलिस के भी। लेकिन पुलिस को ये फ्री हैंड किसने दिया लाठी भांजने का? फिर कोई राज्य सरकार कैसे कह रही है कि हमें दिखते ही गोली मारने का आदेश देने पर विवश ना करे। विषाणु के संक्रमण को रोकने के किये शूट एट साइट का आदेश? ये किस देश में हो रहा है? प्रशासन की प्रशंसा भी होनी चाहिए कि जिस निस्वार्थ भाव से वो लगे हुए हैं वो अद्वितीय है लेकिन स्वरूपों के मध्य छिपे रूपों को नकारना नहीं चाहिए।
9. कुछ राज्य सरकारों ने इस महामारी से निपटने में जो पहल की है वो बेहतरीन है। केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली, तेलंगाना और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जिस तरह कार्यरत हैं वो प्रशंसनीय है। लेकिन प्रश्न यही खड़ा होता है कि आगे क्या? कैसे? कब तक? न्याय वो है जो वंचितों व पीड़ितों के प्रति संवेदनशील हो। कांधे पर बच्चे व सर पर बोझा लिए पैदल चल रहे मज़दूर हमारे देश में गरीबों के प्रति सरकारी निराशा की प्रतीक है, उस पर से फैल रहे अफवाह-आडम्बर, धार्मिक नफरत और कुछ नेताओं की बेवकूफ़ी हमारा भविष्य करेंगे।
10. कोरोना विषाणु ने दुनिया को आईना दिखाया कि तमाम विकास के दावे, और परिवर्तन की डींगो के मध्य हमारी लचर स्वास्थ्य सुविधा, ऐसी महामारी से निपटने के लिए उचित तैयारी और संक्रमण को रोकने के लिए हमारी ततपरता कितने पीछे है। हो सकता है इसके बाद आर्थिक मामलों में स्वास्थ्य की दखल बढ़ाई जाए, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पर काम हो सबसे अधिक जरूरी है हमारी स्कूल शिक्षा में ऐसे समयों के सभी तरह के आयामों पर जागरूकता के लिए भी कार्य किया जाएगा, और सबसे जरूरी है कि समाज में वैज्ञानिक सोंच को बढ़ावा दिया जाएगा। दुर्गा सप्तशती और हवन से विषाणु व रोगों का अंत नहीं होता, वो हमें सांत्वना व संयम दे सकते हैं स्वस्थ नहीं कर सकते। इससे भी जरूरी है देश के असंगठित मज़दूर व अन्य गरीबो की आर्थिक सुरक्षा व सामाजिक सुरक्षा पर कार्य करना। देखते हैं, इन दस में से कितने प्रश्नों पर हम स्वयं से उत्तर की अपेक्षा कर सकते हैं।
ख़ैर, ये वो सत्य है जिसकी खोज हमें अगले 20 दिन घर पर रहते हुए भी करनी है। सुरक्षित रहें व सतर्क रहें।
निर्भय भव। ज़िंदाबाद।

गुरुवार, 5 मार्च 2020

Statement

Date: 05-03-2020
JOINT STATEMENT
Condemning the Hate Speech by Alumnus, Kapil Mishra (batch 2004-06) and demanding immediate restitution of victims of Delhi Violence
We, more than 100 undersigned alumni from different batches of the Department of Social Work (Delhi School of Social Work-DSSW), University of Delhi, hereby come together to unequivocally condemn the hate speeches made by one of our alumnus, Kapil Mishra (2004-06) which incited the communal violence in several places of Delhi on 24th February 2020. Mishra who had served as a Member of Legislative Assembly from Karawal Nagar constituency in 2015 and was defeated in the recent assembly elections from Model Town in Delhi. He has been in the news over the last week (Video from Jafrabad on 23rd February 2020, one of many news sources: https://www.youtube.com/watch?v=bS4JxOAbQUE, Aaj Tak 26th Feb 13.10 Min, https://www.youtube.com/watch?v=4KkYGueY2no, NDTV India 23rd Feb 2020) for delivering hate speech and warning bearing communal colour. He has been accused by several groups of inciting communal tensions through his speeches, and issuing warnings to a group of protestors who were sitting on agitation against Citizenship Amendment Act 2019, and forthcoming National Population Register (NPR) and National Register of Citizens (NRC) which together can make many citizens of India illegal persons in their own country of birth and ancestry.
In the video Mishra is seen issuing warning to the anti- CAA protestors of dire consequences, that has been making rounds on social media widely. This is not the first time that he has been at the epicentre of communal hate mongering, rather been engaged with it on several accounts.
Mishra remarked during election campaign that there will be an India-Pakistan contest on the roads on 8th February (Voting day for Delhi Elections 2020) or him leading a group of people sloganeering “Desh Ke Gaddaron ko, Goli Maaro Saalon Ko” (quoted as stated by Mishra on 21st December, https://www.youtube.com/watch?v=sqTpSLnP1FI) .
Delhi Election Commission on 23rd January 2020 took cognizance of these statements by condemning them and subsequently banning him from campaigning. Even now he continues with his jingoist propaganda through his protest at Jantar Mantar with placards displaying ‘Delhi Against Jehadi Violence’ besides raising slogans “shoot the traitors”!
We the undersigned alumni are in abject dismay at how an ex-student of the Department is capable of such irresponsibility. Both his act and speech stands in direct contradiction to not only of values and ethics of social works but also basic humanitarian principles. It is both shocking and disheartening to see him at the centre of communal bigotry followed by violence with the justification of clearing roads. Dissent is at the heart of democracy, as Mishra will be rightly aware and protest a fundamental right therefore any attempt to sanitize a public place of CAA protest is violation of Right to Life under Article 21 under the Constitution of India.
His incitation led to the worst form of humanitarian tragedy in decades, as rioting mobs burnt down homes, businesses, schools besides desecrating places of religious worship. It has left hundreds homeless, many more wounded and approximately 46 dead thereby making it a crisis. This tragedy has affected young, old and women to a great magnitude. Today, the victims continue to pay the price of a communally charged hate speech with their lives and livelihoods. The plight of those grievously injured and languishing in temporary relief camps bears testimony of such incitation.
Every riot puts families and communities in pain, anguish, poverty and destitution. As social workers, we are fully aware that for the development of the country we need conflict mitigation, peace building and social harmony. Riots and clashes hamper the social order, economy and polity and due course of law thereby pushing us behind by several decades. Leaders, public individuals and media figures must therefore be responsible and refrain from any divisive politics based on communal, racial, linguistic lines or any other identity markers. We demand appropriate legal action to be taken against Kapil Mishra and others for the hate speeches which instigated violence from 24th February 2020. In this light we also demand for a free and fair probe by an independent enquiry commission.
We demand Bhartiya Janta Party (BJP) leadership to take action against Kapil Mishra and other party workers accused of hate speeches, as the party continues to enjoy majority confidence since 2014. We strongly believe that the leadership will address this issue without loss of time.
We demand the Delhi and Central Government to declare the Delhi Violence an emergency and respond immediately by making available relief & shelter to all in form of food, clothes, shelter and medical aid besides other basic provisions. We demand the affected children, adolescents, elderly and women to be provided trauma care and psychosocial care in partnership with NGOs.
We demand the Central Government to come out with guidelines for leaders and lay down punitive measures against jingoism of any form.
We demand immediate identification rioters besides setting up a fast track court for justice delivery.
Horrifying images of young boys engaging in rioting have surfaced. We appeal for therapy and counseling of adults and juveniles who seem to have undergone communal indoctrination thereby engaging in looting and violent acts.
We the undersigned alumni of DSSW thereby unequivocally condemn the speech and act of Kapil Mishra and the violence that follow besides demanding restitutive measures for the victims of violence. We also stand in solidarity with the current president of DSSW Students’ Union who took a strong stand against the culture of hate.
NOTE: This joint statement is on behalf of the undersigned alumni of DSSW and does not represent the whole alumni group of DSSW or the official platform of the Department. It has been written and endorsed by a group which is pained by violence. We hereby reaffirm our faith in the Constitution of India, which gives us freedom with responsibilities and the principles of social work which urges us to be empathetic and uphold human rights and justice at all times.
In Solidarity

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

इतिहास के सौतेले दरिंदे: दंगे। 

- अंकित झा 

1... 3... 9... 13.. 18...
एक एक कर जो अब बढ़ रही हैं वो न्यूज़ में दिखने वाली संख्या मात्र हैं। मनुष्य की मृत्यु का दुर्घटना होना बहुत पुरानी बात हो चुकी है अब। इतने लोग मारे गए हैं। किसने मारा? क्यों मारा? एक कानून के विरोध में? शायद नहीं। कानून का विरोध तो तब ही कुचल दिया गया था जब विरोध में बैठे लोगों को आतंकवादी, देशद्रोही, बिके हुए उपद्रवी कह दिया गया था। तमाम विरोध के बाद भी एक कानून आता है। लोग विरोध जाती रखते हैं, विरोध में छात्र भी भाग लेते हैं, सरकारी पदों से इस्तीफा दिया जाता है, धरनों में शांति की अपील होती है, एक दंगा होता है, पुलिसिया कार्रवाई होती है, लोग मारे जाते है।
क्या कुछ याद नहीं आया? मुझे तो हूबहू याद आया। फरवरी 1919। एक कमिटी बनी। रौलेट कमिटी। एक कानून का प्रस्ताव। अनार्कीकल एंड रेवोल्यूशनरी क्राइम्स एक्ट। तमाम विरोध के बाद भी उसका पास होना। विरोधों का जारी रहना। गाँधी का उदय। फिर पंजाब में खूंखार दंगे। और फिर जलियांवाला बाग़। मृत्यु। मृत शरीरों का ढ़ेर। बस अंतर ये है कि उस दौर में क्रूर ब्रिटिश हम पर राज कर रहे थे, और अब देश के लोगो द्वारा चुनी गई सरकार। गोलियां चलाने वाले उस दौर में भी सरकारी गुंडे थे और इस दौर में भी निस्संदेह वही। कुछ वर्दी में कुछ बिना वर्दी के। राज्य में हिंसा पर अगर सरकार का नियंत्रण नहीं तो फिर वो सरकारी हिंसा है। ऐसी कोई हिंसा नहीं जिसे सरकार रोक ना सके, अगर नहीं रुक रहा है तो दो राय नहीं कि सरकार चाहती है कि हिंसा हो। दिल्ली के मामले में ये दोनों सरकारे हैं। आश्चर्य ये है कि अभी भी दोषी तय किये जा रहे हैं, दोष नहीं।
दंगे के बड़े दुष्प्रभाव होते हैं, सबसे बड़ा तो ये कि छीने जा चुके हक़ को लूटने वाले बहुत होते हैं, हक़ बाँटने वाले बहुत कम। समस्या बाँटने वाले बहुत होते हैं,परन्तु सुलझाने वाला कोई नहीं। कोई भी सांप्रदायिक तनाव नया इतिहास लिखती है, इस इतिहास के पन्ने या तो सुर्ख होते हैं या फिर काले। इस दंगे के भी यही कुछ परिणाम होंगे यह तय है। इस दंगे की इतिहास में दो सबसे बड़े गुनाहगार होंगे: दिल्ली पुलिस और देश की मेन स्ट्रीम मीडिया। इन दोनों ने दंगे उकसाये या भड़काए नहीं है बल्कि इस बार दंगों में बराबर के हिस्सेदार हैं। बीते कई सालों से मीडिया के न्यूज़रूम और स्टूडियो में हर रोज़ के बार दंगे हुए हैं। खुलेआम वो बातें कहीं गयी जो पहले अकेले में भी बोली नहीं जाती थी। एक एक करके हिंसा व नफरत की पराकाष्ठा के नींव डाले गए ताकि एक दिन ये किया जा सके। मेरा यक़ीन मानिए ये उनकी पराकाष्ठा नहीं है। ये पराकाष्ठा से पहले वाला पायदान है। उनकी पराकाष्ठा कितनी खतरनाक होगी इसकी कल्पना ही हमें हिला देनी चाहिए। आप सबको, हम सबको हिंसा के लिए इतना उत्सुक कर दिया गया कि कई लोग हिंसा में असहाय हैं तो बड़ा तबका हिंसा से खुश।
ये खुशी हमारी सामूहिक हार है।
PS: हाँ, भीषण विद्रोह-हिंसा के तीन साल बाद 1922 में रौलेट कानून को निरस्त कर वापस ले लिए गया था। वो अंग्रेज़ थे। अपने वालों से क्या उम्मीद रखें? देखते हैं इन्हें कानून प्यारा है या नागरिक।

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

मूवी रिव्यू

शिकारा: नफ़रत, संघर्ष और प्रेमपत्र ।

- अंकित झा 
फ़िल्म शिकारा एक सफल फ़िल्म होती यदि उसे एक विशुद्ध फ़िल्म के रूप में बनाई जाती तो। किसी भी प्रेम कहानी के लिए आवश्यक है दो प्रेमी (फिर वो किसी भी रूप में हों) और उनकी परीक्षा के लिए खड़े किए गए हालात। फिल्मों में कभी वो आर्थिक असमानता होती है, कभी कोई तीसरा व्यक्ति जो दोनों में से किसी को प्रेम करता हो या फिर कोई सामाजिक या राजनीतिक कलह। इस फ़िल्म में दो प्रेमी हैं; शिव और शान्ति, शिव और कश्मीर, शांति और शिकारा (जो शिव और शांति का घर है), पण्डित व मुस्लिम, और साथ साथ बहने वाले मित्र, रिश्तेदार और तरक्कियां। पहली प्रेम कहानी मार्मिक है। काफी इत्तेफ़ाक़ से शिव और शांति मिलते हैं, फिर एक दूसरे के हो जाते हैं। कोई दिक्कत नहीं। हाँ इस बीच एक भयावह राजनैतिक और सामाजिक कलह इन दोनों की व्यक्तिगत रूप से खूब परीक्षा लेती है। और शांति को किये गए वादे के अनुसार शिव उसे हनीमून पर अंततः ताज महल ले जाता है। ये हुई इनकी प्रेम कहानी।
लेकिन मुझे पसंद आयी फ़िल्म की दूसरी प्रेम कहानियां। शिव और कश्मीर की प्रेम कहानी। शांति और शिकारा की प्रेम। पण्डित व मुस्लिम की प्रेम कहानी।
"एक दिन तुमसे मिलने वापस आउंगा
क्या है दिल में सब कुछ तुम्हे बताऊंगा
कुछ बरसो से टूट गया हूँ
खंडित हूँ
वादी तेरा बेटा हूँ
मैं पण्डित हूँ।
ऐ वादी शहजादी बोलो कैसी हो।"

ये बोल हैं शिव के जब वो 18 साल बाद जम्मू के अपने कैम्प से कश्मीर वापस आता है। कोई अपने आँसू कब नहीं रोक सकता? सम्भवतः जब वो अपने सबसे प्रिय से वर्षों के विरह के बाद मिले। वादियों से गुजरते समय शिव के मन में घूम रहे बोल और आंखों से अविरल बहते आँसू। ये है प्रेम। प्रेम अपनी ज़मीन से। जहँ पैदा हुए, जहाँ पढ़ाई की, जहां दोस्तों संग वो बड़ा हुआ, जहां उसे उसकी शांति मिली, जहाँ उसने कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया और वो मिट्टी उसे जहां का हो के रह जाना था। लेकिन। ये लेकिन इस प्रेम कहानी का वो प्रश्न है जो हमें इतिहास से पूछना है, जो हमें वर्तमान में पूछते रहना है, जो हमें हमेशा अपने समाज से पूछते रहना होगा। क्यों किसी समाज को उसकी पहचान के आधार पर अपनी पहचान गंवानी पड़ती है? इतिहास ऐसे किस्सों से भरा पड़ा है। कश्मीरी पंडितों का उनकी जमीन से विस्थापन इसी इतिहास की कड़ी है। वो समय कितना भयानक रहा होगा इसकी कल्पना करना भी असंभव है हम लोगों के लिए। हम बार बार ऐसे दौरों से गुजरे हैं और बार बार हम सब सभ्यता के स्तर पर एक कदम पीछे खिसके हैं। लेकिन कमी यह रह गयी कि शिव और कश्मीर की प्रेम कहानी के मध्य उपजे विस्थापन जैसे कनफ्लिक्ट को बहुत सतही रूप से दिखाया गया है फ़िल्म में। राजनैतिक कलह से जन्मे सामाजिक उहापोह को काफी ऊपर ऊपर से दिखा के बहुत कुछ लाइन्स के बीच सोंचने के लिए छोड़ दिया गया है। इसीलिए शिव और कश्मीर अमर प्रेमी नहीं बन पाते। उनकी प्रेम कहानी में संवाद है, भावनाएं हैं लेकिन गहराई नहीं है।
कैसा होता है अपनी प्रेमिका पर आग की लपट देखना? एक एक कर उसके करीब आती कुछ आहटें?किसी बाहरी ताक़त के कारण आपका अपने प्रेम से बरसों के लिए बिछड़ जाना, कुछ सालों की जुदाई में उसपर कब्ज़ा जमाये कोई पहचानवाला? कैसा होता है? वही हुआ शांति और शिकारा के बीच। उस शिकारा में जिसकी नींव में उसके पति के मुस्लिम दोस्त के घर के पत्थर हों, जिसके घर में उसके पति की पूरी कमाई लग गयी हो, उसे अपने घर से सजाया हो। इस फ़िल्म की सबसे अच्छी प्रेम कहानी है शांति और शिकारा की। हमारी रूह कांप जाती है जब शिकारा के छत पर आग गिरती है और उसे शांति देखती है, 18 साल बाद किताबों की जगह दूध के कनिस्तर देख के हमें भी अफसोस होता है, और ऐसे कई मौके हैं। इनके बीच की कलह सबसे अधिक समझने योग्य है। शिकारा और मुट्ठी कैम्प के तम्बू के बीच का फर्क ही विस्थापन है, सम्बन्ध विच्छेद है, विरह है। उससे दर्दनाक और कुछ नहीं।
और फिर आती है वो प्रेम कहानी जो अब नफरत में बदल चुकी है। पंडित और मुस्लिम की। कश्मीरी आगे जोड़ा जाना चाहिए। मुझे वर्तमान का पता नहीं लेकिन इतिहास की कलह ऐतिहासिक कलह बनी है। लेकिन शिकायत ये रही कि ये प्रेम कहानी कैसे खराब होती चली गयी। एक धरना। एक मृत्यु। उसके बाद पाकिस्तान के पीएम का भाषण और एक के बाद एक घटते चले गए इवेंट। काफी डराता है लेकिन वो क्या कारण थे कि हालात इतने बिगड़ गए? हमें पता है लेकिन फ़िल्म देखने वाले उन लोगों का क्या जो सिर्फ ये देखने गए थे कि कश्मीर के पत्थरबाज़ों ने कैसे कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाया? भारतीय सरकार से मोह भंग, नाराज़गी के क्या कारण थे? राज्यपाल जगमोहन, मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी का अपहरण, जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का बढ़ना और ना जाने कितनी बातें। वो भी सामने आनी चाहिए थी।
एक बात जो और सामने आनी चाहिए थी वो ये कि दो बार रोगनजोश पकने के बाद भी शिव और शान्ति उसका स्वाद क्यों नहीं ले पाते? पता चलना चाहिए।
हाँ मुख्य कलाकार आदिल और सादिया का अभिनय जबरदस्त से भी ऊपर है। दोनों अपने चरित्र में इतने सहज हैं कि लगता है न जाने कितने पुराने और परिपक्व कलाकार हैं वो। विधु विनोद चोपड़ा से इससे बेहतर कहानी लिखी जा सकती थी लेकिन जिस संवेदनशीलता और समझदारी से उन्होंने ये फ़िल्म बनाई है वो सराहनीय है। उन्होंने बताया कि कैसे बिना एक गोली चलाने वाले को दिखाए हिंसा दिखाया जाए कैसे आतंक को दर्शाया जाए। फ़िल्म का फर्स्ट हाफ बेहतरीन है और दूसरा हाफ थोड़ा कमजोर। लेकिन फ़िल्म देखी जानी चाहिए। रोगनजोश जरूर खाइएगा फ़िल्म देखने के बाद।

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

संक्षिप्त मूवी रिव्यू

"छपाक", भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है। यह सिनेमा जगत में हुई एक ऐसी सुखद घटना है जिसके समक्ष पुरुषवादी विचारों से भरे इस समाज को नतमस्तक होना चाहिए।
मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहा कि यौन शोषण व यौन हिंसा जैसे जघन्य अपराध को भारतीय फिल्मों में बदला लेने व कहानी को एक नया मोड़ देने के लिए किया जाता रहा। जिससे इस अपराध की संवेदनशीलता समाप्त होती गयी, और यह स्थापित कर दिया गया कि स्त्री पर यौन हिंसा के बाद एक पुरुष आएगा जो अपराधी से बदला लेगा। यहीं सिनेमा कहीं स्त्री को हार चुका था। लेकिन छपाक वो फ़िल्म नहीं है। यहां स्त्री पर फेंके गए तेज़ाब के बाद पुरुष दूसरे पुरुष के ऊपर तेज़ाब फेंककर या उसका गला काटकर खत्म नहीं करता। यहां स्त्री है जो कहना जानती है, फैसले लेना जानती है, आवाज़ को रखना जानती है।
यह फ़िल्म दीपिका पादुकोण, विक्रांत मेसी या मेघना गुलज़ार नहीं है। यह फ़िल्म एक संघर्ष की तरह है। दिल को झकझोरने वाला, आंखों को भींगो देने वाला, सांस को रोक देने वाला।
धन्यवाद मेघना यह फ़िल्म देने के लिए।
(कुछ अखंड इसके टैक्स फ्री होने का मज़ाक बनाएंगे, विरोध करेंगे। यह उनकी कुंसित मानसिकता दिखायेगी। ये वही लोग हैं जो तेलांगना में एनकाउंटर में मारे गए रेप के आरोपियों की मौत पर जश्न मना रहे थे। वो आज एसिड अटैक जैसे मुद्दे और एसिड सर्वाइवर पर बनी फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उसमें धर्म खोज रहे हैं। ख़ैर, ये अपनी तरह के खत्म ही चुके लोग हैं। धिक्कार है। )
PS: फ़िल्म देखते समय आलोक दीक्षित जो लक्ष्मी के साथी हैं वो पीछे ही बैठे थे।
PSS: फ़िल्म में देशभक्त शिरोमणि अंजना ओम कश्यप भी एक भूमिका निभा रही हैं। भक्तों ज़रा इनका भी बॉयकॉट करना।
फ़िल्म से जुड़े सभी लोगों को क्रांतिकारी ज़िन्दाबाद।
मर्दानगी के सबसे घिनौने अतिवाद से जन्म लेने वाले अपराध से गुजरी सभी साथियों को बहुत सम्मान, हौसला और ज़िन्दाबाद।।

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

चलते चलते

पाकिस्तान के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख्तर के दानिश कनेरिया के साथ किये जाने वाले भेदभाव की बात भारत में मोदी मीडिया ज़ी न्यूज़, टीवी 9 भारतवर्ष आदि के लिए संजीवनी बन के आया है। पाकिस्तान को बुरा कहने के इस सुनहरे अवसर को ये चैनल ऐसे भुना रहे हैं जैसे कुछ नया हो रहा हो और वो साबित करने में जुट गए हैं कि उनके पिता श्री मोदी ने और सौतेले पिता अमित शाह ने कितना आवश्यक काम किया है भारत के नागरिकता कानून में संशोधन ला कर।
मुझे यह अचरज में नहीं डालता क्योंकि 2005 के आस पास जब पाकिस्तान के बेहतरीन बल्लेबाज यूसुफ योहाना ने जब धर्मांतरण कर अपना नाम मोहम्मद यूसुफ किया था तब भी धर्म के नाम और किये जाने वाले भेदभाव व शोषण का मुद्दा खूब उठा था। यह सब पाकिस्तान में होना आम नहीं है परंतु इतना अचंभित करने वाला भी नहीं है। इसीलिए वो पाकिस्तान है, एक हताश देश जो अपनी नींव में उलझा हुआ है। लेकिन इससे भारत अपनी पीठ क्यों थपथपा रहा है? अगर शोएब अख्तर का खुलासा इतना आवश्यक है तो क्या मुम्बई रणजी खिलाड़ी अभिषेक नायर का खुलासा भूल गए जिसमें वो अजीत अगरकर, अमोल मजूमदार जैसे खिलाड़ियों पर उनपर जातिगत टिप्पणी व उनके साथ किये गए भेदभाव की बात करते हैं? नहीं भूलना चाहिए। शोषण समाज मे निहित है। जाति, धर्म, वर्ग, रंग, नस्ल और ना जाने कितने ही रूप में। भारत कतई पाकिस्तान नहीं है। भारत वो है जो पाकिस्तान नहीं है। और भारत को पाकिस्तान जैसा बनना भी नहीं चाहिए।
ख़ैर, दानिश कनेरिया ने सफाई दिया कि वो पाकिस्तानी हिन्दू होने में गर्व करते हैं और तमाम भेदभाव के बावजूद उस देश ने उसे प्यार दिया है।
PS: और जो देश में आज संघर्ष जारी है, इसी भेदभाव को खत्म करने की है। ताकि हमारे वर्ल्ड कप के हीरो जो देश मे अल्पसंख्यक धर्म से हैं फिर वो ज़हीर खान हों, मुनाफ पटेल, हरभजन सिंह या वर्ल्ड कप के महानायक युवराज सिंह, इन सब पर भविष्य में भारतीय नागरिक होने का सबूत देने की आवश्यकता ना पड़े।
जय हिंद। ज़िन्दाबाद।